अलजीरिया और सूडान के जनान्दोलनों से क्या डर गई हैं सेनाएं?

अलजीरिया और सूडान के जनान्दोलनों से क्या डर गई हैं सेनाएं?

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ज़माना बदल गया है, सैनिक विद्रोह हो रहे हैं, उनकी ख़बरें भी आ रही हैं लेकिन उनमें पहले वाली बात नहीं रह गई है।

अब सैनिक विद्रोह के बाद सेना का जो बयान आ रहा है उसमें सैनिकों पर आम जनता का डर साफ़ झलकता है। वह बार बार कह रहे हैं कि हम केवल अंतरिम रूप से सत्ता संभाल रहे हैं बहुत जल्द सिविलियन सरकार बहाल कर दी जाएगी।

यदि हम सूडान का उदाहरण दें तो सैनिक विद्रोह का नेतृत्व संभालने वाले जनरल अब्दुल फ़त्ताह बुरहान भी जनान्दोलन के नेताओं की मांग के सामने भीगी बिल्ली बने नज़र आए। आंदोलनकारियों के नेता मुहम्मद नाजी की मांगों के सामने उन्हें झुकना पड़ा और दबाव में आकर सैनिक परिषद का भंग करना पड़ा और उसकी जगह पर नई परिषद के गठन पर सहमति हुई जिसमें सेना को भी प्रतिनिधित्व हो। न्यायपालिका में मौजूद कई बड़े अधिकारियों को जनता की मांग के अनुसार पद से हटना पड़ा।

अलजीरिया की बात की जाए तो जनरल अहमद क़ाएद सालेह भी जनता की मांग के सामने झुके। राष्ट्रपति बूतफ़लीक़ा को सत्ता से हटना पड़ा।

सड़कों पर टैंक नहीं उतारे गए। सुरक्षा बलों को जनता के कांधे से कांधा मिलाकर खड़े होते हुए देखा गया। सैनिक प्रदर्शनकारियों के साथ खड़े होकर सेल्फ़ी लेते दिखाई दिए। प्रदर्शनकारियों में भी यह बदलाव देखने में आया कि वह न तो बाज़ारों पर हमले कर रहे हैं न दुकानों को निशाना बना रहे हैं। प्रदर्शनकारियों ने तो इस बार सड़कों को साफ़ किया और उसे बेहतरीन रूप दिया।

आख़िर हुआ क्या है, यह बदलाव कैसे आया है? क्या इस बड़े बदलाव की नर्म लेकिन दृढ़ आवाज़ को वह तानाशाह सुन रहे हैं जो अब भी सत्ता में बने हुए हैं?

सूडान में अपदस्थ राष्ट्रपति बशीर ने सैनिक विद्रोह किया उसे मुक्ति क्रान्ति का नाम दिया। इसी क्रान्ति के साथ उन्होंने तीस साल तक सूडान में राज किया। इस क्रान्ति ने मुक्ति तो किसी को नहीं दिलाई यहां तक कि अपने नेता बशीर को भी नहीं बचा सका बल्कि इसने भारी तबाही मचाई और दक्षिणी सूडान को अलग कर दिया इस लालच में कि उत्तरी सूडान उसके नियंत्रण में बना रहे और अब उत्तरी सूडान भी हाथ से निकल गया है।

जब सेना और उसके वरिष्ठ अधिकारी भ्रष्टाचार में डूब जाते हैं, जब वह कंपनियों के रूप में काम करने लगते हैं, साम्राज्यवादी शक्तियों की योजनाओं पर काम करने लगते हैं, जब उनकी बंदूक़ों का रुख़ आम जनता के सीने की ओर हो जाता है तो फिर ज़ाहिर है कि जनता सड़कों पर निकलेगी क्योंकि जनता के पास यही उचित रास्ता होता है अपनी मांगे मनवाने का।

अब सेना का स्थान सड़कों और जनान्दोलनों ने ले लिया है। अब बड़ा फ़ैसला केवल जनता के हाथ में होता है। इसलिए कि यह सेनाएं जितने भी युद्धों में शामिल हैं हुई हैं पराजित होकर ही बाहर निकली हैं। इन्हीं परिस्थितियों का नतीजा है कि जनता के बीच से सशस्त्र संगठन बने और लेबनान में हिज़्बुल्लाह, फ़िलिस्तीन में हमास, इराक़ में हश्दुश्शअबी, ईरान में पासदाराने इंक़ेलाब फ़ोर्स और यमन में अंसारुल्लाह का गठन हुआ। अभी आगे भी बहुत कुछ होने वाला है जिसके सामने आने पर सारी दुनिया चौंक जाएगी।

सेनाओं की हालत यह है कि वह अपने हथियारों और सैन्य क्षमताओं के लिए अमरीका की मदद की ज़रूरत होती है अतः यह सेनाएं कभी भी जनता को फ़ायदा नहीं पहुंचा सकतीं क्योंकि वह अमरीका की मदद पर निर्भर होती हैं। अमरीका कोई भी सहायता देने से पहले अपना एजेंडा पेश कर देता है। यही स्थिति कारण बनी है कि अरब नेता एक एक करके सत्ता के तख्त से नीचे गिरते जा रहे हैं। हमें यह नहीं लगता के सूडान के राष्ट्रपति उमर हसन अलबशीर पर ही यह सिलसिला रुक जाएगा। इसी प्रकार के असुरक्षित शासनों की एक लंबी सूची है।

अरब जनता के पास कोई चारा ही नहीं बचा है। शासनों के भ्रष्टाचार के नतीजे में बेरोज़गारी 60 प्रतिशत तक पहुंच चुकी है। जनता का संयम अब जवाब दे चुका है। लोगों के पास दो ही रास्ते बचे हैं। या तो वह असुरक्षित नौकाओं में बैठकर समुद्र में निकल जाएं और किसी बेहतर स्थान की ओर पलायन करें या फिर मैदान में उतर पड़ें। यह प्रतीत होता है कि दूसरा विकल्प इस समय अधिक प्राथमिकता हासिल कर चुका है।

क्रान्तियों को उस समय सफलता मिलती है जब उनका एजेंडा सीआईए ने तैयार न किया हो और तेल अबीब उनकी भावनाओं का केन्द्र न हो बल्कि उनमें देश प्रेम की भावना छायी हो।

अब्दुल बारी अतवान

अरब जगत के प्रख्यात लेखक व टीकाकार