संसद में हमारे लोग हमारी आवाज़ बनने के लिए होने चाहिए

संसद में हमारे लोग हमारी आवाज़ बनने के लिए होने चाहिए

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Faizul Hasan President, AMUSU 2016-17

मेरे अज़ीज़ साथियों
एएमयू के माइनोरिटी स्टेटस पर जब-जब संघी हुकूमत अपनी गिद्ध जैसी निगाह डालती है। तब-तब एएमयू के लिए आवाज़ उठाने वालों में मोहम्मद, अली, अहमद वाले नाम ही सामने आते हैं। कुछ ही नाम जो दूसरे तरफ आते हैं उनके वही लोग होते हैं, जो देश के सेक्यूलर ताने बाने के पक्षकार होते हैं। आज चुनाव का वक्त है इसलिए हमें यह सोचना होगा कि हम किसे अपना रहनुमा चुनना है। किनके हाथों में अपने मुस्तकबिल की बागडोर सौंपनी है।

क्योंकि सर सैयद की ये विरासत हम सबका दिल एएमयू देश में जगमगाता वो सूरज है जिसकी इल्म की रौशनी से पूरी क़ौम और मिल्लत बेदार हो रही है। अलबत्ता वक्त बा वक्त एएमयू पर लगातार हमले किये गए। इन्हें डर है कि अगर मुसलमान इल्म हासिल कर लेगा, तो इनके बौद्धिकता के फैलाये झूठे लबादे से आज़ाद होकर खुद ही अपना मुस्तकबिल तय करेगा।
एएमयू के हवाले से कुछ बाते बतानी जरूरी भी है।

लोकसभा चुनाव में कई सीटों पर हमारे हक़ और इंसाफ की लड़ाई लड़ने वाले लोग हैं, जिन्हें हमको मज़बूती देनी चाहिए। बात की शुरूआत करते हैं बेगूसराय से।

साथियों एक तरफ पाकिस्तान का वीज़ा मंत्री गिरिराज सिंह है तो दूसरी तरफ तनवीर हसन। आरजेडी के उम्मीदवार तनवीर हसन ने हर मौके पर जब भी ज़रूरत हुई है एएमयू और समाज के लिए आवाज़ उठाया है। जब बिहार के किशनगंज कैंपस और बंगाल के मूर्शिदाबाद कैंपस को बंद करने की बात की गई तो बिहार से उठने वाली आवाजों में एक आवाज़ तनवीर हसन का था। उन्होंने हर मौके पर आवाज़ उठाई। अलबत्ता एएमयू के माइनोरिटी स्टेटस पर वह लोग खामोश रहे जो आज तनवीर हसन को हराने के लिए क़ौम और मिल्लत को बरगला रहे हैं। तनवीर हसन की संसद में कन्हैया कुमार से ज़्यादा ज़रूरत है, जो भावनात्मक मुद्दों से हटकर हमारे बुनियादी मुद्दों को संसद में उठाए।

किशनगंज से अख्तरूल ईमान भाई के संघर्ष को कौन भूला सकता है। अख्तरूल ईमान वो नेता हैं जिनकी जरूरत संसद में है। सोचिए एक ओवैसी की आवाज़ जब संसद में गूंजती है तो पूरे संसद में हंगामा मच जाता है, जब अख्तरूल ईमान होंगे तो और ज़्यादा मज़बूती से आवाज़ उठेगी। मुरादाबाद से हमारे अलीग भाई जनाब एसटी हसन को संसद पहुंचाने की सख्त ज़रूरत है। जब एएमयू का सवाल खड़ा होगा तो वहां अपनी नुमाइंदी करने के लिए अपने एक अलीग एसटी हसन भी मौजूद होंगे। सीवान से हमारी बड़ी बहन हिना शहाब जैसी मज़बूत महिला की ज़रूरत है। सोचिए तीन तलाक पर जब संसद में बहस हो रही थी तब मुस्लिम महिलाओं की मज़बूत आवाज नहीं थी।

इस मुश्किल हालात में चाहे सरकार जिसकी भी हो संसद में हमारे लोग हमारी आवाज़ बनने के लिए होने चाहिए। इसलिए कि हर समाज चाहे वे सवर्ण हों, यादव हों, दलित हों, सब के सब अपना प्रतिनिधि संसद में भेजते हैं जिससे उनकी आवाज उठती रहती है। इन पांच सालों में एक मुस्लिम युवा के तौर पर मैंने महसूस किया कि हमारी आवाज़ उतनी मज़बूती से नहीं उठी जितनी मज़बूती से उठनी चाहिए थी। आज का वक्त हमारे लिए निर्णायक है, इसलिए हमें ऐसे निर्णायक मौके पर जज्बातों से नहीं समझदारी से फैसला लेना है।
अल्लाह से दुआ करता हूँ कि यह आवाज़े ज़रूर हिंदुस्तान की ऐवान में गूँजे.