रानी माल्हर : माल्हर चलेली गंगा असनान रे

रानी माल्हर : माल्हर चलेली गंगा असनान रे

Posted by

Narendra Neerav

रानी माल्हर
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हाथ लिहे लोटिया रे माल्हर, कान्हे धरे धोतिया
माल्हर चलेली गंगा असनान रे ।

एक कोस गइली, दूसर कोस गइली
तीसर कोस पहुंचली गंगा तीर रे ।

सोने के कटोरिया में माटी फुलेवली
घिसे लगली लामी-लामी केस रे ।

बेनिया मरोरी रानी उपरा निहारेली
निमिया पर बोलल काला काग रे ।

दूथ-भात के कटोरवा कउआ तोहे हम खियाइब
हमरे नैहर के कुसलिया बतियाव रे ।

नैहर के कुसलिया का बताई-सुनाई रनियां तोके
भइया -भउजी मेड़ल जेहलखाने रे ।

एतना बचनियां सुनली माल्हर रनियां
ऐंची-तैंची पहिरे लगली पहिराव रे ।

प्रस्तुत गीत रानी माल्हर की वीरता की रोमांचक-कथा
का एक अंश है । रानी अहिल्या बाई, रानी दुर्गावती,
सती मंजरी, रानी फूलमती, नौरंगी रानी, रानी केतकी,
रानी लक्ष्मीबाई आदि की कथायें करमा-गीतों में गायी
जाती हैं ।धरकार और बंसोर वनवासी डफला बजाते
हुए कथा को गाते हैं ।

इस गीत में माल्हर देवी गंगा-स्नान करने जाती हैं । जूड़ा
बांधते समय एक कौवै को नीम के पेड़ पर बोलते हुए
सुनती हैं ।बोलीं-ऐ कौवे, तुझे दूध-भात खिलाऊंगी , मेरे
नैहर का कुशल-क्षेम बताओ ।कौवा बोला- नैहर का
हाल क्या बताऊं?आपके भैया -भाभी को दुश्मन राजा
ने जेल में डाल दिया है तथा आपके पिताजी को मार
डाला है ।इतना सुनते ही रानी बेचैन हो गयीं ।उलटे-सीधे
वस्त्र पहनने लगीं ।

आगे का किस्सा यह है कि रानी माल्हर ने स्वयं सेना
संगठित करके युद्ध का संचालन किया ।उन्होंने
वीरतापूर्वक शत्रु-सेना को परास्त कर दिया।उनका मन
एक तोते में बसता था ।वे न तो अपने नैहर में सुखपूर्वक
रह सकीं न तो ससुराल में ।तोते के साथ आकाश में
उड़ गयीं और देवी के रूप में अमर हो गयीं ।
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आलेख/:नरेंद्र नीरव
चित्र:राजेंद्र तृषित