इस बार पुलवामा हमला ना करवाया जाता तो भाजपा के पास वोट मांगने का और कौन सा मुद्दा था??

इस बार पुलवामा हमला ना करवाया जाता तो भाजपा के पास वोट मांगने का और कौन सा मुद्दा था??

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Girraj Ved

2002 में गुजरात विधानसभा चुनाव से ऐन पहले गोधरा में 52 हिंदू तीर्थ यात्रियों को मारने और अक्षरधाम पर हमले के बाद हिन्दुत्व के नाम पर वोट बटोरने !

2017 में गुजरात चुनाव से पहले अमरनाथ यात्रा में गुजराती बस पर हमला होने, वो भी ऐसी बस, जो ना तो काफिले का हिस्सा होती है और ना ही श्राइन बोर्ड में उसका रजिस्ट्रेशन होता है (याद रखिए बिना श्राइन बोर्ड में रजिस्ट्रेशन करवाए मोहन भागवत तक अमरनाथ नहीं जा सके थे ) बस की ना कहीं चेकिंग होती है ना बिना सुरक्षा के अकेले जाने पर रोका जाता है !
और हमले के बाद गुजरात की सुरक्षा के नाम पर वोटों का सौदा !

उत्तरप्रदेश चुनाव से ऐन पहले पठानकोट और ऊरी पर नियोजित हमला करवाकर, सर्जिकल स्ट्राईक का हौव्वा खड़ा करना और राष्ट्रवाद के नाम पर वोट बटोरने का खेल

इन सबमे और
पुलवामा में 40 CRPF जवानों को मारने के पैटर्न मे कुछ ज्यादा फर्क नही है ! !

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एक बार जहरीले और घटिया भाषणों, गिरते भाषाई स्तर, फसल काटती हेमा मालिन, लंगर जीमते संबित पात्रा, हिन्दू मुस्लिम करती मायावती, अंडरवियर का रंग बताते आजम खान, राहुल को गाली देते हिमाचल के भाजपा अध्यक्ष को छोड़कर सिर्फ इतना सोचिए की —-
“इस बार पुलवामा हमला ना करवाया जाता तो भाजपा के पास वोट मांगने का और कौनसा मुद्दा था ??”

in short – गंगाधर ही शक्तिमान है
#मोदी_है_तो_मुमकिन_है

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🔆पंडित नेहरू ने अपनी वसीयत में लिखा था—
“मैं चाहता हूं कि मेरी मुट्ठीभर राख प्रयाग के संगम में बहा दी जाए जो हिन्दुस्तान के दामन को चूमते हुए समंदर में जा मिले, लेकिन मेरी राख का ज्यादा हिस्सा हवाई जहाज से ऊपर ले जाकर खेतों में बिखरा दिया जाए, वो खेत जहां हजारों मेहनतकश इंसान काम में लगे हैं, ताकि मेरे वजूद का हर जर्रा वतन की खाक में मिलकर एक हो जाए”।

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🔆 शास्त्री जी जब प्रधानमंत्री बने थे , तब उन्होंने फटी हुई धोती में शपथ ग्रहण की थी ।
बाद में पता चला कि उनके पास दो ही धोतियाँ थी और दो ही कुर्ते थे। जब वो प्रधानमंत्री बने थे ,तो उनकी धर्म पत्नी ने कहा था –अब तो नयी धोती ले लो ! तो उनका यह कहना था की करोड़ो भारत के किसान ऐसी धोती पहनते रहते है मुझे नयी धोती पहनने का अधिकार नही है !!
🔆 ऐसे थे भारत के लाल, लाल बहादुर शास्त्री जी ।।
।। जय जवान :जय किसान ।।
——–👏🔆प्रकाश भाई


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” जय जवान :जय किसान “
🔆जब लाल बहादुर शास्त्री जी प्रधानमंत्री निर्वाचित हुए तो त्रिमूर्ति भवन प्रधानमंत्री आवास बना और शास्त्री जी वहां गए ।
उन्होंने माली को बुलाया और कहा कि मुझे घास नहीं गेहूँ की आवश्यकता है । मुझे फूलों की नहीं सब्जियों की आवश्यकता है उन्होंने लाॅन में गेहूँ और गमलो में सब्जी लगाने का आदेश दिया ।स्वयं हल भी चलाते थे ।

वो प्रबल गाँधी वादी थे और उनका सम्पूर्ण जीवन कांग्रेस पार्टी को समर्पित था । आजादी से पहले कई साल जेले काटी ।

वो महान व्यक्तित्व के स्वामी थे । गरीबी में जीवन कटा और जीवन के अंत तक कार की किश्ते न चुका सके ।।

।। जय जवान जय किसान ।।

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🔆एक बार पंडित नेहरू उदयपुर गए। वहां उनके आने से पहले मंच पर कई नेताओं ने भाषण दिया। मंच पर महाराणा प्रताप का चित्र लगाया हुआ था, लेकिन नेहरू जी के आते ही उस पर काला कपड़ा डाल दिया गया।

नेहरूजी ने पूछा, यह काले कपड़े के नीचे क्या है?
‘जी महाराणा का चित्र है!’
‘आपने ढक क्यों दिया?’
‘कि कहीं आप महाराणा का चित्र देखकर आग बबूला न हो जाएं, क्योंकि आपकी दृष्टि में तो अकबर महान हैं!’

‘इतिहास झुठलाया नहीं सकता अकबर महान था या नही ये अलग विषय हो सकता है , , लेकिन महाराणा तो भगवान थे!’ फिर नेहरू जी ने कपड़ा स्वयं हटाकर महाराणा को श्रद्धांजलि दी।

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” ऐसे थे चाचा नेहरु “

जब देश के सबसे धनी प्रधानमंत्री माने जाने वाले नेहरु जी ने ढाबे वाले से दस रुपये की उधारी की थी ।

आजादी के बाद जब देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरु देश में दंगे भूखमरी कत्लेआम को रोकने के लिए जब पूरे देश का दौरा कर रहे थे।

तब खासकर शरणार्थी शिविरों में जाते तो सब अपनी अपनी जरुरतो का रोना रोते थे, खास कर भूखमरी व फाकानाशी का तब नेहरूजी अपनी जेब में जितने रूपये होते थे सारे के सारे वहाँ दे आते थे ।तब उन के सचिव व परिवार ने मिल कर निर्णय किया की आज से नेहरु जी की जेब में 200 रूपये ही रखे जायेंगे अब नेहरु जी वो 200 रूपये भी जरुरतमंदो को दे आते थे ।

इस के बाद उन के सचिव ने नेहरु जी के निजी स्टाफ को उन की जेब में मात्र 60 रूपये रखने को कह दिया था तब नेहरु जी वो साठ रूपये तो दे ही देते थे, अपने साथ के स्टाफ के पास जितने रूपये होते थे, वो भी उधार लेकर नेहरु जी जरुरतमंदो को दे दिया करते थे ।

एक दिन जब नेहरु जी जब अपनी व अपने स्टाफ की जेब शरणार्थीयों के कैम्प में खाली कर के आ रहे थे तब रास्ते में कुछ लोग मिले और उन्होंने नेहरु जी से खाना खिलाने की मांग की तो नेहरू जी उन्हें पास के छोटे से ढाबे में ले गये उन सब के खाने के कुल दस रूपये बने थे पर नेहरु जी की जेब तो खाली थी तब उन्होंने ढाबे वाले से दस रूपये एक दिन के लिए उधार रखने की रिक्वैस्ट की और अगले दिन अपने स्टाफ के सदस्य के साथ दस रूपये सधन्यवाद भेजें ।

तो ऐसे थे चाचा नेहरु जिन के बारे में अक्सर कहा जाता है उन के कपङे लंदन से धुल कर आते थे उन का दूसरे काम पैरिस में होते थे जब की सच्चाई ये थी की अपनी तन्खाह तो वे जनता पर लगाते ही थे घर में दुसरे किसी तरीके से हुई सारी कमाई भी वे जनता पर खर्च करते थे

उन की विरासत में इंदिरा गांधी को सिर्फ नेहरु जी द्वारा लिखीत पुस्तकों की रायल्टी मिली बाकी सब कुछ उन्होंने आनन्द भवन समेत राष्ट्र के नाम कर दिया ।
Rajender Godara
———👏🔆प्रकाश भाई

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🔆गान्धी जी से जब पूछा गया :—
“आजादी मिल जाने पर आप कौन -सा काम सबसे पहले करना चाहेंगे “?

🔆गान्धी जी का उत्तर था :—
“सेटिंग डेमोक्रेसी आॅन दी मार्च “
–अर्थात लोकशाही को आगे बढ़ाना ।

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जब जवाहरलाल नेहरू ने 3 सितंबर 1946 को अंतरिम सरकार में शामिल होने का फैसला किया तो उन्होंने आनंद भवन को छोड़ कर अपनी सारी संपत्ति देश को दान कर दी.

नेहरू को पैसे से कोई खास लगाव नहीं था. उनके सचिव रहे एम ओ मथाई अपनी किताब रेमिनिसेंसेज़ ऑफ़ नेहरू एज में लिखते हैं कि 1946 के शुरू में उनकी जेब में हमेशा 200 रुपए होते थे, लेकिन जल्द ही यह पैसे ख़त्म हो जाते थे क्योंकि नेहरू यह रुपए पाकिस्तान से आए परेशान शरणार्थियों में बांट देते थे.
ख़त्म हो जाने पर वह और पैसे मांगते थे. इस सबसे परेशान हो कर मथाई ने उनकी जेब में रुपए रखवाने ही बंद कर दिए.
लेकिन नेहरू की भलमनसाहत इस पर भी नहीं रुकी. वह लोगों को देने के लिए अपने सुरक्षा अधिकारी से पैसे उधार लेने लगे.

मथाई ने एक दिन सभी सुरक्षा अधिकारियों का आगाह किया कि वह नेहरू को एक बार में दस रुपए से ज़्यादा उधार न दें.
मथाई नेहरू की इस आदत से इतने आजिज़ आ गए कि उन्होंने बाद में प्रधानमंत्री सहायता कोष से कुछ पैसे निकलवा कर उनके निजी सचिव के पास रखवाना शुरू कर दिए ताकि नेहरू की पूरी तनख़्वाह लोगों को देने में ही न खर्च हो जाए.
जहाँ तक सार्वजनिक जीवन में ईमानदारी का सवाल है जवाहरलाल नेहरू का कोई सानी नहीं था.
जाने-माने पत्रकार कुलदीप नय्यर ने एक ऐसी बात बताई जिसकी आज के युग में कल्पना नहीं की जा सकती. कुलदीप ने कुछ समय के लिए नेहरू के सूचना अधिकारी के तौर पर काम किया था.

नेहरू की बहन विजय लक्ष्मी पंडित के शौक बहुत ख़र्चीले थे. एक बार वह शिमला के सर्किट हाउस में ठहरीं. वहाँ रहने का बिल 2500 रुपए आया.
वह बिल का भुगतान किए बिना वहाँ से चली आईं. तब हिमाचल प्रदेश नहीं बना था और शिमला पंजाब का हिस्सा होता था. तब भीमसेन सच्चर पंजाब के मुख्यमंत्री होते थे.उनके पास राज्यपाल चंदूलाल त्रिवेदी का पत्र आया कि 2500 रुपये की राशि को राज्य सरकार के विभिन्न खर्चों के तहत दिखला दिया जाए. सच्चर के गले यह बात नहीं उतरी.उन्होंने विजय लक्ष्मी पंडित से तो कुछ नहीं कहा लेकिन झिझकते हुए नेहरू को पत्र लिख डाला कि वही बताएं कि इस पैसे का हिसाब किस मद में डाला जाए. नेहरू ने तुरंत जवाब दिया कि इस बिल का भुगतान वह स्वयं करेंगे.उन्होंने यह भी लिखा कि वह एक मुश्त इतने पैसे नहीं दे सकते इसलिए वह पंजाब सरकार को पांच किश्तों में यह राशि चुकाएंगे. नेहरू ने अपने निजी बैंक खाते से लगातार पांच महीनों तक पंजाब सरकार के पक्ष में पांच सौ रुपए के चेक काटे.

Disclaimer : लेख/तस्वीर सोशल मीडिया में वायरल हैं, लेखकों के निजी मत हैं, तीसरी जंग हिंदी का कोई सरोकार नहीं है!