हिटलर को नाटकीयता पसंद थी : मारना है तो मुझे मारो, मेरे दलित भाईयों को….

हिटलर को नाटकीयता पसंद थी : मारना है तो मुझे मारो, मेरे दलित भाईयों को….

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Sarvoday India

आज किसी ब्लॉग में हिटलर के बारे में पढ़ रहा था। ………..’1940 में उसकी आत्मकथा मीन काम्फ़ की समीक्षा जॉर्ज ऑरवेल ने की थी. यह, वह प्रसिद्ध लेखक जॉर्ज ओरवेल नहीं हैं, बल्कि एक अन्य अल्पख्याति समीक्षक हैं. उन्होंने समीक्षा के दौरान हिटलर के व्यक्तित्व में नकारात्मक अंशो के विकास पर बहुत बारीकी से अध्ययन किया. ऑरवेल एक मनोवैज्ञानिक भी थे. उनकी मनोविज्ञान में दिलचस्पी ने हिटलर के व्यक्तित्व के नकारात्मक भाव को समझने में बहुत मदद की……….

जॉर्ज ऑरवेल ने हिटलर के बारे में लिखा है। …….”हिटलर, अपने प्रतिद्वंद्वियों के विरुद्ध, कभी सफल नहीं हो पाता, अगर उसने अपने व्यक्तित्व को और आकर्षक नहीं बनाया होता तो. वह अपनी क्षवि और अपने भाषणों के प्रति बहुत सजग रहता था. उसके आत्मकथा से यह बात अक्सर प्रमाणित होती है. उसके भाषणों को जब आप बार बार सुनेंगे तो यह स्वतः प्रमाणित हो जाएगा”……………मैं इसे जोर देकर कहना चाहूँगा कि, हिटलर को मैं कभी नापसंद नहीं कर सका, जब तक कि वह सत्ता में नहीं आ गया. पर मैंने खुद को छला गया महसूस किया जब वह सत्ता में आया तो…….. मैं सोचता था कि अगर मैं उसके क़रीब किसी प्रकार पहुँच जाता तो उसकी हत्या कर देता. पर इसलिए नहीं कि उस से मेरी कोई व्यक्तिगत शत्रुता थी. पर हैरानी यह है कि वह इन बुराइयों के बाद भी मुझे कभी कभी अपील भी करता था, जब मैं विभिन्न मुद्राओं में, उसके फ़ोटो देखता था तो. उसकी पुस्तक के हर्स्ट और ब्लैकेट संस्करण में जो शुरुआती दौर के फ़ोटो छपे हैं उन्हें देखने के लिए ज़रूर मैं आप को सुझाव दूंगा, जिसमें वह भूरी शर्ट पहने दीखता है. वह खुद को इन चित्रों में कभी सलीब पर टंगे ईसा की तरह, कभी शहीद की मुद्रा में तो कभी, खुद को पीड़ित रूप से दिखने की कोशिश करता है. वह खुद को प्रोमेथियस ( ग्रीक देवता जो मनुष्य जाती के लिए अनेक कष्ट सहता है ) की तरह जो एक शिला से जंजीरों से बंधा हुआ, दुनिया भर की सारी विषमताओं से अकेले हीं लड़ता हुआ दिख रहा है. या दिखाना चाहता था’

“हिटलर की छवि या अपील मूलतः प्रतीकात्मक थी। ………

हिटलर को नाटकीयता पसंद थी. वह प्रेजेन्टेशन में विश्वास करता था. अपनी आत्म कथा मीन काम्फ़ की भूमिका में वह लिखता है,
” मैं जानता हूँ, जनता का दिल लिखित अंश के बजाय बोले गए शब्दों से अधिक जीता जा सकता है. इसीलिए इस धरती पर हुआ हर महान आंदोलन का विकास उसके भाषण कर्ताओं का ऋणी है न कि, महान लेखकों का. “
अंग्रेज़ी में यह उद्धरण इस प्रकार है,

“I know that men are won over less by the written than by the spoken word, that every great movement on this earth owes its growth to orators and not to great writers.”

Girish Malviya


Sarvoday India

सन 1936 में लाहौर में ‘जातपांत तोड़क मंडल’ द्वारा प्रस्तावित एक अधिवेशन में डॉ. अम्बेडकर द्वारा अध्यक्षीय भाषण दिया जाना था लेकिन भाषण के मसौदे पर विरोधाभास की वजह से अधिवेशन नहीं हो पाया. डॉ. अम्बेडकर ने अपने भाषण को ‘जतिप्रथा उन्मूलन’ के शीर्षक से प्रकाशित करवा लिया था जो एक गर्मागर्म बहस का मुद्दा बन गया था.
इस पुस्तिका का एक अंश यहाँ इसलिए देना उपयुक्त समझ रहा हूँ कि ये आज भी सामयिक है जो हिंदू समाज और जतिप्रथा की उलझनों को पर आवश्यक सवाल खड़ा करता है.

“सबसे पहले हमें यह महत्वपूर्ण तथ्य समझना होगा कि हिंदू समाज एक मिथक मात्र है. हिंदू नाम स्वयं विदेशी नाम है. यह नाम मुसलमानों ने भारतवासियों को दिया था, ताकि वे उन्हें अपने से अलग कर सकें.

मुसलमानों के भारत पर आक्रमण से पहले लिखे गए किसी भी संस्कृत ग्रंथ में इसका उल्लेख नहीं मिलता. उन्हें अपने लिए किसी समान नाम की ज़रूरत महसूस नहीं हुई थी, क्योंकि उन्हें ऐसा नहीं लगता था कि वे किसी विशेष समुदाय के हैं. वस्तुतः हिंदू समाज नामक कोई वस्तु है ही नहीं. यह अनेक जातियों का समवेत रूप है. प्रत्येक जाति अपने अस्तित्व से परिचित है. वह अपने सभी समुदायों में व्याप्त है और सबको स्वयं में समाविष्ट किए हुए है और इसी में उसका अस्तित्व है. जातियों का कोई मिलाजुला संघ भी नहीं है. किसी भी जाति को यह महसूस नहीं होता कि वह अन्य जातियों से जुड़ी हुई है- सिर्फ़ उस समय को छोड़ कर, जब हिंदू-मुस्लिम दंगे होते हैं. अन्य सभी अवसरों पर तो प्रत्येक जाति यह कोशिश करती है कि वह अपनी अलग सत्ता को ठीक से बनाए रखे और दूसरों से स्पष्ट रूप से अलग रहे. …………लोगों को जो चीज आपस में एक सूत्र में बाँधती है और उन्हें एक समाज में पूरी तरह शामिल करती है वह यह है कि हरेक व्यक्ति को सामाजिक गतिविधियों में इस तरह हिस्सेदार या भागीदार बनाया जाए, ताकि उनकी सफलता में उसे स्वयं अपनी सफलता और उसकी विफलता में अपनी विफलता दिखाई दे. जतिप्रथा इस प्रकार की सामूहिक गतिविधियों का आयोजन नहीं होने देती और सामूहिक गतिविधियों को इस प्रकार वर्जित करके ही उसने हिंदुओं को ऐसे समाज के रूप में उभरने से रोका है, जिसमें सभी समुदाय एक होकर जिएं और एक ही चेतना व्याप्त हो जाए. “
(स्त्रोत: जतिप्रथा -उन्मूलन)

ANI

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@ANI
Sam Pitroda,Indian Overseas Congress Chief on BJP says PM Modi symbolizes strong Govt: India will have to decide, strong is not necessarily a good thing for democracy.Hitler was also very strong, all dictators are strong, Chinese leader is very strong, is that what India wants?


Aarti

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@aartic02
Starking Similarity between
Hitler ~ Modi 👉
🗯️ Subsidies from Industrialists placed Hitler’s party on a Secure Financial Footing
🗯️ BJP, the biggest Beneficiary of Electoral Bonds

Bhavika Kapoor

@BhavikaKapoor5
Replying to @mnk_menon
Hitler used to cry on stage to get sympathy, Modi does same

Hitler either bought Media or killed them, Modi does same

Hitler demolished every institution except his political party Nazi party, Modi is doing same.

Hitler controlled Army and made it Nazi army, Modi is doing same

𝕄𝕒𝕕𝕙𝕦𝕝𝕚𝕜𝕒 𝕤𝕚𝕟𝕘𝕙

@madhulikaji
Hitler or modi
Why modi #Scared2Debate
Chowkidar tell the chor ,congress is ready to debate. Where is your 56 inches???

Disclaimer : लेख/तस्वीर सोशल मीडिया में वायरल हैं, लेखकों के निजी मत हैं, तीसरी जंग हिंदी का कोई सरोकार नहीं है!