ईमानदारी और मजदूरी की सच्ची कहानी

ईमानदारी और मजदूरी की सच्ची कहानी

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Abdul Rashid

पूर्णिया शहर में मजदूरों की मंडी लगती है. काम के इंतजार में खड़े मजदूरों में बसंत और कपिल पासवान भी खड़े रहतें है.

ये दोनों ही बिहार के तीन बार और पहले दलित मुख्यमंत्री रहे भोला पासवान शास्त्री के पोते है.

रोजाना पूर्णिया के केनगर प्रखंड के बैरगाछी से ये लोग काम की तलाश में 14 किलोमीटर का फासला तय करके आते हैं. मजदूरी करते हैं और लौट जाते हैं. भोला पासवान की कोई संतान नहीं थी, उनकी जिंदगी के सहारे उनके भाइयों के बच्चे ही रहे.

भोला पासवान को आग देने वाले उनके भतीजे विरंची पासवान अब बूढे हो चुके है.

वो कहते थे, “मेरी और मेरे बच्चों की पूरी जिंदगी मजदूरी करते हुए कट गई. बहुत मुश्किल से राशन कार्ड मिला है. लेकिन ये भी एक ही है जबकि बेटे तीन है. हमको तीन राशन कार्ड दिलवा दीजिए. जिंदगी थोड़ी आसान हो जाएगी.”

परिवार के पास अपनी कोई ज़मीन नहीं है. लेकिन परिवार का कहना है कि गांव में भोला पासवान का स्मारक बनाने के लिए तीन डेसीमिल जमीन सरकार को दे दी.

विरंची बताते है, “डी एम साहब से कहा कि आपके चचा का स्मारक बनेगा, तो हमने ज़मीन दे दी. क्या करते?”

विरंची के पोते-पोतियां बगल के ही भोला पासवान प्राथमिक विद्यालय में पढ़ते है. विरंची के बेटे बसंत पासवान गुस्से से कहते है, “21 सितंबर को भोला बाबू की जयंती रहती है तो प्रशासन को हमारी याद आती है.”

पूर्णिया में दूसरे चरण में चुनाव होने है. भारतीय राजनीति पर नज़र रखने वाली संस्था एडीआर की रिपोर्ट कहती है कि 2004 से अब तक बिहार के सांसद और विधायकों की औसत संपत्ति 2.46 करोड़ है. इसमें पुरुषों की बात करें तो ये 2.57 करोड़ और महिला सांसद/ विधायकों की 1.61 करोड़ है.

नेताओं के इस धनबल और बाहुबल के बीच सादगी, सरलता और ईमानदारी से जीने वाले फनी गोपाल सेनगुप्ता और भोला पासवान शास्त्री जैसे नेता भी थे.

देवनाथ सेन कहते है, “लोग बहुत सम्मान करते हैं. कोई ये तो नहीं कहता चोर का बेटा जा रहा है. अब नई पीढ़ी आ गई जो मेरे पिता को नहीं जानती. जो उनके जैसे मूल्य रखने वालों को भूल रही है.”
#बिहार

News Source : BBC HINDI
Photo : SEETU TIWARI /BBC