गांधी हत्या क्यो?

गांधी हत्या क्यो?

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बजरंग मुनि

मंथन क्रमांक 132 ’’गांधी हत्या क्यो?’’
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आज तक मेरे लिये यह प्रश्न एक पहेली बना हुआ है कि गांधी हत्या क्यों हुई? गांधी हिन्दू थे और किसी हिन्दू ने उनकी हत्या कर दी। यह कारण समझ में नहीं आया। जो भी कारण बताया जाता है वह पूरी तरह अपर्याप्त है। प्राचीन समय से हिन्दू धर्म की दो अलग-अलग भूमिकाएं रही हैं- एक गुण प्रधान हिन्दुत्व और दूसरे पहचान प्रधान। गांधी गुण प्रधान हिन्दुत्व की विचारधारा से ओतप्रोत थे और हत्या करने वाला पहचान प्रधान हिन्दुत्व से। गांधी में हिन्दुत्व के मौलिक गुण कूट कूट कर भरे पडे़ थे और वे गुण प्रधान हिन्दुत्व को अपने जीवन में पूरी तरह उतार रहे थे। वे कहीं भी पहचान प्रधान हिन्दुत्व की जीवन पद्धति में बाधक नहीं थे। वैसे भी आमतौर पर हिन्दू सामाजिक व्यवस्था में पूरी तरह अहिंसक होता है। यदि कभी हिंसा करनी हो तो हिन्दू धर्मव्यवस्था में ऐसी हिंसा राज्य व्यवस्था के माध्यम से ही हो सकती है, सीधे नहीं। इसलिये इस प्रश्न का उत्तर और जटिल हो गया है।

गांधी के कार्यकाल में अनेक संगठन गांधी के विरूद्ध काम कर रहे थे। गांधी स्वतंत्रता को पहला उददेश्य मान कर चल रहे थे तो विभिन्न संगठन स्वतंत्रता से अलग कुछ और भी उददेश्य आगे रखकर चल रहे थे जिनमें चार प्रकार के लोग प्रमुख थे- 1. संघ 2. जिन्ना 3. अम्बेडकर 4. कम्युनिस्ट। ये चारो समूह गांधी के विरूद्ध थे क्योंकि गांधी स्वतंत्रता को सबसे प्रमुख महत्व देते थे और ये चारों अलग-अलग उद्देश्य को लेकर आगे बढ़ने का प्रयास कर रहे थे भले ही स्वतंत्रता कुछ पिछड ही क्यों न जायें। इन चारो में भी जिन्ना अम्बेडकर और कम्युनिस्टों के अपने-अपने स्वार्थ थे और संघ की प्राथमिकता स्वार्थ से कुछ भिन्न थी। संघ अंग्रेजो की तुलना में मुसलमानों को अधिक घातक मानता था। गांधी अंग्रेजो की गुलामी से मुक्ति को प्राथमिकता देते थे। ये चारो समूह आपस में भी टकराते रहते थे, जिसे गांधी निपटाने का प्रयास करते थे किन्तु चारों आपस में चाहे जितना भी टकराते हो किन्तु गांधी विरोध में चारो की भाषा एक होती थी। इस संबंध में कोई किसी से नहीं टकराता था। ये सभी गांधी के विरूद्ध थे क्योंकि चारो के अलग-अलग संगठन थे। संगठनों का उददेश्य स्वार्थ से जुडा होता है और संस्थाओं का परमार्थ से। चारो में किसी का स्वरूप संस्थागत नहीं था भले ही संघ अपने को संस्था कहने का ढोेंग करता था।

गांधी विदेशी गुलामी से हर भारतीय की मुक्ति को अंतिम लक्ष्य मान कर राष्ट्रीय स्वतंत्रता को पड़ाव मानते थे। गांधी का अंतिम लक्ष्य था व्यक्ति स्वातंत्र। इसलिये गांधी ने हिन्द स्वराज के बाद ग्राम स्वराज को लक्ष्य घोषित किया। स्वतंत्रता संघर्ष में जो प्रमुख लोग सक्रिय थे उनमें से अधिकांश बुद्धिजीवी राष्ट्रीय स्वराज्य को अंतिम लक्ष्य मानते थे। यही कारण था कि कांग्रेस के नेहरू, पटेल सहित प्रमुख नेता गांधी की कोई बात कभी स्वीकार नहीं करते थे भले ही स्वार्थ वश मान लेते थे और वैसा करते थे। यदि कभी भी कांग्रेस पार्टी में मतदान हुआ तो गांधी की सोच के विपरीत हुआ और गांधी के डर से मान लिया गया। गांधी के साथ देश के करोड़ो लोगो की भावना जुडी हुई थी तो इन नेताओं को अपने स्वार्थ के कारण कुछ स्वार्थी लोगों के अतिरिक्त किसी एक का भी समर्थन प्राप्त नहीं था। वैसे भी भारत हिन्दू बहुल देश था और हिन्दू आमतौर पर व्यवस्था के साथ चलने वाला होता है। सामान्य हिन्दू आबादी राजनीति में दखल नहीं देती और राजा को श्रद्धा देती है। स्वतंत्रता के बाद भी आजतक आमतौर पर स्वतंत्रता पूर्व के राजाओं या उनके वंशजों को बहुत श्रद्धा प्राप्त है। स्वतंत्रता के बाद पंडित नेहरू को श्रद्धा प्राप्त हुई और आजतक इनके वंशज उसका लाभ उठा रहे है। यह हिन्दुओं का स्वभाव है। स्वतंत्रता के पूर्व भारत की लगभग पूरी हिन्दू आबादी ने गांधी और उनकी नीतियों पर विश्वास कर लिया था। इसी का परिणाम था कि सभी नेता गांधी की नीतियों का विरोध करने के बाद भी गांधी के आदेश को चुपचाप स्वीकार कर लेते थे। पंडित नेहरू तथा अन्य राजनेता भी गांधी की नीतियों से नाराज रहते थे लेकिन खुलकर नहीं बोल पाते थे।
स्वतंत्रता के पूर्व कांग्रेस पार्टी नेतृत्व कर रही थी। कांग्रेस का चरित्र संस्थागत था संगठनात्मक नहीं। अनेक विचारों के लोग स्वतंत्रता के लिये एक मंच पर आये थे। जब स्वतंत्रता मिलने के लक्षण दिखने लगे तब गांधी को किनारे करके कांग्रेस को संगठनात्मक स्वरूप देना शुरू हुआ। इस मामले में पंडित नेहरू सबसे अधिक दोषी हैं। स्वतंत्रता के समय पंडित नेहरू की सत्ता के प्रति नीयत बिगड गई। सुभाष चंद्र बोस, भगत सिंह आदि का मार्ग गलत था नीयत गलत नहीं। नेहरू के अतिरिक्त अन्य चार की तो नीतियां भी गलत थी और नीयत भी। मैंने सुना है कि गांधी कांग्रेस को संगठन के रूप में न बनाकर उसे स्वतंत्रता के बाद भंग करना चाहते थे लेकिन नेहरू ने ऐसा नहीं होने दिया।
गांधी विचारो से सबसे अधिक चिढ़ सत्ता के अकेन्द्रीयकरण के कारण थी चाहे कोई राजनेता रहा हो अथवा हिन्दू राष्ट्र की बात करने वाला। कोई भी नहीं चाहता था कि देश में ग्राम स्वराज आवे और सत्ता अकेन्द्रित होकर परिवारो तक चली जाये। गांधी इन सबके लिये सबसे बडी बाधा थे। मुझे ऐसा महसूस होता है कि गांधी के विरूद्ध वातावरण बनाने में गांधी की स्वराज की यह परिभाषा भी सहायक सिद्ध हुई होगी। कुछ लोग ऐसा भी बताते है कि गांधी हत्या का प्रयास स्वतंत्रता से कई वर्ष पूर्व भी हुआ था। यदि यह बात सच है तो फिर उस समय तक न पाकिस्तान बना था न ही कोई 55 करोड रूपया देने का मामला था। साथ ही यदि गांधी हत्या में हिन्दू मुसलमान की बात ही प्रमुख होती तो स्वतंत्रता के बहुत पूर्व हिन्दू महासभा और मुस्लिम लीग ने मिलकर बंगाल में सरकार चलाई जिसमें श्यामा प्रसाद मुखर्जी आदि भी शामिल थे। एक अन्य बात यह भी है कि यदि विभाजन इसका कारण था तो विभाजन में मुख्य भूमिका नेहरू, पटेल तथा जिन्ना की रही, गांधी की नहीं। यदि इस कारण से ही हत्या होती तो इन तीनो मे से किसी की होनी चाहिये थी किन्तु यदि इन सबको छोडकर गांधी की हत्या हुई तो इसका कारण कहीं और खोजा जाना चाहिये। मुझे ऐसा महसूस होता है कि गांधी हत्या का मुख्य कारण गांधी की सत्ता के विकेन्द्रीयकरण की नीति रही जिसके लियेे बहाना विभाजन को बनाया गया और लोगो के बीच भ्रम फैलाया गया। गांधी के हत्यारे गोडसे के मन में भले ही विभाजन या हिन्दू मुसलमान की बात रही हो किन्तु हत्या का वातावरण बनाने के पीछे देश के राजनेताओं की सत्तालोलुपता थी जिसमें गांधी सबसे बडी बाधा थे। वैसे भी नेताओं की नजर में गांधी का उपयोग अब समाप्त हो चुका था। पंडित नेहरू ने गांधी विचारो को तिलांजलि देकर साम्यवाद की नीति अपना ली। जिन्ना पहले से ही अलग हो चुके थे। अम्बेडकर ने कानून मंत्री बनकर हिन्दू कोड बिल का ताना बाना बुनना शुरू कर दिया और बचे संघ, हिन्दू महासभा तो, इन्होंने गांधी के खिलाफ वातावरण बनाना शुरू कर दिया। सबने अपना-अपना अलग-अलग गांधी विरोधी मार्ग पकड लिया था। यदि गांधी जीवित रहते तो इनके लिये कुछ समस्याएं ही पैदा करते इसलिये किसी मुर्ख ने गांधी की हत्या कर दी और बाकी सब लोगो ने राहत की सांस ली। ठीक गांधी विचार के विपरीत सत्ता का ढांचा तैयार किया गया और लोकतंत्र की परिभाषा भी बदल दी गई। आज पूरी तरह गांव और परिवार को संविधान से बाहर करके राजनैतिक सत्ता अधिक से अधिक केन्द्रीयकरण की दिशा में बढ रही हैं।

गांधी पर चर्चा के बाद गोडसे पर भी चर्चा समीचीन है। कोई हिन्दू कभी स्वेच्छा से और बिना समाज से अधिकार प्राप्त किये किसी पर बल प्रयोग नहीं कर सकता। मुस्लिम संस्कृति इसकी इजाजत देती है। विषेषकर यदि कोई हिन्दू किसी हिन्दू की हत्या करे और वह भी किसी गुण प्रधान हिन्दू की तो यह बात पूरी तरह इस्लामिक संस्कृति से मेेल खाती है। ऐसे संस्कार गोडसे में कहा से आये यह अलग शोध का विषय है किन्तु ये संस्कार हिन्दुत्व विरोधी थे, यह पूरी तरह सच है। कुुछ इक्का दुक्का लोग आज भी ऐसी हिंसा के प्रशंसक या समर्थक मिल जाते है जिनकी संख्या धीरे धीरे बढ रही है। समाज को चाहिये कि हिन्दुओं में बढती ऐसी इस्लामिक संस्कृति के विरूद्ध वातावरण बनावे। यदि आप शेर से नहीं टकरा सकते तो गाय की हत्या कर दें यह तो और भी अधिक कायरता है। गोडसे का कार्य और उसका समर्थन पूरी तरह हिन्दू विरोधी माना जाना चाहिये।

स्पष्ट है कि आज हमारे बीच गांधी नहीं है किन्तु जिस समय गांधी ने स्वतंत्रता के लिये योजना बनानी शुरू की उस समय भी देश में कोई स्थापित गांधी नहीं था। करमचंद मोहन दास ने शून्य से आगे बढकर गांधी तक का सफर तय किया है। गांधी के मरते ही यदि फिर से स्थिति बिगडते बिगडते शून्य तक पहुंच गई तो अब फिर से बदलाव के लिये किसी को नये गांधी के रूप में सामने आना चाहिये। फिर से राजनैतिक सत्ता के अकेन्द्रीयकरण की आवाज उठनी चाहिये। मुझे पूरा विश्वास है कि भारत की जनता फिर से नये गांधी का समर्थन करने के लिये तैयार दिखेगी।

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