ऐसे कृपालु, दयालु और परोपकारी चमचे आप को हर जगह मिलेंगे!!!!

Syed Salman Simrihwin
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पुराने ज़माने में राजा-महाराजाओं के दरबार में चाटुकार और विदूषक होते थे। चाटुकारों का काम बादशाहों के बुरे कामों पर भी ताली पीटना और तलवे चाटना होता था…राजा की आंखों का तारा बने रहने के लिए…ये विदूषक दुसरे दरबारियों को भी जमकर अपमानित और बेइज़्ज़त करते थे..राजा को भी ऐसे चाटुकार दरबारी बेहद प्रिय होते थे..अलादीन के चिराग का जिन्न बनकर हर खव्हिशों को पलक झपकते पूरा कर देते थे….चापलूस दरबारी, राजा के दरबार में तरह-तरह के करतब और नौटंकी दिखा कर राजा को अभिभूत करते थे और शहर-शहर, गांव-गांव गवैया बनकर राजा की तारीफ में कसीदे पढ़ते थे…वक़्त के साथ, विदुषक और चाटुकारों में भी आधुनिकता आई…अब वो चमचा कहलाने लगे…आज के चमचों कोे भांडों का बि14702338_10154152192278003_7392173820362457900_nगड़ा हुआ रूप भी कह सकते हैं..चमचा मतलब ‘चरणामृत चाखू’ या ‘चरण मक्खन चाटू’..अब तो इनके चरण-स्पर्श से दूसरे भी इंस्पिरेशन लेने लगे हैं…असल में चमचा शब्द सही भी है..सटीक भी..यूं तो रसोई में तरह-तरह के चमचे होते हैं, जैसे छोटा चमचा, बड़ा चमचा, खाना परोसने का चमचा, खाने का चमचा, मीठा खाने का चमचा, चाय में चीनी मिलाने का चमचा, सीरप, टॉनिक और दवा पीने का चमचा..आदि-आदि। इनके फीमेल वर्जन को चमची भी कहते हैं..बावर्चीखाने में इन चमचों और चमचियों की ज़रूरत और इनकी उपयोगिता एक गृहिणी ही बेहतर जान सकती है..इसी तरह समाज में भी तरह-तरह के चमचों का पूरा समावेश है..पर गज़ब ये है कि यहाँ चमचों के भी चमचे होते हैं..ये बात सोलह आने सच है कि रसोई में चमचे जितने श्रेष्ठ हैं, समाज में ये चमचे उतने ही पथभ्रष्ट की पराकाष्ठा से लबालब हैं..आज के चमचों की ख़ासियत और काबिलियत ये है कि समाज में अपना बरतन ये स्वयं ढूंढ लेते हैं..और ये उस बरतन के लिए कितने उपयोगी हो सकते है, ये भी स्वयं ही बताते हैं। जैसे ही इन्हें अपनी पसंद का बरतन मिलता है ये उसकी पैंदी से जोंक की तरह चिपक जाते हैं। ये चमचे ऐसा बरतन ढूंढते हैं जिसमें इनकी बीसो उंगलियां घी में और मुंह, दुध मलाई और मक्खन मे रहे..चरण चुबंन में इनकी असीम श्रद्धा तो होती ही है..शानदार महारथ भी हासिल होती है..ऐसे कृपालु, दयालु और परोपकारी चमचे आप को हर जगह मिलेंगे, दफ़्तर, व्यापार, सरकार हर जगह। समाज का कोई कोना इनसे बचा नही है..ऊपरवाले ने भी इन चमचों को ‘कैक्टस’ और जलकुंभी वाली प्रवृति से लापलोप और लबरेज़ बनाया है..जो कहीं भी आसानी से फल-फूल जाते हैं..पर अपने आसपास के फूलों की खुशबू निचोड़ कर उन्हें बदरंग और गंधहीन बना देते हैं। कर्म से इन्हें कोई मतलब नहीं होता। इनकी निगाह तो बस निशाना बींधने पर ही रहती हैं। काम कैसे होना है, किस तरह होना है से इन्हें कोई मतलब नहीं, काम होना चाहिए उसके लिए कोई भी हद इनके लिए बहुत मामुली होती है। चमचों की विशेषताओं को जानने के लिए भी एक विशिष्ठ ज्ञान वाली खासियत होनी चाहिए…ये वही जान सकते हैं जिन्हें चमचों के बिना नींद भी नहीं आती..हम जैसे अखंड मूर्ख और अज्ञानियों को उनकी उपयोगिता का अल्प अंदाज़ा भी नहीं होता.. हम जैसे लोग तो बस इनकी छातियों में छेद ही खोजते रह जाते हैं, पर ये अपने समय और संबंधों का पुरा सदुपयोग कर अपना हर काम निकाल लेते हैं। उम्मीद है आपकी मुलाकात भी समय दर समय ऐसे चमचों से होती रहती होगी..ये पहले भी थे, आज भी हैं, आगे भी रहेंगे। रंग बदलते है, रुप बदलते हैं, बदलते रहेंगे। इनके कद्रदान इन्हें हमेशा प्रश्रय देते रहेंगे। और ये ऐसे ही फलते फूलते रहेंगे। क्योंकि इनका आस्तित्व आरंभ से शुरू होकर आरंभ पर ही ख़त्म होता है..शब्दकोष में इनकी प्रजाति का शायद समापन नहीं।

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