बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना – ”कहो दिल से अखिलेश भैया फिर से”

Shahbaz Rashadi tj

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कहो दिल से अखिलेश भैया फिर से “
बेगाने की शादी में अब्दुल्ला दिवाना!”
समाजवादी के घरेलू सियासी कलह पर सब से जादा मातम उत्तर प्रदेश के मुसलमान मनाने में लगे हैं । कोई भय्या के लिए जवानी कुर्बान करे दे रहा है तो कोई रफीकुल मुल्क के लिए कडकडाती ठंड में रोडो की खाक छान रहा है। तमाम घटना क्रम के लिये जितना मुसलमान बेचैन दिख रहा है यकीन मानो उतनी बेचैनी यादवों को भी न होगी।

एक तरफ कुछ हस्सास किस्म के मुसलिम गैर मुस्लिम इस लिये परेशान नजर आ रहे है कि आखिर मुसलमानों का यह जमीर फरोश तबका उस वक्त रोडो पर क्यों नहीं उतरता जब उस से किये वादे से यह नौटंकी मुह फेर लेते हैं?उस वक्त इनकी जवानी की सारी गर्मी क्यों शर्द पड जाती है जब दंगाइयों को खुला छूट देकर मुस्लिमों की बस्तियां जलवा कर उनकी मां बहनों की आबरू रेजी की जाती है?इनके लहु में उस वक्त हरारत क्यों नही आती जब अपनी जिन्दगी के कीमती वक्त को जेल की काल कोठरीयों के हवाले करने के बाद अदालतों से मुस्लिम नौजवान बेकसूर छूटते है तो उन्हें जिन्दगी के बर्बाद लम्हों का मुआवजा न देकर उलटे ऊपरी अदालतों में अपील कर के इन बेकसूरों की जिन्दगी को मजीद नर्क बनाने की कोशिश की जाती हैं। यह उस वक्त अपनी वफादारी का जुनून क्यो नही दिखाते जब तुम से तुम्हरे मुस्तकबिल को तारीक करने की गर्ज से जामे मिल्लिया की जमीन के खिलाफ तुम्हारे यह फर्जी गमगुसार खड़े नजर आते हैं?

जमीर फरोशों अपने नाम निहाद खैर क्वाह सियासी आका से यह सवाल क्यों नही पूछते की तुम्हें जेल से रिहा नौजवानों को सजा दिलाने की फिक्र दूबारा अपील करने पर मजबूर तो कर देती हैं पर जियाउल हक से लेकर खालिद मुजाहिद के कातिलों के मामले में तुम्हारे हाथ क्यों काँप जाते हैं?
भैय्या तुम संघर्ष करो, “रफीकुल मुल्क “मुलायम सिंह के हिमायत में गला फाड़ने वालों नजीब के लिये इंसाफ मांग रहे ए.एम.यु.के छात्रों के ऊपर बरसाई गई लाठियों की भी तुम्हें फिक्र है?

बेगैरतो तुम कभी तो अपनी ताकत का सही इस्तेमाल करो।

नोट : लेखक के निजी विचार हैं, तीसरी जंग का कोई सरोकार नहीं है, लेख सोशल मीडिया से प्राप्त है।

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