“बेहया की बलाए दूर, मारे जूता उतरे नूर”…तो आप लोग अपने चेहरे और नूरानी करायें!

Izhar Sayyed Arif 

————————-
सभी मुस्लिम मित्रों के लिए एक बहुत ही सुखद समाचार है के उत्तर प्रदेश से प्राप्त फीड बैक में अभी तक बीजेपी सबसे आगे है और अगर अखिलेश ने पैतरा ना बदला तो बीजेपी की सरकार बनेगी। अखिलेश के बारे में बाद में बात करते है पहले ज़रा मुस्लिम समाज की जहालत पर एक नज़र :

1… इस बार मुसलमानो का एक अच्छा खासा मगर प्रतिक्रियावादी भाग, बहुत समझाने के उपरांत भी ओवैसी को समर्थन में जी-जान लगाए दे रहा था. मगर ओवैसी को अभी तक 1499473_690800980964016_44074517_nचुनाव लड़ने के लिए कैंडिडेट्स ही नहीं मिल रहे है. इस पर भक्तों (मीम) की वही चिरपरिचित बेहयाई वाली प्रतिक्रिया है के ” जंगल में शेर बहुत कम मिलते है, इसलिए कैंडिडेट ( शेर) नहीं मिल रहे है. ( जो मिल चुके है वही अच्छे खासे वोट काट कर कुछ सीटें सीधे बीजेपी की झोली डाल देंगे।

2… बसपा के बारे में अशिक्षित मुस्लिम समाज को पहले ही ये झुनझुना बीजेपी की सोशल मीडिया टीम ने थमा दिया है के मुज़फ्फर नगर मामले में मायावती कुछ नहीं बोली ! !! अच्छा तर्क है के वोट ( पिछले चुनावों में ) तो आपने जम कर सपा को दिया और जब सपा ने जूते मारे तो भी दोषी मायावती ही. ( हा हा हा ) कम से कम उस वक़्त का मायावती का ये स्टेटमेंट तो याद कर लो के मुस्लिम भाइयों ने धोखा दिया, इसलिए हारे।

3… अब चलते है सपा यानि मुलायम के पास. उनके द्वारा जम कर जूते लगाने के बाद भी भी काफी मुस्लिम ( टुकड़ों की लालच ) मुलायम को ही सपोर्ट कर रहे है. उनका तर्क है के मुज़फ्फर नगर कांड के बाद मुसलमानो की कितनी मदद की थी सपा ने ? भाई गोपनीय मदद की हो पता नहीं मगर हिमांशु कुमार जी साफ लिखा है के मदद के लिए जब फॉर्म जमा कराने जाते तो पुलिस की धमकिया मिलने लगती और उनका पता व् मोबाइल नंबर पूछा जाने लगता था. ( खैर ये कहावत मैंने UP में ही सुनी थी के ” बेहया की बलाए दूर, मारे जूता उतरे नूर.” …..तो आप लोग अपने चेहरे और नूरानी करायें।

4… अंत में बीजेपी का चक्रव्यूह, मुलायम और बीजेपी के सम्बन्ध अब कोई ढकी-छुपी बात नहीं रही; उन्होंने अमर सिंह को वापस बुला लिया यही से उनके सम्बन्ध और प्रगाढ़ व् पतन का रास्ता खुल गया जब उनकी और सुभाष चंद्रा के बीच कानाफूसियों का दौर चला. साफ था के वो केवल और केवल बीजेपी से ही गठबंधन करेंगे। मगर तभी हालात को देखकर ये लगने लगा के शायद सपा को स्पष्ट बहुमत न मिल जाये या अखिलेश का झुकाव कुछ कांग्रेस की तरफ देखकर वही अंग्रेजों का चिरपरिचित फंडा ” फूट डालो – राज करो” अपनाया गया और इस बार भाई को भाई से, पडोसी को पडोसी से और हिन्दू को मुस्लिम से लड़ाने के बजाये एक बिलकुल ही अर्वाचीन फार्मूला लगाया गया “बाप को बेटे से ” … नुस्खा बेहद कामयाब रहा। यहाँ तक के साइकिल के पार्ट्स तक बंटने की नौबत आ गयी । साइकिल पार्ट्स का अभी तक बंटवारा नहीं हो सका है।

………….अब वापिस चलते है अखिलेश के पास। अखिलेश अभी सियासत के बहुत पुराने खिलाडी नहीं है इसलिए कहा जा सकता है के उनके अंदर मानवता या नैतिकता अभी कही न कहीं बाकी है। उन्होंने प्रियंका ( कांग्रेस ) अजीत सिंह ( लोक दल ) अर्थात जाट वोट ( चौधरी चरण सिंह लॉबी ) और नितीश कुमार ( जदयू ) Pact with RJD of लालू प्रसाद यादव से गठबंधन की बात शुरू कर दी। इस गठबंधन का होना अब सुनिश्चित माना जा रहा है। यानि उलटे बांस वापस दिल्ली को लद जाने की सम्भावना फिर प्रबल हो गई जिसपर नोटबंदी अंतिम कील साबित हो सकती है। ( इतिश्री ) ..एस. इज़हार आरिफ।

Share

Leave a Reply

%d bloggers like this: