समाजवादी तख्तापलट पर विशेष-सम्पादकीय

सुप्रभात-tj

साथियों,
नववर्ष की प्रथम वेला पर यदुवंशी समाज वादियों ने एक नया ऐतिहासिक इतिहास रच दिया और पहले जमाने में होने वाले तख्ता पलट की याद ताजा हो गयी।जिन नेता जी के चरखा दाँव के सामने आज तक किसी का कोई दाँव नहीं चल पाया था उन्हीं का चरखा दाँव उनके सुपुत्र ने उनके ऊपर लगा दिया।इतिहास साक्षी हैं कि आजादी के राजनीति में जिस तरह पिता पुत्र में उखाड़ पछाड़ मचा है ऐसा शायद इससे पहले नहीं हुआ है।यह बात अलग है कि तमाम लोग ऐसे हैं जिनकी माँ दूसरी पार्टी और बेटा दूसरी पार्टी में हैं किन्तु इस तरह तख्ता पलट नहीं हुआ है।भ्रष्टाचार के लिये बदनाम कबीना मंत्री रहे गायत्री प्रजापति के मंत्रिमंडल से निष्कासन से शुरू हुआ महाभारत मुलायम सिंह की बर्खास्तगी तक पहुँच गया है। सपा संस्थापक अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव ने अखिलेश को मुख्यमंत्री पद से हटाया पार्टी से निष्कासित किया तो अखिलेश ने उन्हें उनके पद से हटाकर उन्हें मार्गदर्शक बनाकर ज्यादा अपमानित होने से बचा लिया।कल सपा के प्रदेश कार्यालय पर जिस तरह कब्जा किया गया और शिवपाल जी की नेम प्लेट ही नहीं बल्कि उनका सारा सामान आनन फानन में निकालकर बाहर फेंक दिया गया।वह किसी सर्जिकल आपरेशन से कम नहीं था।कल रामगोपाल द्वारा बुलाई गये राष्ट्रीय अधिवेशन में शिवपाल को प्रदेश अध्यक्ष पद से तथा मुलायम सिंह यादव को राष्ट्रीय अध्यक्ष पद से हटा दिया गया था।उधर अधिवेशन चल रहा था इधर प्रदेश कार्यालय में अफरा तफरी और आतंक का माहौल छाया रहा।अधिवेशन में एक प्रस्ताव पर मुख्यमंत्री अखिलेश को उनके पिता मुलायम सिंह यादव की गद्दी पर बिठाकर उन्हें मार्गदर्शक बना दिया गया है। यदुवंशी समाजवादियों में छिड़ी महाभारत अभी थमने का नाम नहीं ले रही है और सपा मुखिया ने अपने भाई रामगोपाल को तीसरी बार पुनः निष्कासित कर बागियो के विरुद्ध कार्यवाही करना शुरू कर दिया है।सपा सुप्रीमों ने पाँच जनवरी को राष्ट्रीय अधिवेशन बुलाया है और वह अभी भी अपने को राष्ट्रीय अध्यक्ष मान रहे हैं। यह पहला अवसर है जबकि नेताजी की इज्जत दाँव पर लग गयी है।पाँच जनवरी को होने जा रहे अधिवेशन की तरफ लोगों की निगाहें लगी हैं और यह महाभारत खासोंआम में चर्चा का विषय बनी हुयी है।अखिलेश के राष्ट्रीय अधिवेशन में पार्टी के अधिकांश पदाधिकारी शामिल थे तो इस अधिवेशन में क्या वह दूबारा आयेगें। यह समाजवादी महाभारत मुलायम सिंह के लिये सुखद भी है और दुखद भी हैं।सुखद इसलिए मानी जा रही है क्योंकि उनकी आंखो के सामने उनका होनहार बेटा हर तरह की राजनैतिक लड़ाई से बचाव करके अपने पद की रक्षा करने लायक हो गया है। आसान नहीं होता है नेताजी के चरखा दाँव से बचाव करना लेकिन उनका बेटा उससे भी बचाव करने लायक हो गया है।उसकी भी एक राजनैतिक हैसियत हो गयी है और जनता ने भी उन्हें नेता मान लिया है।दुखद यह है कि मुलायम सिंह यादव जी पहली बार यदुवंशियों के राजनैतिक अखाड़े में अपने साथियों के साथ असहाय से दिखने लगे हैं।इसके बावजूद सपाई मानते हैं कि नेताजी आज भी सर्वमान्य पार्टी के मुखिया हैं और उनके बिना सपा अधूरी रहेगी।चलिए देखते हैं कि पाँच दिसंबर को होने जा राष्ट्रीय अधिवेशन के अगले एपीसोड में यदुवंशी राजनीति क्या गुल खिलायेगी ? पिता पुत्र में सत्ता के लिये संघर्ष करने का इतिहास पुराना आदिकाल से चला आ है अगर अखिलेश अपने पिता से सत्ता के लिये संघर्ष कर रहें है तो कोई खास बुराई भी नहीं है।धन्यवाद।। भूलचूक गलती माफ।। सुप्रभात / वंदेमातरम् / गुडमार्निग / अदाब / शुभकामनाएँ ।।ऊँ भूर्भवः स्वः—–/ ऊँ नमः शिवाय।।।

भोलानाथ मिश्र
वरिष्ठ पत्रकार/समाजसेवी
रामसनेहीघाट,बाराबंकी यूपी।

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