Film review : ”यमला पगला दीवाना फिर से” एक बार ज़रूर देखें

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रवि बुले
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निर्माताः सनी देओल
निर्देशकः नवनीत सिंह
सितारेः सनी देओल, बॉबी देओल, धर्मेंद्र, कृति खरबंदा
रेटिंग *1/2

अगर आप देओल पिता-पुत्रों के फैन हैं तो इस फिल्म को देख कर दुख होगा। धर्मेंद्र, सनी, बॉबी का स्टारडम यहां पूरी तरह गायब है। लगता है किसी भी तरह से बस वे अपने करियर को ढहने से बचाए रखना चाहते हैं परंतु यमला पगला दीवाना फिर से जैसी फिल्म उन्हें और बर्बाद कर देती है। देओल परिवार को नई शुरुआत करने के लिए सबसे पहले अपने आसपास के उन लोगों को हटाने की जरूरत है, जो उन्हें नई दुनिया देखने नहीं दे रहे। यह फिल्म देख के साफ हो जाता है कि उनकी टीम में नई ऊर्जा और नई सोच वाले लोग नहीं हैं। खुद तीनों सितारे भी शायद अपनी पुरानी छवि से बाहर आकर काम करने को तैयार नहीं। तीनों में से एक भी यहां ऐस किरदार में नहीं कि आप उसके लिए फिल्म देखें।

आप इन प्रतिभाओं के लिए सिर्फ दुख मना सकते हैं कहानी वैध पूरन (सनी देओल) की है, जो आयुर्वेद का डॉक्टर है। उसके पास परिवार में चला आ रहा सदियों पुराना वज्र कवच नामक दवा का फार्मूला है, जिससे बादशाह अकबर को संतान हुई थी और ब्रिटेन की महारानी विक्टोरिया के मुंहासे ठीक हो गए थे! तमाम दवा कंपनियां वज्र कवच का फार्मूला मांग चुकी हैं परंतु पूरन नहीं देता। अंततः एक कंपनी वाला इसे पूरन के घर से चोरी करा के पेटेंट करा लेता है। पूरन अब अपने मकान में दशकों से रह रहे बूढ़े वकील किरायेदार परमार (धर्मेंद्र) के माध्यम से कोर्ट में केस लड़ता है। एक बेहद कमजोर कहानी में निर्देशक नवनीत सिंह से कॉमेडी का तड़का लगाने की कोशिश की है।

कॉमेडी का ज्यादातर जिम्मा बॉबी के कंधों पर डाला गया है। उन्हें इस रोल में देखना त्रासद लगता है। वह हंसा नहीं पाते। उन्हें देख कर आप रो सकते हैं। कई जगहों पर महसूस होता है कि फिल्म बॉबी के करियर को नए सिरे से लॉन्च करने की कोशिश कर रही है। सनी देओल 60 पार की उम्र में अपने ढाई किलो के हाथ वाला पुराना चमत्कार पैदा करने की कोशिश करते हैं। धर्मेंद्र चुपके-चुपके वाला जादू पैदा करना चाहते हैं परंतु गुजरा हुआ वक्त नहीं लौटता। पर्दे पर भी नहीं। यमला पगला दीवाना (2011) की यह तीसरी कड़ी है। दूसरी वाली पहली से कमजोर थी और तीसरी वाली दूसरी से कमतर है। फिल्म की मूल कोशिश हंसाने की है और वह इसमें नाकाम है। रोमांस गायब है। गीत-संगीत में कुछ विशेष नहीं है।

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यमला पगला दीवाना फिर से : फूहड़ कौमेडी


पता नहीं फिल्मकारों को कब समझ में आएगा कि काठ की हांडी बार बार आग पर नहीं चढ़ती. देओल परिवार की 2011 की सफल हास्य फिल्म ‘‘यमला पगला दीवाना’’ का सिक्वल 2013 में ‘यमला पगला दीवाना 2’ के नाम से आया, तब इसे दर्शकों ने पसंद नहीं किया था. मगर पूरे पांच साल बाद उसका एक और सिक्वल ‘‘यमला पगला दीवना फिर से’’ लेकर आए हैं, जिसे देखकर दर्शक यही कहता है- कहां फंसाओ नाथ.


फिल्म की कहानी के केंद्र में अमृतसर के आयुर्वेदिक वैद्य पूरन सिंह (सनी देओल), उनका भाई काला (बौबी देओल) और किराएदार जयंत परमार (धर्मेंद्र) हैं. जयंत परमार पेशे से वकील हैं और साइड ट्रेक वाले स्कूटर पर सवारी करते रहते हैं. उस वक्त पुरानी फिल्मों के गाने बजते हैं.. वैद्य पूरनसिंह चुप रहते हैं, पर जब कोई उन्हें गुस्सा दिला दे, तो वह उसे छोड़ते नहीं हैं. पूरे शहर में पूरनसिंह की काफी इज्जत है, जबकि 40 साल के अविवाहित काला की कोई इज्जत नहीं है. काला तो कनाडा जाने के सपने देखता रहता है. पूरन सिंह के पास पुश्तैनी ‘‘वज्र कवच’’ नामक दवा है, जिसका तोड़ किसी के पास नही है. यह दवा नपुंसकता व पिंपल दूर करने के साथ ही हर बीमारी का इलाज कर देती है. फिल्म में दावा किया गया है कि अकबर को जब वज्र कवच दवा दी गयी, तभी उनकी संतान हुई. बहरहाल, कई मल्टीनेशनल कंपनियां ‘वज्र कवच’ का फार्मूला लेना चाहती हैं. एक दवा कंपनी के मालिक माफतिया (मोहन कपूर) काला की मदद से पूरन सिंह से बात करता है, पर बात नहीं जमती. माफतिया, पूरनसिंह को धमकी देकर चला जाता है.

उसके बाद पूरनसिंह व उनकी दवाओं पर शोध करने के लिए गुजरात से एक डाक्टर चिकू (कृति खरबंदा) आती हैं. चिकू पर काला लट्टू हो जाते हैं. उधर चिकू चोरी से ‘वज्र कवच’ का फार्मूला चुरा कर वापस चली जाती है. वह यह फार्मूला माफतिया को दे देती है. माफतिया उसे अपनी कंपनी के साथ पेटेंट करवाकर पूरनसिंह को कानूनी नोटिस भेज देते हैं. उसके बाद कहानी पंजाब से गुजरात पहुंच जाती है. फिर कई घटनाक्रम तेजी से बदलते हैं. अंततः चिकू अदालत में सच बयां कर देती है.

अति कमजोर कहानी व पटकथा के चलते फिल्म हंसाने की बजाय बोझिल बनाती है. कहानी सुनाने का ढंग भी गड़बड़ है. निर्देशन काफी कमजोर है. परिणामतः सनी देओल और धर्मेंद्र का अभिनय भी कमजोर पड़ जाता है. इतना ही नहीं इस फिल्म की गति काफी धीमी है और बेवजह लंबी खींची गयी है. इसे एडीटिंग टेबल पर ठीक किया जाना चाहिए था. इंटरवल के बाद तो फिल्म काफी सुस्त हो जाती है. फिल्म में ‘वज्र कवच’ दवा का मुद्दा भी हवा में ही नजर आता है. फिल्म के कई दृश्य ‘सब टीवी’ के अति लोकप्रिय हास्य धारावाहिक ‘तारक मेहता का उल्टा चश्मा’ की याद दिलाते हैं. यह पूर्णरूपेण एक लोकप्रिय फ्रेंचाइजी को भुनाने का असफल प्रयास है. जबकि सलमान खान, शत्रुघ्न सिंहा, रेखा आदि भी कुछ पलों के लिए इस फिल्म में नजर आते हैं, मगर उनकी उपस्थिति से भी फिल्म अच्छी नहीं होती.

जहां तक अभिनय का सवाल है, तो फिल्म देखकर अहसास होता है कि यह फिल्म बौबी देओल को अभिनय में नए सिरे से स्थापित करने के लिए बनायी गयी है. पर देओल परिवार यह भूल गया कि काठ की हांडी बार बार नहीं चढ़ती. पूरी फिल्म में सबसे अधिक समय तक नजर आने वाले बौबी देओल अपने अभिनय से काफी निराश करते हैं. धर्मेंद को महज कैरीकेचर बनाकर रख दिया गया है. सनी देओल भी प्रभावित नहीं कर पाए. कृति खरबंदा सिर्फ खूबसूरत नजर आयी हैं, मगर अभिनय के स्तर पर काफी निराश करती हैं.

फिल्म का गीत संगीत भी प्रभावहीन है.

दो घंटे 28 मिनट की अवधि वाली फिल्म का निर्माण ‘‘सनी साउंड प्रा. लिमिटेड’’ के बैनर तले किया गया है. फिल्म के निर्देशक नवनीत सिंह, पटकथा लेखक धीरज रतन व बंटी राठौड़, संगीतकार विशाल मिश्रा, राजू सिंह, संजीव दर्शन, कैमरामैन जीतन हरमीत सिंह व कलाकार हैं- धर्मेंद्र, सनी देओल, बौबी देओल, कृति खरबंदा, रेखा,सतीश कौशिक, शत्रुघ्न सिंहा, सलमान खान, बिन्नी ढिल्लों, जौनी लीवर, असरानी, शरत सक्सेना, सोनाक्षी सिन्हा, परेश गणात्रा व अन्य.