#औरत और पर्दा part-1 :: इस्लाम ने औरतों को क़ैद नहीं किया बल्कि गंदी निगाहों से बचा कर महफ़ूज़ किया है!

Azhar Shameem
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एक बार एक शख़्स बैंक से एक बड़ी रक़म कैश लेकर निकला और उसे खुले आम हाथों में लेकर सड़क पर जा रहा था । कुछ बदमाशों ने उसे लूट लिया. वह शख़्स अपनी रिपोर्ट लिखवाने थाने गया, तो पुलिस ने कहा : आपको पैसों को छुपा कर निकलना चाहिये था, खुले आम लेकर निकल कर तो आपने ख़ुद चोरों को दावत दी । चोरों का तो पेशा ही चोरी करना है, सरे आम पैसों को सबको दिखाते हुए निकलने से आपकी लूट हुई, इसलिये इस लूट के ज़िम्मेदार आप ख़ुद हैं।

मगर उस शख़्स ने अपनी ग़लती नहीं मानी और बार बार यह कहता रहा कि मैं क्यों अपने पैसों को छुपा कर निकलूँ, चोरों को अपनी सोच बदलनी चाहिये ।
पुलिस ने कहा : तेरे से बड़ा कोई बेवक़ूफ़ नहीं होगा, चोर तो अपनी सोच नहीं बदलेंगे, तू ही बार बार लुटता रह।

इसी तरह जब कहीं किसी औरत की इज़्ज़त पर हमला होता है और औरतों की इज़्ज़त करने वाले यह कहते हैं कि औरतों को अपने जिस्म को ढक कर परदे में घर से बाहर निकलना चाहिये, तो औरतों की झूठी आज़ादी की बात करने वाले भी यही बात करते हैं कि औरतें ही क्यों अपने जिस्म को ढकें, मर्दों को अपनी सोच बदलनी चाहिये।

हम अपने पैसों को और क़ीमती माल को तो छुपा कर निकलते हैं कि कहीं कोई चोर हमें लूट न ले । मगर अपनी बीवी, बहन और बेटियों के जिस्म को छुपा कर नहीं निकलते।
क्या हम अपनी बीवी, बहन और बेटियों की इज़्ज़त को क़ीमती नहीं समझते ?

औरतों की हवस के पुजारी मर्द और मग़रिबी तहज़ीब से मुतास्सिर औरतें भी परदे को क़ैद समझते हैं । इसलाम ने औरतों को क़ैद नहीं किया बल्कि उन्हें हवस परस्तों की गंदी और ग़लीज़ निगाहों से बचा कर महफ़ूज़ किया है और society में इज़्ज़त वाला मुक़ाम दिया है । इसलाम की दी हुई आज़ादी और मग़रिबी तहज़ीब की दी हुई आज़ादी में यह फ़र्क़ है कि इसलाम सिर्फ़ तरबियत की बुनियाद पर आज़ादी देता है । जबकि मग़रिबी तहज़ीब जिस्म की नुमाइश की बुनियाद पर आज़ादी देती है । इसलाम ने औरत को उसकी पाक हदों में रहते हुए society के लिये कारआमद (resultful) बनाया है, जबकि मग़रिबी तहज़ीब ने औरत को नुमाइश और चारा बनाकर society में एक बिकाऊ माल बनाया है जहाँ औरत का कपड़ा जितना छोटा होता जाता है । उसकी क़ीमत में इज़ाफ़ा होता रहता है । जिस society में औरत की market value commodity की तरह हो यानी औरत को बस पैसा कमाने का ज़रिया समझा जाता हो, उस society का comparison Islamic Society से करना सरासर नाइंसाफी ही होगी।

Shakeel Khan ka comment.

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