खुदा मुशरिकों से बेज़ार है और उसका रसूल भी, पस अगर तुम तौबा कर लो, तो तुम्हारे हक़ में बेहतर हैं!!

खुदा मुशरिकों से बेज़ार है और उसका रसूल भी, पस अगर तुम तौबा कर लो, तो तुम्हारे हक़ में बेहतर हैं!!

Azhar Shameem
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Anwarul Hassan ki post – quran akhiri kitab se
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पैम्फलेट मे लिखी पहले क्रम की आयत हैं:
‘‘फिर, जब हराम के महीने बीत जाएं, तो ‘मुशरिकों’ को जहां कही पाओ कत्ल करो, और पकड़ो, और उन्हे घेरो, और हर घात की जगह उनकी ताक मे बैठो। फिर यदि वे ‘तौबा’ कर ले, नमाज कायम करें और जकात दे, तो उनका मार्ग छोड़ दो। नि:सन्देह अल्लाह बड़ा क्षमाशील और दया करने वाला हैं। (कुरआन,सूरा-9,आयत-5)

इस आयत के संदर्भ में-जैसा कि हजरत मुहम्मद (सल्ल0) की जीवनी से स्पष्ट हैं कि मक्का में और मदीना जाने के बाद भी मुशरिक काफिर कुरैश, अल्लाह के रसूल (सल्ल0) के पीछे पड़े हुए थे। वे मुहम्मद (सल्ल0) को और सत्य धर्म इस्लाम को समाप्त करने के लिए हर सम्भव कोशिश करते रहते। काफिर कुरैश ने अल्लाह के रसूल को कभी चैन से बैठने नही दिया। वे उनको सदैव सताते ही रहे। इसके लिए वे सदैव लड़ार्इ की साजिश रचते रहते।

अल्लाह के रसूल (सल्ल0) के हिजरत के छठवें साल जीकादा महीने में आप (सल्ल0) सैकड़ो मुसलमानों के साथ हज के लिए मदीना से मक्का रवाना हुए। लेकिन मुनाफिकों (यानी कपटाचारियों) ने इसकी खबर कुरैश को दे दी।

कुरैश पैगम्बर मुहम्मद (सल्ल0) को घेरने का कोर्इ मौका हाथ से जाने न देते इस बार भी वे घात लगाकर रस्ते मे बैेठ गए। इसकी खबर मुहम्मद (सल्ल0) को लग गर्इ। आपने रास्ता बदल दिया और मक्का के पास हुदैबिया कुएं के पास पड़ाव डाला। कुए के नाम पर ही इस जगह का नाम हुदैबिया था।

जब कुरैश को पता चला कि मुहम्मद अपने अनुयायी मुसलमानों के साथ मक्का के पास पहुंच चुके हैं और हुदैबिया पर पड़ाव डाले हुए हैं, तो काफिरो ने कुछ लोगो को आपकी हत्या के लिए हुदैबिया भेजा, लेकिन वे सब हमले से पहले ही मुसलमानों के द्वारा पकड़ लिए गए और अल्लाह के रसूल (सल्ल0) के सामने लाए गए। लेकिन आपने उन्हे गलती का एहसास कराकर माफ कर दिया।

इसके बाद हज़रत मुहम्मद (सल्ल0) ने लड़ार्इ-झगड़ा, खून-खराबा टालने के लिए हज़रत उस्मान (रजि0) का कुरैश से बात करने के लिए भेजा। लेकिन कुरैश ने हज़रत उस्मान (रजि0) को कैद कर लिया। इधर हुदैबिया में पड़ाव डाले अल्लाह के रसूल (सल्ल0) को खबर लगी कि हज़रत उस्मान (रजि0) कत्ल कर दिए गए। यह सुनते ही मुसलमान हज़रत उस्मान (रजि0) के कत्ल का बदला लेने के लिए तैयारी करने लगे।

जब कुरैश को पता चला कि मुसलमान अब मरने-मारने को तैयार हैं और अब युद्ध निश्चित हैं तो उनसे बातचीत के लिए सुहैल-बिन-अम्र को हजरत

मुहम्मद(सल्ल0) के पास हुदैबिया भेजा। सुहैल से मालूम हुआ कि उस्मान (रजि0) का कत्ल नही हुआ है, वे कुरैश की कैद मे हैं। सुहैल ने हज़रत उस्मान (रजि0) का कैद से आजाद करने व युद्ध टालने के लिए कुछ शर्ते पेश की।

• पहली शर्त थी-इस साल आप सब बिना उमरा (काबा-दर्शन) किए लौट जाएं। अगले साल आएं , लेकिन तीन दिन बाद चले जाएं।
• दूसरी शर्ते थी-हम कुरैश का कोर्इ आदमी मुसलमान बनकर यदि मदीना आए तो उसे हमे वापस किया जाए। लेकिन यदि कोर्इ मुसलमान मदीना छोड़कर मक्का मे आ जाए, तो हम वापस नही करेंगे।
• तीसरी शर्त थी-कोर्इ भी कबीला अपनी मर्जी से कुरैश के साथ या मुसलमानों के साथ शामिल हो सकता हैं।
• समझौते मे चौथी शर्त थी कि-इन शर्तो को मानने के बाद कुरैश और मुसलमान न एक-दूसरे पर हमला करेंगे और न ही एक-दूसरे के सहयोगी कबीलो पर हमला करेंगे। यह समझौता 10 साल के लिए हुआ, जो हुदैबिया समझौते के नाम से जाना जाता हैं।
• हालांकि ये शर्ते एक तरफा और अन्यायपूर्ण थी, फिर भी शान्ति और सब्र के दूत मुहम्मद (सल्ल0) ने इन्हे स्वीकार कर लिया, ताकि शान्ति स्थापित हो सके।

लेकिन समझौता होने के दो ही साल बाद बनू-बक्र नामक कबीले ने जो मक्का के कुरैश का सहयोगी था, मुसलमानों के सहयोगी कबीलो खुजाआ पर हमला कर दिया। इस हमले मे कुरैश ने बनू-बक्र कबीले का साथ दिया ।

खुजाआ कबीले के लोग भागकर हज़रत मुहम्मद (सल्ल0) के पास पहुंचे और इस हमले की खबर दी। पैगम्बर मुहम्मद (सल्ल0) ने शान्ति के लिए इनता झुककर समझौता किया था, इसके बाद भी कुरैश ने धोखा देकर समझौता तोड़ डाला।

अब युद्ध एक आवश्यकता थी, धोखा देने वालो को दण्डित करना शान्ति स्थापना के लिए जरूरी था। इसी जरूरत को देखते हुए अल्लाह की ओर से सूरा-9 की आयते अवतरित हुर्इ हुर्इ।

इनके अवतरित होने पर नबी सल्ल0 ने सूरा-9 की आयतें सुनाने के लिए हजरत अली (रजि0) को मुशरिकों के पास भेजा। हजरत अली (रजि0) ने जाकर मुशरिकों से यह कहते हुए कि मुसलमानों के लिए अल्लाह का फरमान आ चुका हैं, उनको सूरा-9 की ये आयते सुना दी:

‘‘(ऐ मुसलमानों! अब) खुदा और उसके रसूल की तरफ से मुशरिकों से, जिनसे तुमने अहद (समझौता) कर रखा था, बेजारी (और जंग की तैयारी) हैं।
तो (मुशरिको! तुम) जमीन मे चार महीने चल फिर लो और जान रखो कि तुम खुदा को आजिज़ न कर सकोगे और यह भी कि खुदा काफिरों को रूसवा करने वाला हैं।

और हज्जे-अक्बर के दिन खुदा और उसके रसूल की तरफ से लोगो को आगाह किया जाता है कि खुदा मुशरिकों से बेजार है और उसका रसूल भी (उनसे दस्तबरदार हैं)। पस अगर तुम तौबा कर लो, तो तुम्हारे हक में बेहतर हैं और न मानों (और खुदा से मुकाबला करो) तो जान रखो कि तुम खुदा को हरा नही सकोगे और (ऐ पैगम्बर!) काफिरो को दु:ख देनेवाले अजाब की खबर सुना दो।’’ (कुरआन,सूरा-9,आयतें-1-3)

अली (रजि0) ने मुशरिकों से कह दिया कि ‘‘यह अल्लाह का फरमान हैं, अब समझौता टूट चुका हैं और यह तुम्हारे द्वारा तोड़ा गया हैं इसलिए अब इज्जत के चार महीने बीतने के बाद तुमसे जंग (यानी युद्ध) हैं।’’

समझौता तोड़कर हमला करने वालों पर जवाबी हमला कर उन्हें कुचल देना मुसलमानों का हक बनता था, वह भी मक्का के उन मुशरिकों के विरूद्ध जो मुसलमानों के लिए सदैव से अत्याचारी व आक्रमणकारी थें। इसी लिए सर्वोच्च न्यायकर्ता अल्लाह ने पांचवीं आयत का फरमान भेजा।
इस पांचवी आयत से पहले वाली चौथी आयत हैं:

‘‘अलबत्ता, जिन मुशरिकों के साथ तुमने अहद किया हो, और उन्होने तुम्हारा किसी तरह का कुसूर न किया हो और न तुम्हारे मुकाबले मे किसी की मदद की हो, तो जिस मुद्दत तक उनके साथ अहद किया हो, उसे पूरा करो (कि) खुदा परहेजगारों को दोस्त रखता हैं।’’ (कुरआन,सूरा-9,आयत-4)
इससे स्पष्ट हैं कि जंग का यह एलान उन मुशरिको के विरूद्ध था जिन्होने युद्ध के लिए उकसाया, मजबूर किया, उन मुशरिकों के विरूद्ध नहीं जिन्होने ऐसा नही किया। युद्ध का यह एलान आत्मरक्षा व धर्मरक्षा के लिए था।

अत: अन्यायियों, अत्याचारियों द्वारा जबरदस्ती थोपे गए युद्ध से अपने बचाव के लिए किए जानेवाले किसी भी प्रकार के प्रयास को किसी भी तरह झगड़ा कराने वाला नहीं कहा जा सकता। अत्याचारीयों और अन्यायियों से अपनी व अपने धर्म की रक्षा के लिए युद्ध करना और युद्ध के लिए सैनिकों को उत्साहित करना धर्मसम्मत हैं।

इस पर्चे छापने और बॉटने वाले लोग क्या नही जानते कि अत्याचारियों और अन्यायियों के विनाश के लिए ही योगेश्वर श्री कृष्ण ने अर्जुन को गीता का उपदेश दिया था। क्या यह उपदेश लड़ार्इ-झगड़ा करानेवाला या घृणा फैलाने वाला है? यदि नही, तो फिर कुरआन के लिए ऐसा क्यो कहा जाता हैं?

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