“हम पश्तो जबान पहले होटल नहीं जाते ” – आदरणीय पिताजी

अबु सिद्रा असद
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“हम पश्तो ज़बान पहले होटल नहीं जाते ” – आदरणीय पिताजी
आज मैं आपको अपने समाज यानी पश्तून समाज के बारे में कुछ बताऊंगा। पश्तून समाज से मतलब भारत में 100 या डेढ़ 100 साल से रह रहे वो पठान है जो अभी तक पश्तो भाषा और सभ्यता भूले नहीं है।tj
मुझे गर्व तो नही की मैं भी एक पश्तून हूँ क्योकि एक पश्तून होने में मेरा अपना कोई पर्सनल योगदान नहीं है हां शुक्र है कि मैं पश्तून समाज का वंशज हूँ ।
एक बार मैं और मेरे पिताजी को सूरत जाना हा। तब सूरत जाने की एक ही सूरत थी जो बदसूरत थी कि हफ्ते में एक फ्लाइट ही दिल्ली से जाती ही।
पापा और मेरे सोचा क्यों न अहमदाबाद तक जहाज़ फिर आगे रेल या बस से जाते है। हम दिल्ली से अहमदाबाद गए शाम को अहमदाबाद पहुचे ,रिक्शा को बोला किसी रिफ्रेशमेंट ढाबे पर चल वो हमें लकिली लकी होटल ले आया जो विख्यात है अपने परिसर में कब्रो को लेकर।
खैर हमने चाय पापे खाये, शाम हो गयी थी मैंने कहा पापा अब हम कल जायेगें सूरत
बोले हां
मका तो आज रात किसी होटल में रुक रहे है
बोले नहीं पश्तून कभी होटल में पहले नहीं रुकता क्योकि एक पश्तून का दुसरे पश्तून पर हक है वो उसके शहर में आया है तो उसका मेहमान है या मैं यह सबक तुझे दूंगा तू बस देख
मका, जिनको हम जानते नहीं उनको ढूंढेंगे कैसे और क्या वो हमें मेहमान बनाएंगे फिर भी मैंने कहा “ओके”
पापा ने लकी रेस्टोरेंट वाले से कहा आपके यहाँ पठान लोग आते होंगे वो बोला हां आते है
पापा ने कहा उनमे से किसी का नंबर देदो
वो बोला मेरे पास फिलहाल नही है पर वो खाने के लिए एक फलाना होटल में आते है वहां से मिल जायेगा
हम फलाना होटल गए वहां खाना खाया। खाने के बाद हमने कहा यहाँ खान लोग आते है उनका नंबर दो
उसने एक का नम्बर दिया
पापा ने कॉल किया स्पीकर खोला
ट्रिंग ट्रिंग हेल्लो, कौन
पापा (पश्तो में) : किधर है??
पश्तून (पश्तो में): आप कौन?
पापा (पश्तो में): आपको क्या करना मैं कौन, मैं पश्तून, तेरे शहर में आया हूँ मुसाफिर हूँ
पश्तून : ओह्ह, आप कहा है पता बताइये
पापा : फलाना होटल
पश्तून : बस हाजी साहब, मैं आया
इतने में 2 बाइक में दो लोग आये
एक दुसरे को देख के समझ गए
क्या हाल, कैसे, सब ठीक, खैरियत से आये इत्यादि हुआ
हम बाइक पे बैठे और निकल लिए
पापा ने फलाना होटल जाने से पहले फ्रूटस ले लिए थे , वो भी साथ में रहे
अब हम उनके घर गए, वहां कुछ और पश्तून भी थे सबने हमारा अभिवादन पान पराग नहीं बल्कि नसवार खाके किया।
अब हम उनके मेहमान थे। उस रात हमने गपशप किया, एक दुसरे को जाना पहचाना , गाँव, गौत्र, कुनबा सब पूछा।
उन्होंने हमारी मेहमान नवाजी की और अगले दिन हम सूरत चले गए
अब वो लोग जब दिल्ली आते है तो हमारे मेहमान बनते है
पिताजी ने मुझे पश्तूनों के एक unwritten code of conduct पश्तून वाली का यह चैप्टर यानी ” मेलमस्त्य” यानी मेहमान नवाजी प्रैक्टिकल में सीखा दिया था
यह कोड ऑफ़ कंडक्ट मुझे सऊदी में बहुत काम आता है। मैं जहा भी सऊदी के नए शहर जाता हूँ ऐसे ही पश्तूनों को ढूंढ कर उनको मेहमान नवाजी का अवसर देता हूँ और खुद भी तैयार हूँ
यह कहानी मैंने इसलिए सुनाई क्योकि दरअसल यह इस्लाम का कोड है जो दुर्भाग्य से 90 फीसद मुस्लिम भूल गए बस अरबी और पश्तून लोग आज भी निभाते है
एक मुस्लिम दुसरे मुस्लिम का भाई है किसी भी फिरके से ऊपर उठ कर 3 दिन मेहमान नवाजी का उसका उसपर हक़ है
यह बहुत सुंदर अनुभव है जो पश्तून निभाते है इसके लिए मैं उनको मुबारकबाद देता हूँ बाकी सभी मुस्लिम को कहता हूँ यह उसूल रखिये चाहे आपका मेहमान मुस्लिम या गैर मुस्लिम।हो
मेरी साइड से हर एक इंसान को दावत है जो मेरा मेहमान बन सकता है मेरे द्वार खुल है।
जय पिताजी

 

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