हज़रते इमाम ग़ज़ाली रहमतुल्लाह अलैह की अज़मत, आपने इस्लाम की श्रेष्ठता को स्थापित किया

Mohammad Arif Dagia
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आज कल के युवा मुस्लिमों का एक बहुत बड़ा वर्ग अक़ीदे के मामले में मतिभ्र्म और गुमराही का शिकार है। बादे वफ़ात नबियों और वलियों की ज़िन्दगी के बारे में न तो वह जानना चाहता है; और न ही बताये जाने पर विश्वास करने को तैयार होता है। तौहीद के नाम पर नबियों और वलियों की शान में गुस्ताखी करना उसने अपना शेवा बना लिया है । लिहाज़ा मेरी नज़र में आज इस्लाम की सबसे बड़ी सेवा यह है कि नवजवानों को इस्लाम के शाश्वत स्वरुप से परिचित कराया जाये और उनको अहले सुन्नत वल जमात के अक़ीदों की तालीम दी जाये ;जो इस्लाम के यथार्थ रूप का प्रतिनिधित्व करते हैं ///
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आज अहले सुन्नत वल जमात के जो अक़ाइद और मामुलात हैं , वे ही हजरत इमाम गजाली और तमाम असलाफे सालिहीन के थे .लिहाज़ा आज मैं हजरत इमाम गजाली रहमतुल्लाह अलैह के चंद अक़ाइद और इरशादात पेश करने की सआदत हासिल करूँगा ताकि गुमराह तबकों को राहे-रास्त नज़र आ सके. फिर यह भी कहना चाहूँगा कि अगर कोई शख्स इन हवालों को नहीं मानता तो उसे यह ऐलान करना पड़ेगा कि वह इमाम गजाली से भी ज्यादा बड़ा आलिम , फ़ाज़िल , मुहद्दिस और मुफस्सिर है ///
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जो लोग हयातुन्नबी ( सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम) का इंकार करते हैं ,और अगर इकरार भी करते हैं तो सिर्फ इतना कि आप सल्लल्लाहो अलैहे व सल्लम महज़ जिस्म के साथ अपनी कब्र-मुबारक में जिंदा भर हैं और इससे ज्यादा आपको कोई अख्तियारात नहीं हैं, उनके अकीदे का रद करते हुए हजरत इमाम गजाली रहमतुल्लाह अलैह का कौल नक़ल करते हुए हजरत इमाम इस्माइल हक्की हनफी ( रहमतुल्लाह अलैह ) अपनी तफसीरे -रुहुल बयान में नकल करते हैं कि —
” यानि इमाम गजाली रहमतुल्लाह अलैह ने फ़रमाया कि हुजुर अलैहिस्सलाम को दुनिया में अपने सहाबा समेत सैर करने का अख्तियार है और आपको बहुत से औलिया ए किराम ने देखा है “///
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हजरत शाह अब्दुल हक मुहद्दिस देहलवी ( रहमतुल्लाह अलैह ) अशअतुल लमआत , बाबे -जियारत में लिखते हैं —
” याने इमाम गजाली रहमतुल्लाह अलैह ने फ़रमाया कि जिस शख्स से उसकी ज़िन्दगी में मदद मांगी जा सकती है ,उससे उसकी वफात के बाद भी मदद मांगी जा सकती है “.
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यहाँ उन कम इल्म हजरात के उन तमाम कुतर्कों का जवाब मिल जाता है जो ” मुंकिरीने-अज़मते अवलिया व् अम्बिया ” हैं . जो सूरे नम्ल और सुरे फातिर कि उन आयतों का हवाला अपने बद अकीदों को सिद्ध करने के लिए देते हैं, जो बुतों के हक में नाजिल हुई, पर जिनका सम्बन्ध वे कब्र में दफ़न अवलिया और अम्बिया से जोड़ कर अपनी बद अक़ीदगी का सबूत देते हुए कहते हैं कि जो कब्र में दफ़न हैं वे न सुन सकते हैं, न तुम्हारी कोई मदद कर सकते हैं !!! .मआज़ अल्लाह ///
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कुछ हजरात जो इनकी तरह एकदम से अज़मते-अवलिया के पुरे मुनकिर तो नहीं, मगर यहाँ तक मानते हैं कि अवलिया अल्लाह जब तक जिंदा थे, तब तक उनके पास मदद करने की ताकत थी, परन्तु मरने के बाद अब उनमे न सुनने की ताकत है, न किसी की मदद करने की तो हजरत इमाम गजाली रहमतुल्लाह अलैह का उपरोक्त इरशाद उनके इस अकीदे को झुठला देता है और साबित करता है कि जिनसे उनकी ज़िन्दगी में मदद मांगी जा सकती थी ( याने अम्बिया और अवलिया ) उनकी वफात के बाद भी उनसे मदद मांगी जा सकती है, और वे अल्लाह की अता से मदद करने पर भी कादिर हैं ///
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अब अगर कोई शख्स, जिसे अपने इल्मो-अमल पर नाज़ हो, हजरत इमाम गजाली रहमतुल्लाह के इन इरशादात पर भी बहसों मुबाहिसा का शौक रखता हो तो उनके लिए यह हिकायत बयान कर दूँ कि हजरत इमाम अबुल हसन शाजिली रहमतुल्लाह अलैह कहते हैं —” मैं ख्वाब में ज़ियारते-रसूल सल्लल्लाहो अलैहे व सल्लम से मुशर्रफ हुआ तो देखा कि आप सल्लल्लाहो अलैहे व सल्लम दो अन्य अम्बिया याने हजरत मूसा अलैहिसालम और हजरत इसा अलैहिस्सलाम के सामने हजरत इमाम गजाली रहमतुल्लाह अलैह पर फ़ख्र करते हुए कह रहे हैं -“क्या तुम्हारी उम्मतों में गज़ाली जैसा कोई आलिम है ?
दोनों पैगम्बरों ने जवाब दिया–“नहीं ” !!!
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ये है हज़रते इमाम ग़ज़ाली रहमतुल्लाह अलैह की अज़मत; जिन्होंने इब्न रोश्द के फलसफ़ों की धज्जियाँ उड़ा दी थी और धर्म और दर्शन के द्वंद्व में धर्म अर्थात इस्लाम की श्रेष्ठता को स्थापित कर दिया। इसी वजह से तो 11403437_488205441330315_1600211412164008075_n “हुज्जतुल इस्लाम ” के ख़िताब से नवाज़ा जाता है ////
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( मोहम्मद आरिफ दगिया )
04/01/2017

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