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अनुच्छेद 370 ख़त्म करने के अदालत के फ़ैसले के बाद क़ानून के कई जानकारों ने कड़े शब्दों में इस फ़ैसले की आलोचना की : रिपोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने 11 दिसंबर को, जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 ख़त्म करने और राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों में बाँटने से जुड़े मामले पर अपना फ़ैसला सुनाया था.

सर्वोच्च न्यायालय ने अपना निर्णय केंद्र सरकार के पक्ष में दिया था.

अदालत के फ़ैसले के बाद क़ानून के कई जानकारों ने कड़े शब्दों में इस फ़ैसले की आलोचना की है.

इन क़ानूनी विशेषज्ञों की नज़र में सुप्रीम कोर्ट का पूरा का पूरा फ़ैसला ही पूरी तरह से ग़लत है.

सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जस्टिस मदन लोकुर ने तो यहाँ तक कहा कि सर्वोच्च अदालत को अपने इस फ़ैसले की समीक्षा करनी चाहिए.

क़ानून के बड़े जानकारों ने सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले पर कुछ इन शब्दों में अपनी अपनी प्रतिक्रियाएं दीं.

रिटायर्ड जस्टिस रोहिंटन नरीमन

सुप्रीम कोर्ट से रिटायर जस्टिस रोहिंटन नरीमन ने 30वें श्रीमती बंसारी शेठ एंडोमेंट लेक्चर में कहा, “हाल ही में आए सुप्रीम कोर्ट के इस फ़ैसले का संघवाद पर बहुत गहरा असर पड़ने वाला है. जम्मू और कश्मीर का विभाजन अनुच्छेद 365 (5) से बचने के लिए किया गया था.”

“क्योंकि संविधान की ये धारा कहती है कि किसी भी राज्य में राष्ट्रपति शासन एक साल से ज़्यादा नहीं लागू किया जा सकता है. इसीलिए, राज्य को केंद्र शासित प्रदेशों में विभाजित कर दिया गया, जिससे वहाँ केंद्र का सीधा नियंत्रण हो.”

रिटायर्ड जस्टिस रोहिंटन नरीमन ने कहा, “ये कहना भी असल में एक फ़ैसला ही है कि हम कोई निर्णय नहीं करेंगे. आपने एक असंवैधानिक कृत्य को अनिश्चित काल के लिए जारी रखने की इजाज़त दे दी है. ये सारी बातें बहुत परेशान करने वाली हैं.”

रिटायर्ड जज मदन लोकुर

सुप्रीम कोर्ट के रिटायर्ड जज मदन लोकुर ने द वायर के साथ एक इंटरव्यू में कहा, “सुप्रीम कोर्ट का ये फ़ैसला समझ से परे है.अनुच्छेद 370 को संशोधित नहीं किया जा सकता था. इस मामले में सुप्रीम कोर्ट लड़खड़ा गया है. मैं समझ नहीं पा रहा हूँ कि आख़िर वो ऐसे नतीजों पर कैसे पहुँच गए कि पूरा संविधान जम्मू-कश्मीर में लागू किया जा सकता है और धारा 370 को ख़त्म किया जा सकता है. उन्होंने तो बस इस बात को दोहराया भर है. मैं उन तर्कों से संतुष्ट नहीं हूँ, जो अदालत ने दिए हैं. मैं अदालत के इस फ़ैसले से नाख़ुश हूँ.”

जस्टिस मदन लोकुर ने आगे कहा, “जम्मू-कश्मीर के पुनर्गठन (जम्मू-कश्मीर को बाँटने और केंद्र शासित क्षेत्र बनाने) के पहलू पर कोई फ़ैसला नहीं देना ग़लत था. उन्हें इस पर भी फ़ैसला देना चाहिए था. उन्होंने कहा है कि हमें इसके लिए एक उचित मामले का इंतज़ार करना चाहिए. (इस मुद्दे पर फ़ैसले के लिए) ये सबसे सटीक मामला था.”

जस्टिस लोकुर ने कहा, “सैद्धांतिक रूप से इस उदाहरण का इस्तेमाल (भविष्य में राज्यों का दर्जा बदलने) के लिए किया जा सकता है. ये पूरी तरह मुमकिन है. मान लीजिए, संसद किसी राज्य को दो केंद्र शासित क्षेत्रों में तब्दील कर देती है और फिर इसको सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जाती है. और सुप्रीम कोर्ट कहता है कि राज्य की विधानसभा से तो कोई सिफ़ारिश नहीं की गई है और अगर ऐसी कोई सिफ़ारिश है भी तो ये बाध्यकारी नहीं है. और, हम सॉलिसिटर जनरल या एटॉर्नी जनरल का बयान दर्ज करते हैं कि उस राज्य विशेष को उसका दर्जा वापस दे दिया जाएगा.”

“मुझे लगता है कि सुप्रीम कोर्ट को अपने फ़ैसले की समीक्षा करनी चाहिए. भारत के एक नागरिक के तौर पर मैं इस फ़ैसले पर गर्व नहीं कर सकता हूँ.”

फ़ली एस नरीमन

सीनियर वकील और संवैधानिक क़ानून के विशेषज्ञ फ़ली एस. नरीमन ने इंडियन एक्सप्रेस में लिखा, “केंद्र ने जम्मू-कश्मीर में जो कुछ किया वो मेरे हिसाब से संविधान के प्रावधानों के अनुरूप नहीं था. न ही वो संघवाद के स्थापित सिद्धांतों के मुताबिक़ किया गया, जबकि वो तो संविधान की बुनियादी ख़ूबी है.”

“जम्मू-कश्मीर का दर्जा भी इकतरफ़ा तरीक़े से राज्य से बदलकर (बहुत सीमित इलाक़े वाला) केंद्र शासित क्षेत्र कर दिया गया. ये ऐसी स्थिति है जो न तो अपेक्षित थी और न ही संविधान के किसी भी प्रावधान से इसे वाजिब ठहराया जा सकता है.”

फ़ली नरीमन ने आगे लिखा, “इसीलिए, मेरा निष्कर्ष है कि सुप्रीम कोर्ट का ये फ़ैसला, अगर सियासी तौर स्वीकार्य भी है, तो संवैधानिक रूप से सही नहीं है.”

सीनियर एडवोकेट और याचिकाकर्ताओं में से एक के वकील कपिल सिब्बल ने कहा, “ज़्यादातर लोगों के लिए ये फ़ैसला नई राह खोलने वाला है, तो कुछ लोगों के लिए दिल तोड़ देने वाला है.”

“सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का, धारा 370 को लेकर ख़ुद सरकार की अपनी समझ से कोई वास्ता नहीं है! अदालत का घूमता पहिया फिर घूम गया है… इसमें कोई हैरानी वाली बात नहीं है!”

इसकी तुलना में सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले पर, सरकार के वकीलों और मंत्रियों के बयान बिल्कुल उलट थे.

उन सबने सर्वोच्च अदालत के फ़ैसले का स्वागत किया, और कहा कि इस फ़ैसले से साबित हो गया है कि अगस्त 2019 में सरकार ने जो कुछ किया, वो बिल्कुल सही था.

सरकारी पक्ष के मुताबिक़, सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले ने जम्मू और कश्मीर के बाशिंदों के अधिकारों की रक्षा की है.

सरकार के वकीलों में से एक और सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता कहते हैं, “माननीय सर्वोच्च न्यायालय का न्यायिक फ़ैसला ऐतिहासिक भी है और दुर्लभ भी. आज एक ऐसा फ़ैसला आया है, जो इस महान देश के इतिहास में अद्वितीय विद्वता के प्रदर्शन, क़ानून के राज को लेकर फ़िक्र और धर्म, लिंग, जाति या समुदाय से ऊपर उठकर जम्मू-कश्मीर के हर बाशिंदे के समानता के मूल अधिकारों के प्रति संवेदनशीलता का ख़याल रखने के लिए याद किया जाएगा.”

“देश की सर्वोच्च अदालत, दुनिया के सबसे सशक्त न्यायालय ने, लोकतांत्रिक चुनावों का ध्यान रखते हुए, संवैधानिक मूल्यों के पक्ष में खड़े होकर जम्मू और कश्मीर के सभी नागरिकों के उन वाजिब अधिकारों को सुरक्षित कर दिया है, जिससे उन्हें आज़ादी के बाद से ही महरूम रखा गया था.”

पीएम और गृह मंत्री ने क्या कहा?

सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्वीट किया, “11 दिसंबर के अपने फ़ैसले से सुप्रीम कोर्ट ने एक भारत, श्रेष्ठ भारत की भावना को मज़बूत किया है. इस फ़ैसले ने हमें याद दिलाया है कि जो बात हमें परिभाषित करती है वो एकता का बंधन और अच्छे प्रशासन को लेकर साझा प्रतिबद्धता है. आज जम्मू, कश्मीर में पैदा हुआ हर बच्चा एकदम साफ कैनवास के साथ पैदा हुआ है, जिसमें वो अपनी चमकीली आकांक्षाओं से भरी तस्वीर बना सकता/सकती है.”

वहीं गृह मंत्री अमित शाह ने सोशल मीडिया साइट एक्स पर पर लिखा, “अनुच्छेद 370 समाप्त होने के बाद से ग़रीबों और वंचितों के अधिकार बहाल किए गए हैं और अलगाववाद एवं पत्थरबाज़ी की घटनाएँ गुज़रे ज़माने की बातें बन चुकी हैं.”

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उमंग पोद्दार
पदनाम,बीबीसी संवाददाता