साहित्य

अम्मा के पेड़……लेखक-संजय नायक ‘शिल्प’ की एक शानदार कहानी!

संजय नायक ‘शिल्प’
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अम्मा के पेड़।
बचपने में ही उनकी अम्मा चल बसी थी। पर उसे पेड़ पौधों से बहुत प्रेम था, उसने आँगन में तुलसा, सदाबहार, जामुन, नींबू, अमरूद और आम के पौधे लगाए थे। जब तक वो जीवित थी, पौधे वृद्धि करते रहे। पौधों के साथ दोनो भाई भी बड़े हो रहे थे। बदकिस्मती उन दोनों दोनों भाइयों की ज्यादा रही, कि उन बढ़ते हुए पौधों की, एक बरसती हुई रात ने बुखार में तपती हुई उन पौधों और दोनों भाइयों की अम्मा को ठंडा कर दिया ।

वक़्त के बढ़ने के साथ दोनों भाई तो बढ़ रहे थे पर एक एक करके सारे पौधों ने आत्महत्या कर ली । उन दोनों भाइयों की तरह एक ही मृत्यु से लड़ता हुआ खड़ा रहा, डटा रहा और बढ़ता रहा। वो एक मात्र पौधा था आम का, जो दोनों भाइयों की अपेक्षा में ज़रा जल्दी से बढ़ा।

उस आम के बहुत सी मिंझरें लगती और फिर हजारों की तादात में आम लगते थे। जो चीजें सहज वृद्धि न करके संघर्ष में बढ़ती हैं वो ज्यादा मिठास लिए होती हैं। उस आम के फल बहुत मीठे और रसीले होते थे, वो लोग हमेशा आम को आस पड़ोस में भी बांट आते थे।

अक्सर उनके बाबा शराब पीने के बाद कहते थे, “तुम्हारी अम्मा ने तुम दोनों भाइयों के लिए अपनी अंतिम निशानी के रूप में ये अमिया का पेड़ छोड़ा है। वो हर साल मीठे फल देकर तुम्हें अपनी ममता का मिठास और आशीर्वाद प्रदान करती है।”

फिर वो अधेड़ आकाश की और मुँह करके कहता, “देख रही हो सुंदरी! तेरे हाथ के फल हम तीनों अभागों में कैसे मिठास भर देते हैं। काश! तू होती तो कच्चे आम का आचार भी डाल देती।” कहकर शराबी बूढ़े की आँखों से पानी बह निकलता था। दोनों भाई भी सुबकने लगते और उनका बाबा उन दोनों को आजू बाजू लिपटाकर सो जाता था।

दोनों बच्चे उस आम के पेड़ की बहुत सेवा करते। सरजू बिरजू से कहता “देख भाई अम्मा मुस्कुरा रही है,इस बार और ज्यादा आम देगी, मीठे मीठे, रसीले” , और दोनों पेड़ से लिपट जाते, एक लंबी से डाली जो कुछ ज्यादा ही लंबी थी उस पर वो दोनों सावन में झूला डालकर झूलते थे।
समय बदला दोनों भाईयों के मूंछें निकल आईं थी, अब पेड़ में उनकी रूचि तो थी पर प्रेम और ममता का एहसास कम होता जा रहा था। आदमी वक़्त के साथ अपनी संवेदनाओं को खोता चला जाता है। उसका बचपना और सरलता समझदारी में बदलते ही उन्हें मानव से इंसान बना देता है…. इंसान को जानवर में बदलते देर नहीं लगती।

कुछ सालों बाद बूढ़ा बाप दोनों की शादी करके अपनी जिम्मेदारियों से मुक्त हो गया। भरी जवानी में विधुर हुआ आदमी अकेलेपन का शिकार था। दोनों भाई तो जन्मे ही दुर्भाग्य के साथ थे। दोनों की पत्नियां कर्कशा थीं और दोनों में एक अजीब सी प्रतिस्पर्धा रहती थी। धीरे धीरे ये विरोध मुखर हो गया और लड़ाइयां अब रसोई से बाहर आँगन तक आ गई थी। क्लेश , दर्द और पत्नी से दूसरे जहान में मिलने की उत्कंठा ने बूढ़े को समय से पहले ही इस नश्वर दुनिया से मुक्त कर दिया।

दोनों बहुओं के विरोध ने अब प्रचंडता का रूप धारण कर लिया था, और इसकी परिणीति घर के बंटवारे के रूप में अंतिम परिणाम को प्राप्त कर गई। दोनों भाइयों ने सोचा चलो लड़ाई का अंत हुआ, दोनों रात शराब के ठेके पर साथ होते थे। पर भाइयों का सोचा सही साबित न हुआ । लड़ाई का अंत नहीं हुआ था और लड़ाई अब आमने सामने की नहीं रही अब लड़ाई दोनों घरों में दबे पाँव घुस आई थी।
लड़ाई की वजह थी वो आम का पेड़।

बंटवारे में आम का पेड़ सरजू के आँगन में रह गया, पर उसकी वो लंबी वाली डाली दीवार के उस पार बिरजू के आँगन तक जा रही थी। बस लड़ाई की “जड़” न थी पर “डाली” थी।

बिरजू के बच्चों ने उस डाली पर एक झूला डाल रखा था और झूलते रहते थे। जब कि सरजू के बच्चों को बिरजू की बीवी आँगन में फटकने न देती थी। जब आम का मौसम आता तो सरजू की बीवी की जान जलती थी। पेड़ उसका और उस डाली के कारण आम खायें, और झूला झूलें बिरजू के बच्चे!! ये बात सरजू के बीवी की छाती पर साँप लोटने का सा काम करती थी।

इधर बिरजू की बीवी को आम के सीजन के अलावा उस डाल से ये दिक्क्क्त थी कि साल के आठ महीने उस पेड़ के पत्ते झड़कर उसके आँगन में गिरते। उसपर बैठने वाले पक्षी अपनी बीट वहाँ करते और तिनके डालते रहते, जिससे उसे आँगन साफ करने में बड़ी दिक्क्क्त थी।
बसंत जाने वाला था, आम पर मिंझरें फूट रहीं थीं।

सरजू की बीवी जहां जली भुनी जा रही थी। वहीं बिरजू की बीवी खुश हो रही थी कि बिना पेड़ की सेवा किये ही आम मिलने जा रहे थे। उसने अपने मर्तबान जिनमें आचार डालने वाली थीं, को धोकर सुखाने के लिए मुंडेर पर रख दिया। ये देखकर सरजू की बीवी के कलेजे में आग लग गई।
शाम को सरजू काम से सीधे ठेके पर होते हुए आया । दोनों भाई साथ ही ठेके के लिए जाते थे और साथ ही लौटते थे। सरजू ने जैसे ही घर में प्रवेश किया वैसे ही उसकी बीवी के तेज जुबान चलने लगी।

” रोटी की थाली न आई” , उसने आवाज लगाई। बीवी की जुबान में फिर से तेजी आई। उसके बाद वो अपने थैले में कपड़े भर लाई। और जोर से थैला पटकते हुए अपना निर्णय सुना दिया, “मैं कल बच्चों को लेकर अपने मायके चली जाऊँगी, अगर ये आम की डाली जो उस तरफ जाती है, कल कटी नहीं तो। और इसे मेरी दो पल की धमकी मत समझना।”
“अरे डाली से तुम्हें क्या दिक्क्क्त है, जाने दो।”

“जाने कैसे दूँ, पेड़ हमारा है, और हमारे पेड़ की डाली के आम उस तरफ खाये जाते हैं। कह देती हूँ इसे मेरी महज धमकी ही मत समझ बैठना। अगर डाली न कटी तो, मैं मायके तो जाऊंगी ही जाऊंगी साथ में पेड़ की जड़ों में तेजाब भी डालकर जाऊँगी, ताकि न रहेगा बाँस न बजेगी बाँसुरी।”
“पर कैसे काटूँ उस डाली को, ये पेड़ मेरी अम्मा ने लगाया था, माँ जैसा लगता है ये मुझे।”
“तुम्हारी माँ मर गई, ….मर गई वो….तभी मर गई जब तुम छोटे थे, और कोई पेड़ किसी का माँ बाप नहीं होता।” कहकर वह तुनकते हुए चली गई। सरजू बिना खाये ही सो गया।
सुबह सवेरे ही कोलाहल से उसकी जाग खुली, देखा बीवी दोनों बच्चों को पीट पाट के नहा रही थी, उसने पूछा “क्या हो रहा है?”
“मैं अपने मायके जा रही हूँ, मरो यहीं अकेले तुम, ये डाली रहेगी तो मैं नहीं।”
सरजू अंदर गया, एक कुल्हाड़ी लाया और लपक कर पेड़ पर चढ़ गया। उसने डाली पर कुल्हाड़ी चलाई। कुल्हाड़ी की आवाज सुन बिरजू की बीवी दौड़कर बाहर आई। उसने देखा सरजू उसके आँगन की तरफ वाली डाली को काट रहा है।
उसने भागकर बिरजू को जगाया, बोली “तुम्हारा भाई आम की हमारी वाली डाली को काट रहा है रोको उसे।”
बिरजू उनींदा ही बोला “पर वो हमारी डाली नहीं है।”
“तुम तो कहते थे माँ जैसा है ये पेड़!!!” बिरजू की पत्नी ने तीर छोड़ा जो निशाने पर लगा।
बिरजू दौड़कर बाहर आया, “भाई ये क्या कर रहे हो?”
“ये लड़ाई की आखिरी वजह काट रहा हूँ।”
“पर भाई ये तो अम्मा की निशानी है, इसे मत काटो।”
“अम्मा मर गई है बिरजू….मर गई है अम्मा।”
कहते हुए सरजू की आँखें भर आईं और उसका हाथ कुल्हाड़ी पर और जोर से चला।
बिरजू भी भीगी आँखों से घर में दाखिल हो गया। उसको देखकर उसकी बीवी कुछ न बोल पाई, उसको ये भी सुकून हुआ कि चलो अब रोज रोज ये आम की डाली आँगन गंदा न करेगी।

पेड़ की डाली कट गई , सरजू की बीवी विजेता की तरह मुस्कुरा रही थी। डाली के कट जाने से धीरे धीरे आम की मिंझरें झरने लगी। छोटी कच्ची अमिया पेड़ पर ही सूख गई, और उस सीजन में एक भी अमिया बड़ी न हुई न पककर आम बनी। सरजू की बीवी को अजीब लग रहा था कोई भी आम के न लगने पर उसे अफसोस हो रहा था, पेड़ पर गुस्सा भी आ रहा था।

एक शाम को ठेके पर दोनों भाई साथ बैठे थे, “सरजू भैया ! आपने अम्मा के पेड़ को काटा , अब उस पर एक आम भी न लगा।” बिरजू ने कहा।

“लगता कैसे पगले, वो मेरी अकेली की अम्मा थोड़ी थी, तेरी भी तो अम्मा थी। जब तू आम न खा सकता तो अम्मा मुझे कैसे दे देती….दोनों की अम्मा थी न, या तो दोनों को प्रेम करेगी, फल देगी या किसी को नहीं, माँ के लिए तो सभी बच्चे बराबर होते हैं न।” कहकर सरजू रोने लगा।
बिरजू भी उससे लिपटकर रोया, दोनों उठे और गलबहियाँ डाले हुए घर की और बढ़ गए। आधे चाँद की रात में उनका आम का पेड़ ऐसा लग रहा था जैसे उनकी अम्मा उनके आने के इंतजार में दरवाजे पर खड़ी हो।
संजय नायक”शिल्प”
2-12-2023