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असम के डिटेंशन सेंटर से सब को हैरान करने वाली रिपोर्ट!

असम में नागरिकता संकट के विवादास्पद मुद्दे के कारण 2010 से राज्य में हिरासत केंद्र “डिटेंशन सेंटर” संचालित हो रहे हैं। इन केंद्रों के इर्द-गिर्द लगातार मानवीयता संबंधी चिंताएं जन्म लेती रही हैं।

सेंटर फॉर न्यू इकोनॉमिक्स स्टडीज़ की आज़ाद आवाज़ टीम ने असम में ये हिरासत केंद्र कैसे काम करते हैं, यह जानने के लिए जमीन पर जाकर साक्षात्कार किए।

एक रिपोर्ट में बता गयाहै कि कैसे ये हिरासत केंद्र अव्यवस्थित तरह से काम करते हैं और व्यक्तियों को अधिकारहीनता की ओर धकेलते हैं।

रिपोर्ट में कहा गया है कि 1951 के शरणार्थी सम्मेलन के अनुसार, सदस्य देश आप्रवासियों को हिरासत में नहीं ले सकते, निष्कासित नहीं कर सकते, या वापस नहीं भेज सकते, भले ही वे बिना अनुमति के ही प्रवेश करके क्यों न आए हों,. यह देखते हुए कि भारत इसका एक सदस्य राज्य नहीं है, वह सम्मेलन द्वारा रखे गए नियमों से बाध्य नहीं है, इसलिए इसे अवैध प्रवासियों के खिलाफ पहचान, हिरासत और निर्वासन के माध्यम से कड़ी कार्रवाई करते देखा गया है।

रिपोर्ट कहती है कि हिरासत में रखे गए लोगों की दयनीय स्थिति विशेष तौर पर तब सामने आई जब राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के विशेष निगरानीकर्ता हर्ष मंदर ने शिविरों के भीतर के भयावह हालातों का खुलासा किया।

वहां की रहने की परिस्थितियों के बारे में बात करते हुए एक महिला का कहना है कि एक सेल के भीतर 14 से 15 लोग थे, जिसमें केवल एक बाथरूम था, पहले दिन जब मैं वहां गई तो मुझे यह देखकर आश्चर्य हुआ कि बाथरूम के दरवाज़े आधे-अधूरे हैं, इस तरह कि आपका चेहरा बाहर से देखा जा सके, एक अधिकृत व्यक्ति से पूछने पर मुझे एहसास हुआ कि इन्हें कैदियों को आत्महत्या करने से रोकने के लिए बनाया गया था, आधे दरवाजों के कारण बाथरूम से आने वाली दुर्गंध के कारण वहां खाना तो दूर, रहना भी असहनीय हो गया।

रिपोर्ट कहती है कि सभी बंदी खराब परिस्थितियों में रहने के लिए मजबूर होते हैं, लेकिन महिलाओं को और भी बदतर परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है, जिसमें हिंसा के अन्य स्वरूपों के अलावा यौन शोषण और जबरन गर्भपात की शिकायतें भी शामिल हैं।