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क्या भगवान वैसे हैं जैसा आप सोचते हैं ❓…By-लक्ष्मी कान्त पाण्डेय

लक्ष्मी कान्त पाण्डेय
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क्या भगवान वैसे हैं जैसा आप सोचते हैं ❓
गाँँव के मन्दिर में एक बडे धर्मात्मा पुजारी थे वे कभी किसी से दान-दक्षिणा की मांग नही करते थे।
वे इतने स्वाभिमानी व्यक्ति थे कि जितना मंदिर चढ़ावे की राशि आती, उसमें से भी वे केवल उतनी ही राशि लेते थे जिससे उन दोनों दंपत्ति का जीवन-निर्वाह हो जाए, शेष राशि वे मंदिर के ट्रस्टी को पहूँँचा देते थे।
अब उनको अहंकारी कहें या धर्मात्मा, उनका कहना था कि भगवान उन्हें जितना देना चाहते हैं, उतना चढ़ावे के रूप में ही दे देते हैं और मैं उससे ज्यादा की मांग नहीं कर सकता।
समय बीतता गया और पुजारी व उनकी पत्नी काफी वृद्ध हो गए। धीरे-धीरे किसी कारणवश उनकी धर्म पत्नी की तबीयत बहुत खराब रहने लगी।
जब वे अपनी पत्नी को लेकर अस्पताल गए तो डॉक्टर ने उनकी पत्नी की जाँच करके बताया कि, “पुजारीजी, आपकी पत्नी का ऑपरेशन करना पड़ेगा, और ऑपरेशन के लिए लगभग एक लाख रूपये तक का खर्चा आएगा। अगर आपने जल्दी से जल्दी पैसों का इंतजाम नहीं किया, तो हम इन्हे नहीं बचा पाऐंगे।
पुजारी ने जब ईलाज के लिए इतनी बड़ी रकम सुनी तो उनकी हालत खराब हो गई क्योंकि उनके पास केवल इतना ही रूपया था,


जिससे वे दोनों अपना गुजारा कर सकें। उनके पास उनके पूर्वजों की कोई जमीन-जायदाद या सम्पत्ति आदि भी नहीं थी,
जिसे बेचकर वे एक लाख रूपये का इंतजाम कर पाते। इसलिए जब उन्हें रूपयों का इन्तजाम करने के लिए कोई भी रास्ता समझ में नहीं आया, तो अन्त में वे मंदिर में ही प्रार्थना करने लगे
”हे भगवान, मुझे मेरी पत्नी के ईलाज के लिए एक लाख रूपये की जरूरत है। इसलिए कृपया मुझे एक लाख रूपये दे दीजिए।
उसी रास्ते से एक जुआरी रोज गुजरता था, जो दिन भर की कमाई से रात को जुआ खेलता और हर रोज हार जाता था।
पुजारी जब ईश्वर से यह प्रार्थना कर रहे थे, ठीक उसी वक्त वह जुआरी वहाँ से गुजर रहा था और संयोगवश उसने पुजारी की ये सारी बाते सुन ली, लेकिन वह नशे में था इसलिए पुजारी पर कोई ध्यान दिए बिना वहाँ से चला गया और रोज की तरह जुआ खेलने लगा।
रोज तो वह जुआरी अपनी सारी कमाई हार जाता था, लेकिन आज पता नहीं क्यों वह जुआरी जीत रहा था।
उस रात वह जुआरी दो लाख रूपये जीत कर लौटा और उसे वह पुजारी वहीं बैठे मिले। जुआरी पुजारी के पास आकर बोला कि, ”ये एक लाख रूपये ले लीजिए और अपनी पत्नी का ईलाज करवाइए।” लेकिन पुजारी ने कहा, “मैं तुमसे ये पैसे नहीं ले सकता। मुझे मेरा भगवान आकर पैसा देगा।”
पंडित की बात जुआरी को बड़ी अजीब लगी। उसने सवाल किया- “आपका भगवान स्वयं आकर पैसा कैसे देगा ? आप कैसे भगवान का इन्तजार कर रहे हैं ? मैं ही भगवान हूँ। लीजिए यह पैसा और ईलाज करवाईए अपनी पत्नी का।
लेकिन वह पुजारी नहीं माना। उसने जुआरी के पैसे नहीं लिए। अन्त में जुआरी भी उस पुजारी से नाराज होकर चला गया और वही हुआ जो होना था। पुजारी के लिए कोई भगवान पैसे लेकर नहीं आया और पैसे जमा न करवा पाने के कारण उनकी पत्नी का ईलाज न हो सका व उसकी मृत्यु को प्राप्त हो गई।
कुछ दिन बाद वही जुआरी फिर से मंदिर के आगे से गुजर रहा था, तभी वह पुजारी के पास आया और पूछा, “क्या आपकी पत्नी का ईलाज हो गया ? क्या अब वो ठीक है ?
पुजारी ने प्रत्युत्तर दिया, “नहीं, वो मर गई। भगवान ने मेरी पत्नी को मार दिया। भगवान मेरे लिए एक लाख रूपये लेकर नहीं आया। इसलिए भगवान की वजह से मेरी पत्नी की मृत्यु हो गई।
उस जुआरी ने पुजारी से कहा, “आपकी पत्नी को भगवान ने नहीं बल्कि आपने ही मारा है, क्योंकि उस रात पहली बार मैं जुए में इतनी बडी रकम जीता था।
शायद भगवान मेरे माध्यम से आपको ही वह रूपया पहुँचाना चाहते थे, इसीलिए तो जब मैं उतनी बड़ी रकम जीता, तो जाने क्यों मेरे मन में खयाल आया कि मैं आपको उसमें से 1 लाख रूपए दे दूँ, ताकि आप अपनी पत्नी का ईलाज करवा सकें। लेकिन आपने वो पैसे स्वीकार ही नहीं किए और चमत्कार देखिए,
मैं वो सारा पैसा अगले ही दिन फिर जुए में हार गया। निश्चित ही भगवान ने मुझे वह पैसा आपके लिए ही जितवाया था, अन्यथा मैं अगले ही दिन फिर से सारा पैसा क्यों हार जाता लेकिन आप जाने किस तरह के भगवान का इंतजार कर रहे थे ?
इतना कहकर जुआरी तो वहाँ से चला गया, लेकिन उस दिन के बाद वह पुजारी मंदिर में भगवान की पूजा-अर्चना नहीं कर पाया।
सही ही तो कहा था जुआरी ने। वह किस तरह के भगवान का इंतजार कर रहा था ? उस मूर्ति जैसे स्वरूप वाले भगवान का, जिसकी वह हर रोज पूजा-अर्चना किया करता था ?
क्योंकि भगवान की मूर्ति का वह स्वरूप तो किसी ऐसे इंसान ने ही बनाया था, जिसने स्वयं कभी भगवान को नहीं देखा था। उस पुजारी के लिए भगवान एक जुआरी के रूप में आये थे, लेकिन वह पुजारी उन्हें नहीं पहचान सका।