साहित्य

गाँधी जग से गये कि सब दसकन्धर जाग गये…..By-धीरज चित्रांश

धीरज श्रीवास्तव चित्रांश
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गांधी जी की पुण्य तिथि पर एक पुराना गीत विशेष …
गाँधी जग से गये कि सब दसकन्धर जाग गये।
खद्दर पहन के बापू के सब बन्दर भाग गये।
जब से आज़ादी आईं, ज्यादा बर्बादी लाई।
चौड़ी कर डाली तुमने, धनिकों श्रमिकों की खाई।
रूहें हुई इतनी काली, गंगा मैली कर डाली।
अर्जुन छुप कर बैठा है, दुः शासन है अब माली।
है न्याय व्यवस्था रोती, गुंडों के घर में सोती।
अधिकारी पूँछ हिलाता, जैसे हो गली का मोती।
अस्तीनों में छिपा के, पीठ में ख़ंजर दाग गये।
गाँधी जग से गये कि सब दसकन्धर जाग गये।
नहीं भूखा कोई रहेगा, नहीं आँसू कोई बहेगा।
सपना था बारिश में अब, कोई छप्पर नहीँ ढहेगा।
छीने वो हाथ से रोटी, देकर आँखों मे मोती।
कौड़ी में मिलें ज़मीनें, फिट करते ऐसी गोटी।
थे गाँधी सपने थोडे, जो इक इक कर सब तोड़े।
फिर सपनों की लाशों से, रचे बंगले गाड़ी घोड़े।
छलछन्दों की सीमा सभी कलन्दर लाँघ गये।
गाँधी जग से गये कि सब दसकन्धर जाग गये।
आतंकी दीपक जलते, चन्दे पर दुश्मन पलते।
सत्य अहिंसा घुट घुट,अब घुटनों घुटनों चलते।
समरसता की चादर , चरखों पे नहीं अब खिलती,
नेताओं से गाँधी को, संसद में गाली मिलती।
गाँधी चश्मा है रोता, रातों को नहीं अब सोता।
गाँधी सरनेम लगाकर, ऐरे गैरे हैं नेता।
राष्ट्रपिता का तमगा दे, खूंटी पर टांग गये।
गाँधी जग से गये कि सब दसकन्धर जाग गये।
धीरज चित्रांश