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चुनावी बांड योजना पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई में कहा-ऐसा हो रहा है क्या? क्योंकि बहस का मुद्दा यही है….

चुनावी बांड योजना को लेकर दाखिल याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में तीसरे दिन भी सुनवाई हुई। बुधवार को मुख्य न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पांच-न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने इस मुद्दे पर सुनवाई करते हुए कई सवाल किए। पीठ ने कहा कि यह योजना चयनात्मक गुमनामी और गोपनीयता प्रदान करती है।

संविधान पीठ ने केंद्र से पूछा कि ये योजना पूरी तरह गोपनीय नहीं है। ये योजना चयनात्मक रूप से गोपनीय है। पीठ ने कहा कि चंदे का विवरण भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) के पास उपलब्ध रहता है। कानून प्रवर्तन एजेंसियों तक भी इसकी पहुंच है। सत्ताधारी दल भी विपक्षियों के चंदे की जानकारी ले सकता है। लेकिन विपक्षी दलों के लिए यह जानकारी लेना संभव नहीं है। ऐसे में केंद्र को यह सुनिश्चित करना होगा कि इस योजना में प्रोटेक्शन मनी या बदले में लेन- देन नहीं शामिल हो। ऐसे में क्या ये कहना गलत होगा कि इस योजना से किक बैक को बढावा मिलेगा या इसे वैध ठहराया जाएगा। पीठ ने यह भी कहा कि हम जानते हैं कि सत्ताधारी दल को अन्य की अपेक्षा अधिक चंदा मिलता है। और यह चलन में भी है।

पीठ ने कहा कि इस योजना के साथ समस्या तब होगी जब यह राजनीतिक दलों को समान अवसर प्रदान नहीं करती है और यदि यह अस्पष्टता से ग्रस्त है। शीर्ष कोर्ट ने यह भी कहा कि इस योजना के पीछे का उद्देश्य पूरी तरह से प्रशंसनीय हो सकता है। लेकिन यह पूरी तरह से गुमनाम या गोपनीय नहीं है। बता दें कि संविधान पीठ में न्यायमूर्ति संजीव खन्ना, न्यायमूर्ति बी आर गवई, न्यायमूर्ति जे बी पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा भी शामिल हैं। केंद्र की ओर से मामले में सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पक्ष रखा।

सीजेआई ने तुषार मेहता से कहा कि आपका यह तर्क कि ‘यदि आप इस योजना को रद्द कर देते हैं, तो आप एक ऐसी स्थिति में चले जाएंगे जो पहले मौजूद थी’ यह इस कारण से मान्य नहीं हो सकता है कि हम सरकार को एक पारदर्शी योजना या ऐसी योजना लाने से नहीं रोक रहे हैं जो एक समान अवसर उपलब्ध कराए।

सीजेआई ने कहा कि कानून प्रवर्तन एजेंसी के लिए इस योजना के तहत मिलने वाला चंदा गोपनीय नहीं है। ऐसे में कोई भी इसलिए कोई बड़ा दानकर्ता कभी भी राजनीतिक दलों को चंदा देने के उद्देश्य से चुनावी बांड खरीदने का जोखिम नहीं उठाएगा। इस पर तुषार मेहता ने अपना तर्क दिया कि चेक से चंदा देने पर खुलासा हो जाएगा कि किस पार्टी को कितना पैसा दिया गया। उससे अन्य पार्टियां नाराज हो सकती हैं। ऐसे में कंपनियां चंदा दाता नकद ही दे देते है और सब खुश रहते हैं।

इस पर पीठ ने कहा कि इस योजना का उद्देश्य नकदी के रूप में चुनावी फंडिंग को कम से कम करना और काले धन को खत्म करना है। अगर इस पर काम चल रहा है तो हम पूरी तरह से आपके साथ हैं। हमें इसमें कोई कठिनाई नहीं है। लेकिन सवाल यह है कि ऐसा हो रहा है क्या? क्योंकि बहस का मुद्दा यही है। दलीलों के दौरान सीजेआई ने कहा कि यह योजना प्रतिशोध की संभावना को खत्म नहीं करती है। पीठ ने कहा कि सुनवाई का मुद्दा यह नहीं है कि क्या कोई विशेष राजनीतिक दल दूसरे से अधिक पवित्र है। बल्कि हम इसकी संवैधानिकता के प्रश्न का परीक्षण कर रहे हैं।

इस दौरान मेहता ने पीठ से कहा कि हर देश चुनाव और राजनीति में काले धन के इस्तेमाल की समस्या से जूझ रहा है। प्रत्येक देश द्वारा अपने यहां की परिस्थितियों के आधार पर विशिष्ट मुद्दों से निपटता है। भारत भी इस समस्या से जूझ रहा है। सभी सरकारों ने अपने कार्यकाल में चुनावी प्रक्रिया से काले धन को दूर करने के लिए प्रक्रिया अपनाई है। कई प्रयासों, कई तंत्रों और तरीकों को आजमाने के बाद प्रणालीगत विफलताओं के कारण काले धन के खतरे से प्रभावी ढंग से नहीं निपटा जा सका। इसलिए, वर्तमान योजना बैंकिंग प्रणाली के जरिए सफेद धन को चुनावी चंदे के रूप में लाने के लिए लाई गई।

सुनवाई के दौरान, न्यायमूर्ति खन्ना ने याचिकाकर्ताओं की ओर से दलाली, रिश्वत या बदले में दिए जाने वाले चुनावी बांड के बारे में दी गई दलीलों का उल्लेख किया। इसके साथ ही पीठ ने चुनाव आयोग से प्रत्येक आम चुनाव या राज्य चुनावों के लिए औसतन आवश्यक कुल वित्तपोषण और इन बांडों के माध्यम से एकत्र की गई और उपयोग की गई राशि के बारे में पूछा। फिलहाल आज की सुनवाई का कोई नतीजा नहीं निकल सका। अब गुरुवार को भी इस पर सुनवाई जारी रहेगी।