धर्म

तौहीद और शिर्क : अल्लाह की रहमत हासिल करने के दो रास्ते हैं : पार्ट-4

ज़ोमर आयतें 54-58

وَأَنِيبُوا إِلَى رَبِّكُمْ وَأَسْلِمُوا لَهُ مِنْ قَبْلِ أَنْ يَأْتِيَكُمُ الْعَذَابُ ثُمَّ لَا تُنْصَرُونَ (54) وَاتَّبِعُوا أَحْسَنَ مَا أُنْزِلَ إِلَيْكُمْ مِنْ رَبِّكُمْ مِنْ قَبْلِ أَنْ يَأْتِيَكُمُ الْعَذَابُ بَغْتَةً وَأَنْتُمْ لَا تَشْعُرُونَ (55)

इन आयतों का अनुवाद हैः

और अपने परवरदिगार की तरफ पलटो और उसी के आज्ञाकारी बन जाओ (मगर) उस वक्त से पहले कि तुम पर जब अज़ाब आ नाज़िल हो (और) फिर तुम्हारी मदद न की जा सके [39:54] और जो जो अच्छी बातें तुम्हारे परवरदिगार की तरफ से तुम पर नाज़िल हुई हैं उन पर चलो (मगर) इससे पहले कि तुम पर अचानक अज़ाब नाज़िल हो और तुमको उसकी ख़बर भी न हो [39:55]

यह आयतें बताती हैं कि अल्लाह की रहमत हासिल करने के दो रास्ते हैं। एक है गुनाह से तौबा और अल्लाह की बारगाह में वापसी और दूसरे महान ईश्वरीय शिक्षाओं का अनुसरण।

यह आयतें अल्लाह के करम और रहमत की आशा दिलाने के बाद अल्लाह के प्रकोप और आक्रोश के बारे में सचेत भी करती हैं ताकि यह समझाया जा सके कि अगर इंसान ने अपने पिछले गुनाहों से ख़ुद को दूर नहीं कर लिया और गुनाह करता रहा तो अल्लाह के प्रकोप का शिकार हो जाएगा। हो सकता है कि वह दुनयावी अज़ाब हो जो अचानक इंसान को अपनी चपेट में लेता है या मौत के बाद आख़ेरत का अज़ाब हो जो गुनाहगारों को अपनी चपेट में लेगा और कोई उन्हें इस अज़ाब से बचा नहीं सकता।

इन आयतों से हमने सीखाः

वास्तविक तौबा की निशानी अल्लाह के आदेशों के सामने सिर झुका देना है।

तौबा में देरी नहीं करनी चाहिए क्योंकि ज़िंदगी छोटी है और मौत का कोई भरोसा नहीं।

तौबा और दिल के समर्पण के साथ ही नेक अमल भी ज़रूरी है।

अच्छे काम बहुत हैं लेकिन इंसान की उम्र और क्षमताएं सीमित हैं। लेहाज़ा हर दौर में प्राथमिकताओं पर ध्यान देते हुए सबसे बेहतरीन सदकर्म का चयन करना चाहिए।

अब आइए सूरए ज़ोमर की आयत संख्या 56 की तिलावत सुनते हैं,

أَنْ تَقُولَ نَفْسٌ يَا حَسْرَتَا عَلَى مَا فَرَّطْتُ فِي جَنْبِ اللَّهِ وَإِنْ كُنْتُ لَمِنَ السَّاخِرِينَ (56)

इस आयत का अनुवाद हैः

(कहीं ऐसा न हो कि) (तुममें से) कोई शख़्स कहने लगे कि हाए अफ़सोस मेरी इस कोताही पर जो मैने ख़ुदा (की बारगाह) का सामिप्य हासिल करने में की और मैं तो बस उन बातों पर हँसता ही रहा [39:56]

क़ुरआन की आयतों में आख़ेरत के बारे में जो बातें बयान की गई हैं उनमें एक बात इंसानों की हसरतों के बारे में है कि इंसान दुनिया में अपनी कोताहियों पर बहुत पछताएंगे और हसरत करेंगे कि काश यह किया होता या वह न किया होता! इसी लिए क़यामत का एक नाम हसरत का दिन है।

जब इंसान क़यामत के मैदान में पहुंचेगा और अपनी कोतिहियों, ढिलाई और उल्लंघनों का ख़मियाज़ा भुगतने पर मजबूर होगा तो हसरतें उसे घेर लेंगी उस पर पछतावे और शर्मिंदगी की यलग़ार होगी। क़यामत में गुनहगार इस बात पर बहुत पछता रहे होंगे कि उन्होंने अल्लाह की निशानियों और पैग़म्बरों का मज़ाक़ उड़ाया। क्योंकि उनकी गुमराही की सबसे बड़ी वजह अल्लाह की आयतों और पैग़म्बरों का उपहास होगा।

इंसान क़यामत के दिन अफ़सोस से हाथ मलेंगे और तमन्न करेंगे कि काश एक बार फिर दुनिया में आने का मौक़ा मिल जाए और आख़ेरत के लिए कुछ तैयारी कर लें। मगर इस पछताने का क्या फ़ायदा? क्योंकि वापसी का कोई रास्ता होगा ही नहीं। अलबत्ता धर्म के कुछ जानकार दूसरों से ज़्यादा हसरतों में डूबे नज़र आएंगे क्योंकि उन्होंने सब कुछ जानते हुए भी अमल नहीं किया।

क़यामत में इंसानों को यह पता चलेगा कि वही कर्म मूल्यवान है जो केवल अल्लाह के लिए अंजाम दिया जाए। उन्हें इस हक़ीक़त का पता चलेगा कि दुनिया में उनके द्वारा किए गए बहुत सारे काम ज़ाहिरी तौर पर तो नेक काम और सदकर्म थे लेकिन चूंकि दिखावे में पड़ गए इसलिए वह कर्म क़यामत तक नहीं पहुंच पाए और दुनिया में ही बर्बाद हो गए।

इस आयत से हमने सीखाः

दुनिया में अल्लाह के लिए ख़ुलूस से काम करने में हम जितनी कोताही करेंगे आख़ेरत में उतना ही पछतावा होगा।

क़यामत का दिन अपनी ग़लतियों के इक़रार का दिन होगा उस दिन इंसान अपने किए पर पछताएगा और अफ़सोस करेगा।

जो लोग दुनिया में क़ुरआन की आयतों और अल्लाह के निर्देशों का मज़ाक़ उड़ाते हैं क़यामत के दिन अपने किए पर पछताएंगे मगर इस पछतावे का तब कोई फ़ायदा नहीं होगा।

अब आइए सूरए ज़ोमर की आयत संख्या 57 और 58 की तिलावत सुनते हैं,

أَوْ تَقُولَ لَوْ أَنَّ اللَّهَ هَدَانِي لَكُنْتُ مِنَ الْمُتَّقِينَ (57) أَوْ تَقُولَ حِينَ تَرَى الْعَذَابَ لَوْ أَنَّ لِي كَرَّةً فَأَكُونَ مِنَ الْمُحْسِنِينَ (58)

इन आयतों का अनुवाद हैः

या ये कहने लगे कि अगर ख़ुदा मेरी हिदायत करता तो मैं ज़रूर परहेज़गारों में से होता [39:57] या जब अज़ाब को (आते) देखे तो कहने लगे कि काश (दुनिया में) मेरा फिर जाना हो तो मैं नेकी करने वालों में हो जाऊँ। [39:58]

पिछले आयत के ही क्रम में जो क़यामत के दिन इंसानों के पछतावे और दुख की बात करती है, अब यह आयतें जहन्नम में जाने वाले इंसान की हालत बयान करती हैं। आयतें कहती हैं कि जब वह जन्नत में जाने वालों को देखेगा कि उनके हाथ सदकर्मों से भरे हुए हैं और वे जन्नत की ओर बढ़ रहे हैं तो आरज़ू करेंगे कि काश उन्हीं के साथ होते, उनके साथ जन्नत में जाते और अल्लाह की असीम नेमतों का लाभ उठाते। वह कहेगा कि अगर अल्लाह ने मेरी हिदायत कर दी होती तो मैं भी जन्नती लोगों में हो जाता, दुनिया में गुनाहों से दूर रहता और परहेज़गारों में शामिल होता, पाप करने वाला इंसान इस तरह की बातें करके ख़ुद को निर्दोष ज़ाहिर करने की कोशिश करेगा।

जब उसका सामना अल्लाह के अज़ाब से होगा और उसकी आखें जहन्नम की आग पर पड़ेगी तो आरज़ू करेगा कि काश उसे दुनिया में वापस लौटने की अनुमति मिल जाती और वह भले कर्मों से अपने पापों को धो देता और नेक इंसानों के समूह में शामिल हो जाता।

अलबत्ता यह तो ज़ाहिर है कि उसकी बात भी ग़लत है और उसकी आरज़ू भी बेजा है। क्योंकि अल्लाह ने पैग़म्बरों को भेजा कि सारे इंसानों की हिदायत करें। तो अब जिस इंसान ने हिदायत का रास्ता नहीं चुना उसने दरअस्ल इस रास्ते पर चलना ही नहीं चाहा और आज जब वह दुनिया में लौटने की बात कर रहा है तो उसकी यह आरज़ू पूरी होने वाली नहीं है।

इन आयतों से हमने सीखाः

क़यामत में तक़वा का महत्व बहुत साफ़ नज़र आएगा। क़यामत में जो चीज़ काम आएगी वह तक़वा और परहेज़गारी है, धन दौलत, शोहरत और ताक़त नहीं।

अगर इंसान अल्लाह के बताए रास्ते पर न चले और किसी और डगर को अपनाए तो आख़ेरत में उसे निजात नहीं मिल सकती।

क़यामत के दिन गुनहगार इंसान परहेज़गारों की स्थिति देखकर रश्क करेंगे और बार बार आरज़ू करेंगे कि काश उनका भी यही अंजाम हो।

तक़वा और सदकर्म दो चीज़ें क़यामत में इंसान को निजात दिलाने वाली दो बड़ी चीज़े हैं।