धर्म

तौहीद और शिर्क : सूरए साफ़्फ़ात आयतें 123-132 : पार्ट-41

सूरए साफ़्फ़ात आयतें 123-132

وَإِنَّ إِلْيَاسَ لَمِنَ الْمُرْسَلِينَ (123) إِذْ قَالَ لِقَوْمِهِ أَلَا تَتَّقُونَ (124) أَتَدْعُونَ بَعْلًا وَتَذَرُونَ أَحْسَنَ الْخَالِقِينَ (125) اللَّهَ رَبَّكُمْ وَرَبَّ آَبَائِكُمُ الْأَوَّلِينَ (126)

इन आयतों का अनुवाद हैः

और निःसंदेह इलयास भी रसूलों में से थे। (37:123) याद करो, जब उन्होंने अपनी क़ौम के लोगों से कहा, “क्या तुम डर नहीं रखते? (37:124) क्या तुम ‘बअल’ (देवता) को पुकारते हो और सबसे अच्छे ख़ालिक़ को छोड़ देते हो; (37:125) अपने रब और अपने अगले बाप-दादा के रब, अल्लाह को!” (37:126)

हज़रत इब्राहीम और हज़रत मूसा का क़िस्सा बयान करने के बाद यह आयतें हज़रत इलयास की कहानी की ओर इशारा करती हैं। इन आयतों में अल्लाह कहता है कि अपनी क़ौम के लोगों से उनकी पहली बात यह थी कि वह अनेकेश्वरवाद, मूर्ति पूजा और हर तरह के ज़ुल्म और भ्रष्टाचार से परहेज़ करे। क़ौम के लापरवाह लोग इन बुराइयों में फंसे हुए थे और इसी वजह से वह बुरे और नाजायज़ कामों में लिप्त थे।

हज़रत इलयास ने मूर्ति पूजा करने वालों की अंतरात्मा को झिंझोड़ाः यह क्या दशा है कि तुम लोग उन्हीं मूर्तियों की पूजा करते हो जिन्हें तुमने ख़ुद अपने हाथ से बनाया है जबकि तुम उसे भूल जाते हो जिसने तुमको बनाया है! क्या मूर्तियों के पास किसी को पैदा करने की क्षमता है कि तुम लोग इस तरह उनके सामने नत मस्तक हो जाते हो? क्या तुम, तुम्हारे पूर्वज या तुम्हारे बच्चे इनके हाथों पैदा किए गए हैं? तुमने उस पालनहार को जो तुम्हें और तुम्हारे पूर्वजों को पैदा करने वाला है और जो सारी कायनात को चला रहा है, छोड़ दिया है और बेजान और बेअसर चीज़ों के पीछे भाग रहे हो?

शायद मूर्ति पूजा करने वाले इसके जवाब में यह कहते थे कि हमारे पूर्वज भी इसी तरह इबादत करते आए हैं मगर हज़रत इलयास उनके जवाब में कहते हैं कि तुम्हारे पूर्वज भी अल्लाह के ही पैदा किए हुए हैं मूर्तियों ने उन्हें पैदा नहीं किया है।

इन आयतों से हमने सीखाः

अल्लाह के सारे पैग़म्बरों ने इंसान को अल्लाह की इबादत करने और उसके अलावा हर किसी की इबादत से बचने की दावत दी है।

इबादत केवल सबसे महान सृष्टिकर्ता यानी कायनात के पैदा करने वाले अल्लाह की ही हो सकती है जिसका कोई शरीक नहीं है।

सारे पैग़म्बरों का सबसे प्रमुख मिशन और सारी विशेषताओं की बुनियाद तक़वा और परहेज़गारी है।

आम लोगों के बीच पैग़म्बरों की यह कोशिश होती थी कि सादे सवालों और तुलना के माध्यम से उन्हें ग़फ़लत से बाहर निकालें। बेजान और बेअसर मूर्तियों की तुलना सृष्टि और अस्तित्व की रचना करने वाले अल्लाह से करना इंसान की अंतरात्मा को जगाने के सिलसिले में प्रभावी है।

अब आइए सूरए साफ़्फ़ात की आयत संख्या 127, 128 और 129 की तिलावत सुनते हैं।

فَكَذَّبُوهُ فَإِنَّهُمْ لَمُحْضَرُونَ (127) إِلَّا عِبَادَ اللَّهِ الْمُخْلَصِينَ (128) وَتَرَكْنَا عَلَيْهِ فِي الْآَخِرِينَ (129)

इन आयतों की अनुवाद हैः

किन्तु उन्होंने उसे झुठला दिया। सौ वे निश्चय ही पकड़कर हाज़िर किए जाएँगे (37:127) अल्लाह के बन्दों की बात और है, जिनको उसने चुन लिया है (37:128) और हमने पीछे आने वाली नस्लों में उनका अच्छा ज़िक्र छोड़ा (37:129)

पिछली बहुत सारी क़ौमों की तरह हज़रत इलयास की क़ौम भी उनको पैग़म्बर मानने से इंकार करती थी और मूर्ति पूजा छोड़ने के बारे में उनकी नसीहतों और उपदेशों को सुनने और मानने के लिए तैयार नहीं थी। क़ुरआन कहता है कि इस झुठलाने की वजह से वह बहुत से गुनाहों और बुरे कामों में लिप्त हो गए उन्हें अल्लाह के अज़ाब का सामना करना पड़ा। बहुत थोड़े से लोग थे जो हज़रत इलयास पर ईमान लाए और उन्होंने ख़ुलूस से अल्लाह की इबादत की और उन्हें मोक्ष हासिल हुआ।

आगे की आयत में कहा गया है कि अल्लाह पैग़म्बरों की मेहनत व मशक़्क़त की क़द्र करता है और अच्छाई के साथ उनका ज़िक्र करता है ताकि इतिहास में उनके विचार, उनका रास्ता और उनकी शैली हमेशा बाक़ी रहे।

इन आयतों से हमने सीखाः

कामयाबी की बुनियाद लोगों की दुनयावी ज़िंदगी नहीं है बल्कि असली अंजाम तो क़यामत में सामने आएगा कि क्या उन्हें निजात मिलेगी और ख़ुश क़िस्मत होंगे या दुर्भाग्यशाली और नरकवासी बनेंगे।

ख़ुलूस के साथ अल्लाह की इबादत और निष्ठा के साथ कर्म करना मुक्ति और सफलता का रास्ता है और यह तरीक़ा इंसान को अल्लाह के अज़ाब से बचाने वाला है। अल्लाह की राह में अगर ख़ुलूस से काम न किया जाए तो इंसान मंज़िल तक नहीं पहुंच सकता।

आइए अब सूरए साफ़्फ़ात की आयत नंबर 130, 131 और 132 की तिलावत सुनते हैं।

سَلَامٌ عَلَى إِلْ يَاسِينَ (130) إِنَّا كَذَلِكَ نَجْزِي الْمُحْسِنِينَ (131) إِنَّهُ مِنْ عِبَادِنَا الْمُؤْمِنِينَ (132)

इन आयतों का अनुवाद हैः

“सलाम है इलयास पर!” (37:130) निःसंदेह हम नेक अमल करने वालों को ऐसा ही बदला देते है (37:131) निश्चय ही वह हमारे ईमान वाले बन्दों में से थे। (37:132)

हज़रत इलयास का वाक़या बयान करने के बाद क़ुरआन कहता है कि अल्लाह अपने पैग़म्बरे इलयास पर दुरूद भेजता है। अलबत्ता आयत नंबर 130 में इलयास के बजाए इलयासीन आया है। दोनों एक ही पैग़म्बर के नाम हैं। जैसे सीना और सीनीन एक ही स्थान के दो नाम हैं।

इस सूरे के पिछले भागों में पहले के कुछ पैग़म्बरों का क़िस्सा बयान किया गया है। इनमें से हरेक की कहानी बयान करने बाद आख़िर में अल्लाह इन महान इंसानों के मज़बूत और सच्चे ईमान का ज़िक्र करता है और उनकी मेहनत और नेक अमल की तारीफ़ करते हुए कहता है कि यह हमारी परम्परा है कि नेक अमल करने वालों को बदला देते हैं, उन्हें इनाम देते हैं। हज़रत इलयास से संबंधित आयतों के आख़िर में भी क़ुरआन इसी विषय की ओर इशारा करते हुए कहता है कि अल्लाह की राह पर चलने वालों की मेहनत व मशक़्क़त को कभी भुलाया नहीं जाता। यह अल्लाह की परम्परा है कि नेक इंसानों को अच्छा बदला दे और उनके सुकर्मों का उन्हें इनाम दे। चाहे वह पैग़म्बर हों या आम इंसान। अलबत्ता शर्त यह है कि वह अल्लाह की राह में क़दम बढ़ाएं और उनके पास ईमान भी हो। वरना जो व्यक्ति अल्लाह का इंकार करे और अपने ख़ालिक़ के आगे नत मस्तक होने के लिए तैयार न हो अगर वह कोई नेक अमल करता भी है तो उसने यह काम दुनिया के लोगों के लिए किया है और इसका बदला बस यही होगा कि इसी दुनिया में उन्हीं लोगों की ओर से उसका शुक्रिया अदा कर दिया जाएगा।

इन आयतों से हमने सीखाः

हमें अल्लाह से सीखना चाहिए कि पैगम्बरों और अल्लाह के ख़ास बंदों पर सलाम भेजा जाता है।

सदाचारियों और नेक अमल करने वालों पर ख़ास इनायत अल्लाह की परम्परा थी और अब भी है।

जो भी अल्लाह की बंदगी करे और वह मोमिन और सदाचारी हो उस पर हमेशा अल्लाह का सलाम होगा।