धर्म

तौहीद और शिर्क : सूरए साफ़्फ़ात आयतें 79-92 : पार्ट-36

सूरए साफ़्फ़ात आयतें 79-92

سَلَامٌ عَلَى نُوحٍ فِي الْعَالَمِينَ (79) إِنَّا كَذَلِكَ نَجْزِي الْمُحْسِنِينَ (80) إِنَّهُ مِنْ عِبَادِنَا الْمُؤْمِنِينَ (81) ثُمَّ أَغْرَقْنَا الْآَخَرِينَ (82)

सलाम है नूह पर पूरी दुनिया वालों में! (37:79) निःसंदेह हम सद्कर्मियों को ऐसा ही प्रतिफल देते हैं। (37:80) निश्चय ही वे हमारे ईमान वाले बन्दों में से थे। (37:81) फिर हमने दूसरों को डूबो दिया। (37:82)

पिछली आयतों में इस बात की तरफ़ इशारा किया गया कि हज़रत नूह अलैहिस्सलाम व उनके साथ भयानक तूफ़ान से बच गए थे। वे अंततः सुरक्षित तट तक पहुंच गए। ये आयतें कहती हैं कि वे सभी काफ़िर और हज़रत नूह की पैग़म्बरी का इन्कार करने वाले और उनकी बातों का मज़ाक़ उड़ाने वाले, ईश्वरीय दंड में ग्रस्त हो कर मारे गए।

हज़रत नूह अलैहिस्सलाम पूरे इतिहास के सभी ईमान वालों के सलाम के पात्र हैं क्योंकि उन्होंने साढ़े नौ सौ साल तक अपनी जाति की मुक्ति के लिए कोशिश की और इस राह में अत्यत धैर्य व संयम से काम लिया और उन्हें बहुत ज़्यादा यातनाएं भी सहन करनी पड़ीं। इससे बड़ा गौरव क्या हो सकता है कि ईश्वर, इंसान पर सलाम भेजे और उसे प्रलय तक दुनिया वालों के बीच सुरक्षित रखे।

आगे चल कर आयतें कहती हैं कि यह सलाम और पारितोषिक, केवल हज़रत नूह अलैहिस्सलाम से विशेष नहीं है बल्कि सभी सद्कर्मी, ईश्वर के सलाम और मुक्ति के पात्र हैं और उन्हें पारितोषिक व प्रतिफल दिया जाता है।

इन आयतों से हमने सीखा कि ईश्वर के पैग़म्बर व प्रिय बंदे, जो दुनिया से चले गए हैं, हमारा सलाम प्राप्त करते हैं क्योंकि उस व्यक्ति के लिए ईश्वर के सलाम का कोई अर्थ ही नहीं है जो न तो कोई चीज़ सुनता है और न ही बातों को समझता है। इस आधार पर पिछले पैग़म्बरों व ईश्वर के प्रिय बंदों को सलाम करना एक ईश्वरीय व मूल्यवान काम है।

ईश्वर की परंपरा यह है कि वह भले कर्म करने वालों को अपनी कृपा का पात्र बनाता है और वे ईश्वर से पारितोषिक हासिल करते हैं। ईश्वर सद्कर्मियों को दुनिया में भी फल देता है।

ईमान के साथ भला कर्म और भले कर्म के साथ ईमान ही मूल्यवान है और इनमें से कोई भी अकेला काफ़ी नहीं है।

दुनिया में ईश्वरीय दंड आने के समय, ख़ुदा ईमान वालों को बचा लेता है चाहे वे काफ़िरों के बीच में ही क्यों न हों।

आइये अब सूरए साफ़्फ़ात की आयत नंबर 83 से 87 तक की तिलावत सुनें।

وَإِنَّ مِنْ شِيعَتِهِ لَإِبْرَاهِيمَ (83) إِذْ جَاءَ رَبَّهُ بِقَلْبٍ سَلِيمٍ (84) إِذْ قَالَ لِأَبِيهِ وَقَوْمِهِ مَاذَا تَعْبُدُونَ (85) أَئِفْكًا آَلِهَةً دُونَ اللَّهِ تُرِيدُونَ (86) فَمَا ظَنُّكُمْ بِرَبِّ الْعَالَمِينَ (87)

और निश्चित रूप से नूह ही के रास्ते पर चलने वाले इब्राहीम भी थे। (37:83) जब वे अपने पालनहार के समक्ष पवित्र हृदय लेकर आए। (37:84) जब उन्होंने अपने बाप और अपनी जाति के लोगों से कहाः ये क्या चीज़ें हैं जिनक तुम उपासना कर रहे हो? (37:85) क्या ईश्वर को छोड़ कर दूसरे मनगढ़त पूज्य चाहते हो? (37:86) आख़िर ब्रह्मांड के पालनहार के बारे में तुम्हारा क्या गुमान है? (37:87)

इतिहास की दृष्टि से हज़रत नूह व हज़रत इब्राहीम के बीच समय का काफ़ी फ़ासला है लेकिन चूंकि हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम की पैग़म्बरी, हज़रत नूह की पैग़म्बरी का ही अगला क्रम और उसके एकेश्वरवाद की दिशा में है, इस लिए क़ुरआने मजीद हज़रत इब्राहीम को हज़रत नूह का अनुसरणकर्ता बताता है और उनके बीच इस तरह का रिश्ता स्थापित करता है, मानो उनके बीच कोई फ़ासला नहीं था।

इन आयतों में हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम की सबसे अहम विशेषता के रूप में पवित्र हृदय का उल्लेख किया गया है। इसके लिए जो आयत में जो शब्द इस्तेमाल हुआ है, वह “क़ल्बे सलीम” है। दिल को अरबी में क़ल्ब कहते हैं और सलीम का अर्थ है हर प्रकार की गंदगी व अनेकेश्वरवाद स पवित्र होना। इसी के साथ इसका एक अर्थ, ईश्वर के समक्ष नतमस्तक होना भी है।

चूंकि हज़रत इब्राहीम का दिल हर प्रकार के कुफ़्र व अनेकेश्वरवाद से पाक था, इस लिए वे अपने आस-पास के लोगों और जाति वालों के अनेकेश्वरवाद और मूर्तिपूजा पर चुप नहीं रह सकत थे। इसी लिए उन्होंने अपनी जाति वालों को उपदेश देते हुए और डराते हुए उन्हें अपनी प्रकृति की आवाज़ पर ध्यान देने का निमंत्रण दिया। उन्होंने उनसे पूछा कि किस प्रकार तुम इन निर्जीव वस्तुओं के सामने नतमस्तक होते हो और इनकी उपासना करते हो? क्यों वास्तविक ईश्वर के बजाए, झूठ ख़ुदाओं के सामने सिर झुकाते हो? किस तरह तुम, ब्रह्मांड के सच्चे पालनहार को छोड़ने के बावजूद उससे दया व कृपा की आशा रखते हो?

इन आयतों से हमने सीखा कि सभी पैग़म्बरों का रास्ता एक है और उनके बीच किसी भी तरह का मतभेद या विरोधाभास नहीं है। समय व स्थान जैसे कारकों से आसमानी धर्मों के सिद्धांतों व आधारों पर कोई असर नहीं पड़ता।

हर प्रकार के अनेकेश्वरवाद से दूरी और ईश्वर के समक्ष पूरी तरह से नतमस्तक रहना, ईश्वरीय पैग़म्बरों व उनके अनुयाइयों की सबसे अहम विशेषता है।

इंसान दूसरों के बारे में ज़िम्मेदार है और उसे अपने आस-पास के लोगों के मार्गदर्शन की कोशिश करनी चाहिए।

ईश्वर के प्रिय बंदे, बुरे माहौल में घुल मिल नहीं जाते बल्कि विभिन्न तरीक़ों से माहौल को बदलने की कोशिश करते हैं।

आइये अब सूरए साफ़्फ़ात की आयत नंबर 88 से 92 तक की तिलावत सुनें।

فَنَظَرَ نَظْرَةً فِي النُّجُومِ (88) فَقَالَ إِنِّي سَقِيمٌ (89) فَتَوَلَّوْا عَنْهُ مُدْبِرِينَ (90) فَرَاغَ إِلَى آَلِهَتِهِمْ فَقَالَ أَلَا تَأْكُلُونَ (91) مَا لَكُمْ لَا تَنْطِقُونَ (92)

फिर उन्होंने सितारों पर एक नज़र डाली। (37:88) और कहा कि मैं बीमार हूँ। (37:89) तो वे लोग मुंह मोड़ कर उन्हें छोड़ कर चले गए। (37:90) फिर वे आँख बचा कर उनके देवताओं की ओर गए और कहाः तुम लोग खाते क्यों नहीं? (37:91) तुम्हें क्या हुआ है कि तुम बोलते (भी) नहीं? (37:92)

पिछली आयतों में हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम द्वारा मूर्तिपूजा करने वालों से किए गए कुछ सवालों का उल्लेख किया गया था। इन आयतों में अनेकेश्वरवादियों और गुमराहों के मन को झिंझोड़ने के लिए उनकी एक अन्य शैली की तरफ़ इशारा करती हैं।

बाबिल शहर के लोगों की परंपरा यह थी कि वे अपने धार्मिक समारोह के आयोजन के लिए शहर से बाहर निकल जाते थे। उन लोगों ने समारोह से पहले वाली रात हज़रत इब्राहीम को निमंत्रण दिया कि वे भी उनके साथ नगर के बाहर चल कर समारोह में हिस्सा लें लेकिन हज़रत इब्राहीम को एक अवसर की खोज थी कि वे मूर्तियों को तोड़ दें। चूंकि बाबिल के लोग सितारों को अपने जीवन में प्रभावी समझते, इसी लिए हज़रत इब्राहीम ने शहर से बाहर न जाने के बहाने के तौर पर उन लोगों की आस्था के अनुसार सितारों पर एक नज़र डाली और कहा कि मुझ माफ़ करो क्योंकि सितारों की जो स्थिति है उसके अनुसार अगर में शहर से बाहर निकला तो बीमार पड़ जाऊंगा, इस लिए बेहतर होगा कि मैं शहर में ही रहूं।

निश्चित रूप से हज़रत इब्राहीम, सितारों की भूमिका पर कोई विश्वास नहीं रखते थे लेकिन लोगों को संतुष्ट करने के लिए उन्होंने वह शैली अपनाई जिसे वे मानते थे। बहरहाल इस बहाने से वे शहर से बाहर नहीं गए और जो कार्यक्रम उन्होंने बना रखा था, उसके लिए उन्हें अवसर मिल गया। लोगों की अनुपस्थिति में वे छोटी व बड़ी मूर्तियों के पास गए और उन्हें संबोधित करते हुए कहा कि अनेकेश्वरवादी जो कुछ तुम्हारे लिए लाए हैं, उसे खाते क्यों नहीं? तुम मेरी बातों का जवाब क्यों नहीं देते? अनेकेश्वरवादियों की आस्था तो यह है कि तुम लोग उनके जीवन में प्रभाव रखते हो तो फिर इस वक़्त कुछ करते क्यों नहीं?

इन आयतों से हमने सीखा कि सत्य के प्रचार में हर गुट के साथ उसी की भाषा में बात करना चाहिए। इस लिए लोगों के मार्गदर्शन की सही शैली खोजने के लिए उनके विचारों व परंपराओं को पहचान ज़रूरी है।

समाज में प्रचलित ग़लत विचारों व शैलियों से संघर्ष के लिए नई नई युक्तियां खोजना चाहिए और होशियारी के साथ उचित अवसरों से लाभ उठाना चाहिए।

अनेकेश्वरवाद को नकारने व एकेश्वरवाद का निमंत्रण देने के लिए पैग़म्बरों की शैली व तर्क पूरी तरह से स्पष्ट और इंसान की बुद्धि व प्रकृति के अनुसार है।

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