धर्म

तौहीद और शिर्क : सूरए साफ़्फ़ात आयतें 22-30 : पार्ट-29

सूरए साफ़्फ़ात आयतें 22-30

احْشُرُوا الَّذِينَ ظَلَمُوا وَأَزْوَاجَهُمْ وَمَا كَانُوا يَعْبُدُونَ (22) مِنْ دُونِ اللَّهِ فَاهْدُوهُمْ إِلَى صِرَاطِ الْجَحِيمِ (23)

(ईश्वर, फ़रिश्तों को आदेश देगा) “घेर लाओ सब अत्याचारियों को, उनके साथियों को और उनको भी जिनकी वे ईश्वर के अलावा उपासना करते थे। (37:22) फिर उन सबको नरक (की भड़कती हुई आग) की राह दिखाओ।” (37:23)

पिछले कार्यक्रम में हमने कहा कि नरकवासी, नरक की आग देख कर अपने किए पर पछताएंगे और स्वयं को धिक्कारते हुए रोएंगे और चिल्लाएंगे। वे कहेंगे कि धिक्कार हो हम पर कि हम इस दिन का इन्कार करते थे। ये आयतें कहती हैं कि उस दिन ईश्वर नरक के फ़रिश्तों को आदेश देगा कि वे काफ़िरों, अत्याचारियों और उनके पूज्यों को दूसरों से अलग करें और उन्हें नरक की ओर बढ़ा दें।

अत्याचार कई प्रकार का होता है। क़ुरआन की संस्कृति में ज़ुल्म शब्द, उसके सामाजिक अर्थ के अलावा, जो दूसरों पर अत्याचार है, अपने ऊपर किए जाने वाले अत्याचार पर भी चरितार्थ होता है। अनेकेश्वरवाद भी बड़े अत्याचारों में से एक है।

दुनिया में पूजे जाने वालों को नरक में डाले के भी दो कारण हो सकते हैं। एक यह कि कुछ पूजे जाने वाले कुफ़ व अत्याचार के शासक ऐसे इंसान थे जिनकी ईश्वर की जगह उपासना की जाती थी। दूसरे यह कि पत्थर व लकड़ी की मूर्तियों जैसे निर्जीव पूज्यों के साथ इंसानों का नरक में डाला जाना, ख़ुद उनके अपमान का कारण है।

आगे चल कर आयतें कहती हैं कि वे लोग नरक के रास्ते पर भेजे जाएंगे और यह वाक्य ख़ुद एक तरह से अत्याचारीं इंसान का अपमान है। मानो जो व्यक्ति दुनिया में अपने चयन से ईश्वर के सीधे रास्ते पर नहीं आए थे वे प्रलय में नरक की राह पर भेजे जाएंगे और वह भी अपने चयन से नहीं बल्कि विवशतापूर्वक।

इन आयतों से हमने सीखा कि प्रलय में हर कोई अपने जैसे विचार वालों और उन लोगों के साथ रखा जाएगा जिन्हें वह चाहता था और अगर उसके पूज्य लकड़ी और पत्थर के होंगे तो वह भी उन्हीं के साथ लाया जाएगा।

कोई इंसान या कोई भी चीज़ प्रलय में मनुष्य की मुश्किल को दूर नहीं कर सकेगी और न ही उसे नरक से बचा सकेगी।

आइये अब सूरए साफ़्फ़ात की आयत नंबर 24, 25 और 26 की तिलावत सुनें।

وَقِفُوهُمْ إِنَّهُمْ مَسْئُولُونَ (24) مَا لَكُمْ لَا تَنَاصَرُونَ (25) بَلْ هُمُ الْيَوْمَ مُسْتَسْلِمُونَ (26)

और ज़रा इन्हें ठहराओ कि इनसे कुछ पूछा जाना है। (37:24) (उनसे कहा जाएगाः) “तुम्हें क्या हो गया जो अब तुम एक-दूसरे की मदद नहीं करते?” (37:25) बल्कि ये आज (ईश्वर की शक्ति के सामने) पूरी तरह झुके हुए हैं। (37:26)

पिछली आयतों में बताया गया कि फ़रिश्तों से कहा जाएगा कि वे अत्याचारियों को इकट्ठा करके उन्हें नरक की ओर ले जाएं। ये आयतें कहती हैं कि फ़रिश्तों से कहा जाएगा कि अत्याचारियों को ज़रा रोको क्योंकि उन्हें नरक में दाख़िल होने से पहले कुछ सवालों के जवाब देने हैं। हालांकि इन सवालों के जवाब स्पष्ट हैं और ईश्वर से कोई भी चीज़ छिपी हुई नहीं है कि इस सवाल-जवाब से कोई चीज़ स्पष्ट हो। अलबत्ता इस काम का सबसे बड़ा फ़ायदा, ख़ुद अपराधियों द्वारा अपने पापों की स्वीकारोक्ति है जो एक तरह की निंदा भी है और उन्हें दंडित करने के लिए प्रमाण भी है।

अत्याचारियों की आस्थाओं और उनके कर्मों के बारे में सवालों के क्रम के अंतर्गत आगे चल कर उनसे पूछा जाता है कि वे अपने जैसे विचार रखने वालों और अपने दोस्तों व साथियों की इतनी बड़ी भीड़ से मदद क्यों नहीं मांगते? तुम तो दुनिया में अपनी समस्याओं के दौरान उन्हीं की शरण में जाते थे तो अब यहां उनसे क्यों नहीं मदद मांगते?

वे इस बात को स्वीकार करेंगे कि न तो शक्ति वाले और धन वाले लोग उनकी मदद कर सकते हैं, क्योंकि वे ख़ुद ही फंसे हुए हैं और न ही उनके जैसे विचार वाले और उनके सहयोगी व साथी उनकी मदद करने में सक्षम हैं क्योंकि सभी ईश्वर की असीम शक्ति के सामने सिर झुकाए हुए हैं और उसकी इच्छा और मर्ज़ी के बिना कोई भी काम नहीं कर सकते।

इन आयतों से हमने सीखा कि प्रलय में हमसे सवाल-जवाब किया जाएगा। उम्र, जवानी, विचारों, आस्थाओं, कर्मों और इसी तरह की अनेक अन्य बातों के बारे में सवाल पूछे जाएंगे जिनका हमें जवाब देना होगा।

दुनिया के बड़े बड़े उद्दंडी और अकड़ वाले, प्रलय में ईश्वर के आदेश के सामने पूरी तरह से नतमस्तक होंगे।

दुनिया के विपरीत, प्रलय में अपराधी एक दूसरे की मदद नहीं कर पाएंगे।

आइये अब सूरए साफ़्फ़ात की आयत नंबर 27, 28, 29 और 30 की तिलावत सुनें।

وَأَقْبَلَ بَعْضُهُمْ عَلَى بَعْضٍ يَتَسَاءَلُونَ (27) قَالُوا إِنَّكُمْ كُنْتُمْ تَأْتُونَنَا عَنِ الْيَمِينِ (28) قَالُوا بَلْ لَمْ تَكُونُوا مُؤْمِنِينَ (29) وَمَا كَانَ لَنَا عَلَيْكُمْ مِنْ سُلْطَانٍ بَلْ كُنْتُمْ قَوْمًا طَاغِينَ (30)

और इसके बाद वे एक-दूसरे की ओर रुख़ करके एक दूसरे से सवाल पूछने लगेंगे। (37:27) “वे कहेंगेः तुम तो हमारे पास सीधे (और भलाई के) मार्ग से आते थे?” (37:28) वे (जवाब में) कहेंगे, “नहीं, बल्कि तुम ख़ुद ही ईमान लाने वाले न थे। (37:29) और हमारा तो तुम पर कोई ज़ोर न था, बल्कि तुम ख़ुद ही उद्दंडी लोग थे। (37:30)

ये आयतें प्रलय के एक दृश्य का चित्रण करती हैं जिसमें गुमराह होने वाले अनुयाई और उनके नेता व पूज्य एक दूसरे को दोषी ठहराते हैं और एक दूसरे से सवाल-जवाब करते हैं। आरंभ में अनुसरणकर्ता कहते हैं कि तुम लोग ही थे जो शुभचिंता व दोस्ती की राह से हमारे पास आए और क़सम खा कर व आग्रह करके हमें इस राह पर ले आए। अगर तुम लोग न होते तो हम इस तरह समस्याओं में ग्रस्त न होते।

इसके जवाब में नेता अपने धोखा खाए हुए अनुयाइयों से कहेंगे कि तुम ख़ुद ही ईमान वाले नहीं थे वरना पैग़म्बरों और आसमानी किताबों को छोड़ कर हमारे पास नहीं आते और हमारी बातों को स्वीकार नहीं करते। इस लिए अपने आपको ही बुरा भला कहो क्योंकि हम तुम्हें ताक़त के बल पर इस राह पर नहीं लाए हैं। तुम अपनी उद्दंडी प्रवृत्ति और सत्य को लांघने की अपनी आदत के कारण हमारे पीछे पीछे आए हो।

इन आयतों से हमने सीखा कि वे अपराधी व पापी, जो कुफ़्र व अनेकेश्वरवाद के सरग़नाओं के अनुयाई थे, प्रलय में अपने पापों को समाज को गुमराह करने वाले नेताओं के कंधे पर डालने की कोशिश करेंगे ताकि अपने आपको बरी कर सकें लेकिन उनके इस काम को स्वीकार नहीं किया जाएगा।

कुफ़्र व अनेकेश्वरवाद के सरग़ना, शुभचिंतक का दिखावा करके लोगों को धोखा और उन्हें गुमराह कर देते हैं।

बाहरी कारक, इंसान को पाप पर विवश नहीं करते बल्कि उसकी आंतरिक गुमराही और उसकी मर्ज़ी व इरादा है जो उसे पापियों व अपराधियों का साथ देने की ओर बढ़ाता है।