साहित्य

*ननद जब देखो मायके मांगने चली आती है*….✍️लक्ष्मी कुमावत की रचना पढ़िये!

Laxmi Kumawat
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* ननद जब देखो मायके मांगने चली आती है *
सुनीता अपना सारा काम निपटाकर अपने कमरे में आराम कर रही थी कि इतने में बाहर से डोर बेल बजने की आवाज आई। आवाज सुनते ही सुनीता बड़बड़ाती हुई दरवाजा खोलने गई। लेकिन दरवाजे पर शायद कोई बेसब्री इंसान खड़ा था। उसे बिल्कुल भी सब्र नहीं था इसलिए शायद डोर बेल पर उंगली रखकर हटाना भूल गया।

जैसे ही सुनीता ने दरवाजा खोला तो सामने अपनी ननद मीना को देखकर उसका मूड ऑफ हो गया। कहां तो सोचा था सारा दिन पर आराम करेगी पर अब तो हो गया आराम। हालांकि ऐसा कभी नहीं था कि वो ननद के आने पर खुश हुई हो या उसके लिए आगे से आगे बढ़कर काम किया हो।

” नमस्ते “
ननद को बस नमस्ते किया और हाॅल में बिठाकर अपने कमरे में चली गई। वहां जाकर अपने पति वीरेश को कहा,
” चलो, बाहर तुम्हारे कर्जदार आ गए हैं। जाओ, जाकर उन्हें हैंडल करो”
उसकी बात सुनकर वीरेश हैरानी से बोला,
” कर्जदार? कैसे कर्जदार है? मैंने तो किसी से कर्जा नहीं लिया है। फिर कौन आया है”
उसकी बात सुनकर सुनीता मुंह बिगाड़ते हुए बोली,
” अच्छा! फिर तुम्हारी बहन आए दिन यहां क्या लेने आती है। ना खुद चैन से रहती है, ना हमें चैन से रहने देती है”
” अरे! दीदी आई है। तो खुश होने की जगह ऐसी उटपटांग बातें क्यों कर रही हो”
वीरेश खुश होते हुए बोला।

” दीदी तुम्हारी है, मेरी नहीं। और वैसे भी इन्हें मेरा संडे बर्बाद करके पता नहीं क्या मिलता है। अभी आप बैठे क्या हो? जाओ उनके पास। मैं थोड़ी देर आराम करना चाहती हूं”
” अरे! आराम करना है तो कर लेना। किसने मना किया है तुम्हें। तुमने पानी वगैरह तो पकड़ा दिया ना उन्हें”
” तुम्हारी बहन है, तुम खुद कर लो। मुझे आराम करने दो”
सुनीता आंखें तरेरते हुए बोली। वीरेश उसके आगे कुछ कह नहीं पाया और सीधे कमरे से बाहर निकल कर बाहर आ गया।

बाहर मीना को बैठा देखकर वीरेश उसके पास आया और उसके पैर छूकर बोला,
” कैसी हो दीदी आप? अकेले आए हो? गुड़िया को भी साथ ले आते”
” बस, मैं ठीक हूं। गुड़िया आज अपनी दादी के साथ मंदिर गई है। तू बता, तू कैसा है”
” मैं भी ठीक हूं दीदी। आप बैठो जरा। मैं आपके लिए चाय पानी लेकर आया”
मीना ने कुछ नहीं कहा। जानती थी कि उसका आना सुनीता को पसंद नहीं था। पर भाई के प्यार का मोह था। उस मोह में बंधी हुई थी इसलिए हर महीने एक बार जरूर उससे मिलने आ जाती थी।

मीना पंद्रह साल की और वीरेश दस साल का था, जब मम्मी पापा की डेथ हुई थी। मां पापा की मौत के बाद ताऊजी ताई जी ने तो रखने से मना कर दिया। आखिर नाना नानी ने उन्हें अपने घर में शरण दी। पर वहां मामी को ये बात पसंद नहीं आई इसलिए आए दिन घर में कलेश मचा देती। घर का अधिकतर काम भी मीना पर आ गया था।

जैसे तैसे मीना की स्कूली शिक्षा पूरी हुई तो एक प्राइवेट स्कूल में प्राइमरी टीचर के तौर पर काम करने लगी। अब डिग्री तो थी नहीं इसलिए सैलरी भी उतनी नहीं थी। पर जो भी था स्वाभिमान को बचाने के लिए काफी था। और बस एक सपना के अपने भाई को पैरों पर खड़ा कर दे।

पर इधर तो उसकी मामी ने उसकी शादी की ही लगा दी। ऊपर से नानी भी चाहती थी कि उनके जीते जी ही मीना की शादी हो जाए तो बेहतर है। आखिर उन्हें मीना के लिए मनीष पसंद आया और मनीष के साथ उसकी शादी कर दी।

मनीष एक मध्यम वर्गीय परिवार का बेटा था जो राशन की दुकान चलाता था। इतना तो कमा ही लेता था कि अपना और अपने परिवार का पेट अच्छे से पाल ले। ऊपर से मीना भी टीचर थी। दोनों पति-पत्नी मिलकर घर को अच्छे से संभाल रहे थे।

इधर वीरेश की स्कूली पढ़ाई पूरी हो गई थी। वो इंजीनियरिंग करना चाहता था। पर इस दौरान नाना जी की मृत्यु हो गई। अब नानी तो खुद मामा मामी पर आश्रित हो गई थी। ऐसे में उसकी पढ़ाई का खर्चा कैसे निकलता। ऐसे में मीना ने वीरेश की पढ़ाई का जिम्मा उठाया था।

इसके लिए मीना होम ट्यूशंस तक लेने लगी थी। उसे अपने भाई को पैरों पर खड़े होते देखना था इसलिए वो खूब मेहनत कर रही थी। पर उसे खुशी इस बात की थी कि मनीष और उसके सास ससुर ने कभी उसे इसके लिए रोका नहीं। बल्कि मिलजुल कर सब घर संभालते थे। इस कारण वीरेश अपनी दीदी जीजा जी का बहुत सम्मान करता था।

और आखिर उसकी मेहनत रंग लाई। वीरेश पढ़ लिखकर इंजीनियर बन गया और एक मल्टीनेशनल कंपनी में जॉब करने लगा। वही उसे अपने साथ काम करने वाली सुनीता पसंद आ गई और उसने सुनीता से शादी कर ली।

सुनीता को मीना का घर पर आना बिल्कुल पसंद नहीं था। उसे लगता था कि ये लोग लोअर क्लास को बिलॉन्ग करते हैं। उनका कोई स्टैंडर्ड नहीं है। कहां सुनीता और वीरेश का अच्छा खासा पैकेज, और कहां मीना और उसके पति मध्यम वर्गीय परिवार के लोग। कहीं से कहीं तक कोई मेल ही नहीं था।
ये बात मीना भी अच्छे से समझ रही थी। इस कारण उसने धीरे-धीरे वीरेश के घर आना कम कर दिया।

जब सुनीता और वीरेश ने अपने नए फ्लैट का मुहूर्त किया, तब मीना अपने साथ सुंदर बंधनवार लेकर आई थी। साथ ही नीम के पत्तों और अशोक के पत्तों के बंधनवार अपने हाथों से बनाकर लाई थी। खुशी खुशी वो उस बंधनवार को घर के मुख्य द्वार पर लगाने लगी तो सुनीता ने टोक दिया,
” ये आप क्या कर रही हो? इसे यहां क्यों लगा रही हो?”

अचानक सुनीता के टोकने पर मीना एक पल के लिए बंधनवार लगाती लगाती रुक गई। पर फिर बोली,
” सुनीता, ये पत्तो के बंधनवार तो बहुत शुभ होते हैं। इन्हें दरवाजे पर ही लगाया जाता है। हर शुभ कार्य में हमारी हिंदू संस्कृति के हिसाब से इन्हें मुख्य दरवाजे पर लगाया जाता है। जिससे सकारात्मक ऊर्जा घर में आए और घर में सुख, संपदा, यश, कीर्ति और शांति का वास हो”

” मैं नहीं मानती इन सब ढकोसलों को। आप दरवाजे पर ये सब ओल्ड फैशन चीजें नहीं लगाएंगी। आपको आपका नेग चाहिए ना। मैं आपको दिलवा दूंगी। पर भगवान के लिए मेरे घर को गंदा मत कीजिए”

सुनीता की बात सुनकर मीना हैरान रह गई।
” पर मैं यहां नेग लेने नहीं आई हूं। आप ये सब क्यों कर रही है सब समझ में आता है। कोई भी ननद अपना नेग नहीं छोड़ती। सभी इसी लालच में ये सब करती है”

मीना कुछ कहने को हुई तभी उसका ध्यान मनीष की तरफ गया। मनीष ने इशारे से बंधनवार लगाने के लिए मना कर दिया। मीना ने उन बंधनवारों को मन मसोस कर वापस अपने बैग में रख लिया।

जब ये बात गिरीश को पता चली तो दोनों वही रिश्तेदारों के सामने ही लड़ पड़े। ये देखकर मीना को बिल्कुल अच्छा नहीं लगा तो उसने उन दोनों को चुप कराने की कोशिश की। पर सुनीता ने उस पर ही इल्जाम लगाते हुए कहा,

” अब तो मिल गए आपको तसल्ली। मेरे घर की शांति भंग करके मन को बड़ा सुकून मिल गया होगा आपको। क्या लेने के लिए आप ऐसी हरकतें करती हो। बेवजह मेरा जीना दुश्वार कर रखा है”

इतना सब कुछ हंगामा हो जाने के बाद मनीष जी मीना को लेकर घर आ गया। उस दिन के बाद मनीष जी ने तो कभी भी उनके घर में कदम नहीं रखा। पर मीना तो भाई के प्यार से बंधी हुई थी। इसलिए अब महीने में एक बार ही आती थी।

इतने में वीरेश चाय बनाकर ले आया। मीना ने चाय पी और थोड़ी बहुत इधर-उधर की बातें की। वहां से रवाना हो गयी। वीरेश अभी दरवाजा बंद करके हटा ही था कि इतने में सुनीता ने आकर कहा,
” आज क्या लेकर गई है तुम्हारी बहन यहां से? दे दिए उसे पैसे”

” तुम्हारी सोच कितनी खराब है सुनीता। तुम्हें ये क्यों लगता है कि दीदी मुझसे लेने ही आती है। जबकि वो मेरे हाथ से तो ₹100 भी लेती नहीं। अरे! जिसने हमेशा मुझे दिया ही है, वो मुझसे क्या लेकर जाएगी”

उसकी बात सुनकर सुनीता मुंह बनाते हुए बोली,
” अगर तुम्हारी बहन पुराण हो गई हो तो जरा मुझे भी शॉपिंग करवा दो। अगले हफ्ते मेरे भतीजे नोनू का मुंडन समारोह है। उसके लिए महंगे गिफ्ट्स तो लेकर जाऊंगी”

वीरेश ने ज्यादा कुछ जवाब नहीं दिया और दोनों शॉपिंग के लिए कुछ देर बाद रवाना हो गए। सुनीता अपने भतीजे के लिए सुंदर-सुंदर गिफ्ट लेकर आ गई। अगले हफ्ते वो अपने भतीजे के मुंडन समारोह में अपने महंगे गिफ्ट्स के साथ पहुंची। मुंडन से पहले यज्ञ पूजन का आयोजन किया गया था। सुनीता के मायके के रीति रिवाज के मुताबिक मुंडन में नोनू को अपनी बुआ की लाई हुई ड्रेस पहननी थी।

सुनीता नोनू के लिए बहुत सुंदर ड्रेस लेकर भी गई थी। लेकिन ये क्या? उसकी भाभी ने अपने मायके से आई हुई ड्रेस अपने बेटे को पहना दे। ये देखकर सुनीता ने कहा,

” भाभी मुंडन से पहले पूजन में भतीजा तो बुआ की लाई हुई ड्रेस पहनकर ही बैठता है। फिर आपने अपने मायके वालों की ड्रेस क्यों पहना दी”
ये सुनकर उसकी भाभी ने कहा,

” अरे सुनीता, तुम क्यों नाराज हो रही हो। मेरी मम्मी कितनी सुंदर ड्रेस लेकर आई थी। मुझे बहुत अच्छी लगी इसलिए मैंने नोनू को वो ड्रेस पहना दी”
” पर भाभी रिवाज के मुताबिक तो नोनू को मेरी लाई हुई ड्रेस पहननी थी। मैं भी तो उसके लिए कितनी सुंदर ड्रेस खरीद कर लाई हूं”

” सुनीता क्यों बात का बतंगड़ बना रही हो? माना कि तुम भी ड्रेस लेकर आई हो। लेकिन मुझे तो मेरी मम्मी की लाई हुई ड्रेस ही पसंद आई है। और रही बात तुम्हारी नेग की? तो वो मैं तुम्हें दिलवा दूंगी”

भाभी की बात सुनकर सुनीता हैरान रह गई। और थोड़ी गुस्से में बोली,
” मैं ये सब कोई नेग के लिए नहीं कर रही हूं”

” ओह! कम आॅन सुनीता। जहां तक मुझे पता है ननदें ये सब नेग लेने के लिए ही करती है। और हमेशा अपने मायके कुछ ना कुछ लेने ही आती है। उस दिन तुमने ही तो अपनी ननद से कहा था, जब वो तुम्हारे फ्लैट के इनॉगरेशन में आई थी”

सुनीता की भाभी तो ये बात कह कर अपने बच्चें को गोद में लेकर चली गई। पर सुनीता ये सब सुनकर शाॅक्ड रह गई। आखिर उसकी भाभी ने गलत भी क्या कहा था? उसने तो उसे आईना दिखाया था। उस दिन उसकी ननद जिस जगह खड़ी थी, आज वो भी उसी जगह पर खड़ी है। सच है कर्म लौट कर आते हैं। सच है, जब तक इंसान को कोई झटका नहीं लगता, उसे अपनी गलती का एहसास नहीं होता।

सुनीता को अपनी गलती का एहसास हो चुका था। इसलिए जब इस बार मीना वीरेश से मिलने के लिए आई तो सुनीता ने उसका अच्छे से स्वागत किया। ये देखकर मीना के साथ-साथ वीरेश भी हैरान था। क्योंकि वीरेश को तो नहीं पता कि सुनीता के मायके में क्या हुआ था? लेकिन दोनों भाई-बहन खुश थे। आखिर आज बहन का मायका आबाद जो हो गया था।

मौलिक व स्वरचित
✍️लक्ष्मी कुमावत
सर्वाधिक और सुरक्षित