धर्म

पैग़म्बर सअव ने फ़रमाया-क़यामत में कोई भी बंदा उस समय तक कोई क़दम नहीं उठा पाएगा जब तक उससे चार सवाल न पूछ लिए जाएं…

जीवन में कभी कभी मनुष्य को अपनी ज़रूरत पूरी करने के लिए दूसरों से क़र्ज़ लेना पड़ता है और फिर निर्धारित समय में उसे लौटाना होता है।

क़र्ज़ लेने वाले हमेशा अधिक समय मांगते हैं जबकि क़र्ज़ देने वाले अपने पैसे वापस चाहते हैं। ऋणी हमेशा, क़र्ज़ देने वालों को यह समझाना चाहते हैं कि उनका हाथ ख़ाली है और क़र्ज़ देने वालों की समझ में यह नहीं आता कि क़र्ज़ लेने वाले यह क्यों नहीं समझते कि उनकी जेब भी ख़ाली है। कुछ ऋणी ऐसे भी होते हैं जो अपना क़र्ज़ चुकाने के लिए बेचैन रहते हैं जबकि कुछ हमेशा, भागने के चक्कर में रहते हैं। इस्लाम ने क़र्ज़ लेने और देने वाले के लिए कुछ नियम बनाए हैं और दोनों के लिए कुछ अधिकार दृष्टिगत रखे हैं। इस प्रकार के अधिकार मानवाधिकार के किसी भी दस्तावेज़ में नहीं है। यह, इंसानों के अधिकारों के संबंध में इस ईश्वरीय धर्म के विशेष ध्यान और क़ानूनी व्यवस्था का सूचक है।

पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के पौत्र इमाम ज़ैनुल आबेदीन विभिन्न लोगों के अधिकारों के बारे में लिखी गई अपनी पुस्तिका में क़र्ज़ लेने और देने वाले के बारे में कहते हैं। क़र्ज़ देने वाले का अधिकार यह है कि अगर तुममें सामर्थ्य है तो उसके पैसे चुकाओ, उसके काम को आगे बढ़ाओ, उसे सक्षम कर दो और उसे विलम्बित न करो क्योंकि पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम ने फ़रमाया हैः सक्षम व्यक्ति का अपने ऋण को न चुकाना अत्याचार है। अगर तुम्हारे पास नहीं हैं तो अच्छी ज़बान से उसे ख़ुश करो और बड़े प्रेम से उससे समय मांगो और उसे अपने पास से ख़ुशी ख़ुशी लौटाओ, यद्यपि तुमने उसका माल लिया है लेकिन उसके साथ दुर्व्यवहार न करो क्योंकि यह नीचता है और ईश्वर की मदद के अलावा कोई शक्ति नहीं है।

जो लोग ऋणी होते हैं और आर्थिक सामर्थ्य के बावजूद अपना क़र्ज़ नहीं चुकाते, वे क़र्ज़ देने वाले के ऋणी बाक़ी रहते हैं और एक प्रकार से अत्याचारी समझे जाते हैं। इस प्रकार के लोगों के मामले में ईश्वर बहुत कड़ाई से काम लेता है और अत्याचार ग्रस्त व्यक्ति को छोटे से छोटे अधिकार को भी व्यर्थ नहीं जाने देता। हज़रत अली इस प्रकार के पापों को अक्षम्य बताते हुए कहते हैं कि जिन पापों को ईश्वर क्षमा नहीं करेगा उनमें बंदों द्वारा एक दूसरे पर किया गया अत्याचार भी है। प्रलय के दिन लोगों का हिसाब करने के समय ईश्वर ने अत्याचार ग्रस्त लोगों का हक़ लेने और अत्याचारियों को दंडित करने की क़सम खाई है और कहा है कि वह अपने न्यायालय में किसी भी अत्याचारी को उसके अत्याचार पर दंडित किए बिना नहीं छोड़ेगा चाहे वह अत्याचार छोटा ही क्यों न हो, जैसे कि कोई व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति के हाथ पर अन्यायपूर्वक अपना हाथ मारे ताकि उसे उसके हक़ से वंचित कर दे। ईश्वर उन सभी लोगों का हक़ पूरी तरह से लेकर रहेगा जिनका अधिकार छीना गया होगा।

इस संसार में लोगों के आर्थिक हिसाबों को धन या वस्तु से चुकाया जाता है लेकिन प्रलय में न तो धन होगा और न ही अन्य वस्तुएं जिनसे लोगों को लोभ देकर उनके हिसाब को चुकाया जा सके। उस दिन केवल भले कर्मों के माध्यम से ही क़र्ज़ लेने वाला, ऋणदाता के अधिकार को चुका सकेगा और अगर उसके कर्मपत्र में भले कर्म न हुए तो उसी अनुपात में ऋणदाता के बुरे कर्म उसके कर्मपत्र में स्थानांतरित कर दिए जाएंगे।

लोगों के जो अधिकार हैं और प्रलय में उनका कड़ा हिसाब किताब किया जाएगा, उनमें उनके आर्थिक अधिकार भी शामिल हैं। चाहे वे अधिकार लेन-देन, ऋण और इसी प्रकार के वैध और क़ानूनी मार्गों से प्राप्त हुए हों या फिर चोरी, धोखे इत्यादि मार्गों से छीने गए हों। हर स्थिति में ईश्वर लोगों के अधिकारों की अनदेखी नहीं करेगा क्योंकि मुख्य रूप से उस व्यक्ति को राज़ी होना चाहिए जिसका अधिकार छीना गया है। पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के पौत्र इमाम मुहम्मद बाक़िर कहते हैं। ईश्वर की राह में मारा जाना, हर पाप को मिटा देता है सिवाए आर्थिक क़र्ज़ के क्योंकि ऋण को चुकाए बिना उसे मिटाने का कोई और मार्ग नहीं है। क़र्ज़ लेने वाला उसे अदा करे या उसके माल से उसके ऋण को अदा किया जाए या उसका कोई मित्र उसकी ओर से अदा करे या फिर जिसने क़र्ज़ दिया था वह अपने अधिकार को छोड़ दे और ऋणी को माफ़ कर दे।

हज़रत अली कहते हैं कि एक दिन पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम ने अपने साथियों के साथ नमाज़ पढ़ी और कहाः क्या यहां बनी नज्जार क़बीले का कोई नहीं है? इस क़बीले का एक व्यक्ति इस समय स्वर्ग के दरवाज़े के सामने क़ैदी बना हुआ है और उसे स्वर्ग में जाने की अनुमति नहीं दी जा रही है क्योंकि वह अमुक यहूदी का तीन दिरहम का ऋणी है। हालांकि ऋणी व्यक्ति शहीदों में से है और ईश्वर के मार्ग में मारा गया है।

आर्थिक ऋणों को अदा करना चाहिए और सांसारिक दंड पापियों को लोगों के आर्थिक अधिकारों से मुक्त नहीं करता। उदाहरण स्वरूप अगर कोई किसी का माल चोरी कर लेता है और उसे दंडित भी किया जाता है तब भी जब तक वह उस चोरी के माल या उसके मूल्य को उसके मालिक को नहीं देता तब तक वह अधिकार उसकी गर्दन पर रहेगा। जिस तरह से सांसारिक दंड, पापियों को लोगों के आर्थिक अधिकारों से मुक्त नहीं करता उसी तरह तौबा व प्रायश्चित भी, लोगों के अधिकारों को समाप्त नहीं करता सिवाय इसके कि वे तौबा के साथ ही लोगों का माल उनको वापस लौटाएं और उन्हें राज़ी कर लें अन्यथा प्रलय के दिन उन्हें पाई पाई का हिसाब देना होगा।

नख़ा के रहने वाले एक वृद्ध ने इमाम मुहम्मद बाक़िर से पूछा कि मैं हज्जाज के समय से लेकर अब तक विभिन्न इस्लामी क्षेत्रों में अधिकारी रहा हूं, क्या मेरे लिए तौबा है और मैं उसके माध्यम से अपने अतीत के पापों को धो सकता हूं? इमाम ने उसके जवाब में मौन धारण किया। उसने पुनः अपना सवाल दोहराया। इमाम ने उसके जवाब में कहाः ख़ाली तौबा तेरी मुक्ति का साधन नहीं बन सकती सिवाय इसके कि तू लोगों का हिसाब साफ़ कर दे और हर व्यक्ति का अधिकार उसे लौटा दे।

पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम ने फ़रमायाः प्रलय में कोई भी बंदा उस समय तक कोई क़दम नहीं उठा पाएगा जब तक उससे चार सवाल न पूछ लिए जाएं। पहले उससे उसकी आयु के बारे में पूछा जाएगा कि उसने उसे किस मार्ग में बिताया। दूसरा सवाल उसकी जवानी के बारे में किया जाएगा कि उसने उसे किस तरह बिताया और किस तरह समाप्त किया। तीसरा सवाल उसके धन व माल के बारे में किया जाएगा कि किस मार्ग से हासिल किया और किस मार्ग में ख़र्च किया। चौथा सवाल मेरे और मेरे परिजनों से प्रेम के बारे में किया जाएगा।

इस आधार पर हदीस में तीसरा सवाल आर्थिक मामलों से संबंधित है। प्रलय में हर व्यक्ति से पूछा जाएगा कि उसने अपना माल किस तरह से और किस मार्ग से हासिल किया है और किस तरह और किस मार्ग में ख़र्च किया है? हम सब जानते हैं कि माल, सभी इंसानों के जीवन का एक मूल आधार है और निश्चितरूप से पूरे संसार में व्यक्तिगत और सामाजिक संपन्नता व कल्याण और दुर्भाग्य का एक भाग काम की शैली, लोगों की आय और ख़र्च के मार्गों पर निर्भर होता है।

इस्लामी क़ानूनों में हर प्रकार का रोज़गार जो किसी भी तरह से समाज के कल्याण को नुक़सान पहुंचाए या लोगों को बुराई की ओर उन्मुख करे, हराम या वर्जित है और उससे होने वाली आय भी हराम होती है। उदाहरण स्वरूप शराब, जुए, चोरी, रिश्वत और इसी तरह के मामलों से होने वाली आय हराम है और इसी तरह इन कामों में पैसा लगाना भी हराम है। क़ुरआने मजीद के सूरए निसा की आयत नंबर 29 में ईश्वर लोगों को इन कामों से रोकता है और कहता हैः हे ईमान वालो! एक दूसरे के माल को अवैध मामलों के मार्गों से न हासिल करो और उसे अवैध रूप से अपना निवाला न बनाओ।

धर्मगुरुओं का कहना है कि वाजिब नमाज़ को तोड़ने का एक अवसर तब है जब कोई ऋणदाता आए और अपने धन की मांग करे और अगर नमाज़ पढ़ते हुए उसका क़र्ज़ न चुकाया जा सके और नमाज़ पढ़ने के लिए पर्याप्त समय हो तो इंसान को चाहिए कि अपनी नमाज़ तोड़ दे और पहले अपना क़र्ज़ चुकाए और फ़िर नमाज़ पढ़े।

एक दिन पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम ने अपने साथियों से पूछाः ग़रीब और दरिद्र कौन होता है? लोगों ने जवाब दिया कि जिसके पास दिरहम और दीनार न हों और जिसके पास सांसारिक माल न हो। पैग़म्बर ने फ़रमायाः वह दरिद्र नहीं है बल्कि वास्तविक ग़रीब व दरिद्र वह है जो प्रलय में ऐसी स्थिति में आए कि उसकी गर्दन पर दूसरों के अधिकार बाक़ी हों, इस प्रकार से कि उसने किसी को मारा हो, किसी को बुरा भला कहा हो, किसी का हक़ मारा हो। अगर उसके कर्मपत्र में अच्छे कर्म होंगे तो लोगों के अधिकारों के बदले में उससे वे अच्छे कर्म ले कर उन लोगों को दे दिए जाएंगे और अगर उसके कर्मपत्र में अच्छे कर्म नहीं होंगे तो उन लोगों के पाप, जिनके अधिकार उसकी गर्दन पर होंगे, उसके पापों में शामिल कर दिए जाएंगे और इस प्रकार का व्यक्ति ही दरिद्र है।