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प्रणाम करने से वैरी भी वैरभाव छोड़ देता है और झुकने के लिए मजबूत हो जाता है : लक्ष्मी सिन्हा का लेख पढ़िये!

लक्ष्मी सिन्हा

Laxmi Sinha
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प्रणाम करने से आशीष प्राप्त होता है। प्रमाण करने
की प्रवृत्ति व्यक्ति के जीवन में श्रेष्ठता, नम्रता,
शिष्टाचार, सोच की उत्कृष्टता का परिचायक है।
मानवता का यह शुभ लक्षण है। प्रणाम करने से
वैरी भी वैरभाव छोड़ देती है और झुकने के लिए
मजबूत हो जाती है। प्रणाम करने की परंपरा पुरातन
है। भगवान श्रीराम सुबह में नित्य अपनी माता,
पिता और गुरु को प्रणाम करते थे। रामचरितमानस
में वर्णन है-‘प्रातकाल उठि कै रघुनाथ। मातु पिता
गुरु नवाहीं माथा।।’

प्रणाम करने वाले व्यक्ति सर्वत्र आदर-
सम्मान एवं विजय प्राप्त करते हैं। आशीष प्राप्त
करना हिंदू धर्म में परम सौभाग्य तथा विजय का
सूचक माना गया है। यह मनोवैज्ञानिक तथ्य है
कि अपने से बड़े-बुजुर्ग माता-पिता एवं गुरुजनों
से आशीर्वाद पाकर मनुष्य का मनोबल बढ़ता है।
उससे विलक्षण शक्ति मिलती है। इसलिए प्रत्येक
मंगल कार्य, उत्सव, पर्व तथा शुभ कार्यों के आरंभ
में अपने से बड़ों का आशीर्वाद प्राप्त करें। यह बड़ों
के प्रति सम्मान प्रकट करने, आत्मबल-संपन्न होने
का लक्षण है। शुद्ध अंत:करण से किया हुआ नमन
आंतरिक शक्तियों को जगाता है, इसलिए श्रेष्ठ
मनुष्य ने सदैव इस मर्यादा का पालन किया है।


अनावश्यक अभिमान मनुष्य को पतित बनाता
है। इसका उदय न हो, इसलिए बड़ों के समक्ष
सदैव विनम्र होकर रहने की शिक्षा हमें मिली है।

महाभारत में अनेक ऐसे प्रसंग आते हैं,जब विपक्षी
पितामह भीष्म और गुरु द्रोणाचार्य का युधिष्ठिर,
अर्जुन, भी आदि पांडव चरण स्पर्श करते और
उनका शुभाशीष प्राप्त करते हैं। शिष्य की निष्ठा से
द्रवीभूत गुरुजन उनकी जय-कामना करते हैं और
वैसा होता भी है। सम्मान से प्रत्येक व्यक्ति को एक
प्रकार की आध्यात्मिक तृप्ति मिलती है।इसे प्रत्येक
व्यक्ति चाहता है। आपको सम्मान मिले इसके लिए
इस सभ्यता को परंपरा को जीवित रखना चाहिए।
सम्मान पाने का मार्ग यही है कि आप भी दूसरों
का सम्मान करें।

लक्ष्मी सिन्हा,(बिहार) पटना
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