साहित्य

बड़ी बहू होने के साथसाथ अब एक माँ हूँ इसलिए स्वार्थी हूँ…!!

सुमित्रा कमरे में काम कर रही थी कि उसी समय छह वर्षीय रुचि रोती रोती कमरे में आई। उसने पूछा भी पर रुचि बस रोए जा रहे थे। उसके लिए रुचि को संभालना मुश्किल होता जा रहा था।” अरे क्या हुआ बेटा? मेरी लाडो रानी क्यों रो रही है”
पर रूचि थी कि रोना बंद ही नहीं किया। उसके पीछे पीछे उसका बारह वर्षीय भाई नमन आया।
उसे देख कर सुमित्रा ने पूछा,
“नमन क्या बात है, रुचि रो क्यों रही है?”
” मां सारी गलती इसी की है। जब पता है तो क्यों गई थी चाची के कमरे में”नमन का जवाब सुनकर रुचि रोते रोते ही चिल्लाई,
” क्या गलती है मेरी भैया? मैं तो खाना भी नहीं चाहती थी, पर अनुज ने अपने हाथों से बिस्किट खिला दिया। बस चाची ने चाँटा मार दिया “
रुचि की बात सुन नमन सुमित्रा की तरफ देखने लगा। सुमित्रा को समझते देर नहीं लगी कि बात क्या हुई होगी? पर रुचि तो अभी भी रोए जा रही थी। अपने पर्स में से पैसे ढूंढ कर नमन को दिए कि एक बिस्किट का पैकेट ले आए और उसे रुचि को देकर जैसे तैसे चुप कराया। पर सुमित्रा के लिए अब सब कुछ असहनीय था। महज एक बिस्किट के लिए उसकी बेटी को चाँटा मार दिया गया।
चलिए पहले आपको मिलवाता हूँ सुमित्रा से। सुमित्रा संयुक्त परिवार की बड़ी बहू है। जहां सास ससुर, सुमित्रा और उसके पति सूरज, देवर मोहन और देवरानी नंदा है। दोनों के दो दो बच्चे हैं नमन और रूचि, आयुष और अनुज। एक ननद है, जिसकी शादी हो चुकी है।
ससुर जी के काम से रिटायरमेंट लेने के बाद घर का खर्चा दोनों भाई मिलकर उठाते हैं। पर समस्या यह है कि सूरज की इतनी इनकम नहीं है जबकि मोहन का अच्छा खासा काम है। सूरज की मदद के लिए सुमित्रा भी अपनी तरफ से कोशिश करती है। पर ज्यादा पढ़ी-लिखी ना होने के कारण वह साड़ी फॉल पिको का काम कर देती है। पर उसके बावजूद भी पूर्ति नहीं होती। क्योंकि एक्स्ट्रा खर्चे जैसे माता पिता की दवाइयाँ, बहन के ससुराल में कोई प्रोग्राम होना, मेहमानों की आवभगत के लिए खर्चे करना आदि सूरज और सुमित्रा को देखने पड़ते।
नंदा के तेज स्वभाव के कारण मोहन तो इन खर्चों से साफ-साफ बच जाता। माता-पिता भी उससे ज्यादा कुछ नहीं कहते। और ना ही दोनों बेटों को अलग करते। उनके अनुसार तो परिवार में एकता होनी चाहिए। ये अलग बात है कि उस एकता के चक्कर में बड़े बेटे बहु पीस रहे थे। यहाँ तक की नंदा मोहन खाने पीने की चीजें भी लाते तो अपने कमरे में अलमारी में लाकर रख देते और फिर मोहन उसका परिवार कमरे में बैठकर ही खाता।
एक दो बार सुमित्रा ने कहा तो सासू मां ने तर्क दिया कि हर माता-पिता अपने बच्चों के लिए करते हैं अगर वो लोग अपने बच्चों के लिए लाते हैं तो इसमें गलत क्या है?
और जब नंदा को पता चला कि सुमित्रा को इस बात से दिक्कत है तो उसने तो अच्छा खासा हंगामा खड़ा कर दिया। घर की शांति के लिए सूरज ने सुमित्रा को ही चुप रहने के लिए कहा।
लेकिन आज की घटना के बाद सुमित्रा में फैसला कर लिया था कि उसे क्या करना है। रविवार को जब मेहमानों का आना हुआ तो बाहर से नाश्ता नमकीन, बिस्किट वगैरह सब आया। तो जितना मेहमानों को सर्व होना था वह सर्व करने के बाद सुमित्रा ने बाकी का सामान अपने कमरे की अलमारी में ले जाकर रख दिया। मेहमानों के जाने के बाद जब घर के लोग खाना खाने बैठे तो मोहन ने कहा,
” अरे वह नमकीन आई थी? वह कहां है? जरा परोसो तो सही”
” पता नहीं कहां रखा है पैकेट, दिख ही नहीं रहा” नंदा ने मुंह बनाते हुए कहा।” वह पैकेट मैंने अपनी अलमारी में रख दिया है” सुमित्रा के इस जवाब से सबका ध्यान सुमित्रा की तरफ गया।” भला उस पैकेट को अलमारी में रखने की क्या जरूरत थी? खाने के लिए लाया गया तो सब को सर्व करो” सूरज ने कहा। ” नहीं, वो अलमारी में ही रहेगा। जब मेरे बच्चों को जरूरत होगी मैं उन्हें खाने के लिए दे दूंगी”
” बहु यह क्या तरीका है? तुम बड़ी बहू होकर कैसे स्वार्थ भरी बातें कर रही हो”” माफ करना माँ जी, पर यह सब बातें मैंने इसी घर के लोगों से सीखी है”
“ये कैसी बातें कर रही हो तुम? तुम इस घर की बड़ी बहू हो। तुम स्वार्थी कैसे हो सकती हो? घर के बड़ों को स्वार्थी होना शोभा नहीं देता”
” जब एक बिस्किट के लिए मेरी बच्ची को थप्पड़ मारा गया था उस दिन से ये माँ स्वार्थी हो गई थी। जब घर के बड़े अपने ही दोनों बच्चों में फर्क करते हैं, तब इस मां को स्वार्थी होना पड़ा था। और मैं अपने बच्चों के लिए इतना तो कर ही सकती हूं। और वैसे भी माँ जी, आप ही ने तो कहा था कि माता-पिता अपने बच्चों के लिए इतना तो करते ही है”
इतना कहकर सुमित्रा अपने कमरे में चली गई। आज पहली बार ना बोलने वाली बहू के मुंह से इतना सुनकर सब चुप हो गए क्योंकि वह गलत नहीं थी। सबको उम्मीद थी कि सूरज कुछ कहेगा और बहू को सबक सिखाएगा। पर उम्मीद के उलट सूरज ने चुप रहकर अपनी मौन स्वीकृति दे दी।
आखिर माता-पिता को भी समझ में आ गया था कि एकता के चक्कर में घर में क्लेश बढ़ रहा है। उन्होंने छोटे बेटे बहू को भी बराबर खर्च करने के लिए कहा तो नंदा ने इस बात पर हंगामा कर दिया और खुद ही अलग भी हो गई।
आभार -अवधेश भैया