साहित्य

“बाढ़, सूखा और टेन परसेंट”

सुनो रे किस्सा, Suno Re Kissa
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“बाढ़, सूखा और टेन परसेंट”
जोर लगा बे ” शैतान जने”, तखत पर अधनंगे, औंधे मुँह पड़े, “विधायक डब्बू भइया” ,और उनकी तेल मालिश करता “सज्जन” बदमाश, समझता है न “सज्जन”, “भगीरथी” कल्क्टर साहब का करैक्टर, हमसे पूछते हैं बाढ़ पीड़ित फंड के बारे में, अरे बाढ़ का पानी उतरे दस दिन हो गया, यहाँ समूचा जिला बह गया, तो फंड कैसे ना बहता, सीधी बात करिये न “भगीरथी” जी, कितना सोच के आऐं हैं, लीजिये मगही पान, केसर मार के, नोश फ़रमाइये, अरे हुज़ूर, हमारी अपनी, बेहद हसीन क्यारियों से, सीधा आपके हुज़ूर में,


देखिये “भगीरथी” जी अपने को “गंगा” जी दे रही हैं, सो ले रहे हैं, बोलिये “नमामि गंगे”, कृपा है उस ऊपर वाले की, “राज योग” फिर और किसे कहते हैं, “पंचायती” से “विधायकी” का सफर यूँ सबके बस की बात नहीं, कइयों समेत अपनी भी “आत्मा” की “हत्या” करनी पड़ती है, और कितनों की “आत्महत्या” में टसुए बहाने जाना पड़ता है, “बाढ़” और “सूखा” दोनों किसी विधायक के भाग्य में आते हैं भला, तभी कहता हूँ “गंगा जी” दे रही हैं, जितना हो सके इस पुण्यधारा में नहा लीजिये , “बाढ़ पीड़ित” हो या “सूखा पीड़ित”, दोनों ही तो अपने हैं, रसद ,टेंट, दवाई और पुनर्वास हो, या फिर सामूहिक दाह संस्कार, सबमें

“टेन परसेंट” आपका, ठीक है न, चलिये हाथ मिलाइये इसी बात पर, लेकिन थोड़ी “ललित कला” तो आपको भी करनी ही होगी प्रभु,

आपको ज्यादा कष्ट होने नहीं देंगे, गाँव-डेरे घूमिये, बस मुहर लगाइये, फोटो खिचवाइये, और बयान दीजिये, वो भी “द्रवित ह्रदय” से, ध्यान रहे “द्रवित ह्रदय” से, की विधायक “श्री डब्बू भइया जी ” और प्रशाशन, दिन-रात “बाढ़ राहत कार्य” में “तन मन और धन” से लगे हुए हैं, जो मिले,जहाँ मिले, जैसे मिले, बस आपको यही बयान देना है, और हाँ “श्री” और “जी” पर, ज़रा जोर दीजियेगा, हमारी छवि का विशेष ध्यान रखा जाए, हमारे युवा सचिव “गुल्ला कुरैशी” आपके साथ रहेंगे, दस-आठ लठैत लिये “सज्जन” बदमाश और दो बोलेरो भी साथ रहेंगी, इससे एक ओर आपकी सुरक्षा सुनिश्चित होगी, और दूसरा जनता तक हमारे प्रतिनिधि भी पहुँच सकेंगे, हमने हर टोले के “बड़बोले” को हमारी फोटो छपी अनाज की दस थैली का सहयोग दिया है, ये सभी लाभार्थी वहाँ पहले से माहौल बना कर रखेंगे, आपको वहाँ बाकी लोगों को केवल “आश्वाशन” बाँटना है, थोड़ा “अंग्रेजी” छाँटना है और ग्रामीणों का “दुखड़ा” चाटना है, बस थोड़ी सी “ललित कला”, और आपके हिस्से का “टेन परसेंट” आपके बंगले में आपकी बाट निहारता होगा

“योजना” से नहीं प्रभु, “जुगलबंदी” से राग-रागिनी का संचार, अर्थ से परिष्कृत हो, मन-मस्तिष्क को तरंगित करता है, “भोर की किरने” यूँ हीं नहीं किसी का आलिंगन करती हैं, कुछ “अंधकारों” को जीवित रखना ही पड़ता है, “इंद्रधनुष” केवल प्रसन्नचित्त ललाटों की लालिमा का ही अभिवादन करता है, फिर आप और हम पर तो “गंगा” मइया की विशेष कृपा है, हमारी खातिरदारी मशहूर है “भगीरथी” जी “कड़कनाथ” के साथ “स्कॉच” और अल्फांसों आम का रसास्वादन किये बिना आज आपको नहीं जाने देंगे, और हाँ बस वो बालू जो अब “गंगा” किनारे है उसका ठेका “गुल्ला कुरैशी” का है, हम कहे देते हैं, आखिर हमारा भी कुछ अधिकार, है के नहीं आपके “करेक्टर” पर, तो बोलिये “नमामि गंगे”

“अघोरी” राहुल