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बीजेपी को ED और CBI के पीछे छिप कर राजनीति छोड़ देनी चाहिए, ED के ज़रिए प्रधानमंत्री भ्रष्टाचार की लड़ाई नहीं लड़ रहे हैं

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Ravish Kumar
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बिहार की राजनीति में हर समय खंभे पर चढ़ती है और सरक कर नीचे आ जाती है। यह ज़रूर कि बिहार का राजनीतिक तबका स्वायत्त क़िस्म का है, इसलिए ऐसे बदलाव हो जाते हैं। मगर इससे बिहार ने अपने लिए ख़ास हासिल नहीं किया। एक राज्य के तौर पर उसका प्रदर्शन औसत है।शिक्षा से लेकर उद्योग की हालत देख लीजिए। बिहार के लोग उच्च क्षमता से लैस मानव संसाधन हैं मगर राजनीतिक संसाधन के रूप में बिहार ने अभी ऐसा कुछ नहीं किया है, जिससे लेकर उसकी वाहवाही की जाए। बेशक बिहार के नेताओं के कुछ गुण बाक़ी राज्यों के नेताओं से अलग हैं। वे अभी प्लास्टिक के नेता नहीं हुए हैं। अपना मिज़ाज और ज़बान रखते हैं। लेकिन बिहार को अभी बहुत कुछ साबित करना है।

कई राज्यों में आप देखेंगे कि पार्टी और पोस्टर पर एक ही नेता का नियंत्रण है। सारे पोस्टरों में वही सब कुछ कर रहा है। एक नेता के प्रभाव का अति हो चला है। उसके मंत्री कहां हैं, विधायक हैं, बाक़ी नेता कहां हैं, पता ही नहीं चलता। सारे केवल नेता के निर्देश पर नेता का पोस्टर लगाने में लगे हैं। यह बहुत ख़तरनाक प्रक्रिया है।बिहार में भी पोस्टर पर यह बदलाव है लेकिन उसके नीचे नेता पार्टी के भीतर और बाहर अपना दबदबा रखते हैं। यह अच्छी बात है।

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बिहार में जो हुआ है, उसमें आप देख सकते हैं कि राजनीति अपना रोल निभा रही है। बाहर से कोई पूँजीपति नहीं आया है। कोई हवाई जहाज़ नहीं आया है। राजनीति का यह रोल सही हो कसता है या ग़लत भी हो सकता है लेकिन राजनीति नेताओं की चीज़ हैं, वही करें तो अच्छा है।बीजेपी को ED और CBI के पीछे छिप कर राजनीति छोड़ देनी चाहिए। सभी राजनीतिक समाज में इसे अति के रूप में देखा जाने लगा है।ED के ज़रिए प्रधानमंत्री मोदी भ्रष्टाचार की लड़ाई नहीं लड़ रहे हैं। इसके नाम पर दूसरे दलों की आर्थिक ताकत खत्म की जा रही है। बीजेपी में सारे भ्रष्ट नेता शरण लेने चले जाते हैं। गांव से ज़िला स्तर पर जिनके पास संसाधन हैं, उसे बचाने के लिए बीजेपी में चले गए हैं। एक दिन बीजेपी राजनीति ही भूल जाएगी। ED के सहारे राजनीति करने का यही नतीजा होगा।


अगर मोदी-शाह को ED का इस्तेमाल करना है तो अपनी पार्टी में करके देखें, भ्रष्टाचार विरोधी अभियान को नैतिक बल मिलेगा। किसने बीजेपी को कई हज़ार करोड़ का चंदा दिया है, उन सभी के नाम ख़ुद से बता दें। अन्यथा ED, CBI और IT के छापों को राजनीति रूप से ही देखा जाएगा। कई राज्यों ने CBI पर रोक लगा दी है। ED को लेकर सड़क पर संघर्ष होने लगा है। कई राजनीतिक दल कर चुके हैं। अभी तो ED के ख़िलाफ़ राजनीतिक विद्रोह हो रहा है, एक दिन जनविद्रोह भी हो सकता है।

घोसणा : लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं, यह लेखक के निजी विचार हैं, तीसरी जंग हिंदी का कोई सरोकार नहीं है