साहित्य

बैत उक़बा से साज़िश ए क़त्ल तक

Shams Bond
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#ختم_رسل (٢٧)
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⭐बैत उक़बा से साज़िश ए क़त्ल तक⭐
ज़माना भी हज का करीब आ गया फिर
कमर कस के रब्ब का #हबीब आ गया फिर
ख़ुदा के दुहुल का नकीब आ गया फिर
कि बातिल का कुहन: रकीब आ गया फिर
हुआ जब कबीले में #ख़ज़रज का चर्चा
तो यज़रिब में पैग़ाम ए इस्लाम फैला
थी #उकबा की इक रात छः आदमी थे
ब अंदाज़ ए ख़स्लत सभी मज़हबी थे
वो यज़रिब से आए हुए अजनबी थे
तो पास उनके पहुंचे हुए अब नबी थे
दिया दर्स ए तौहीद, कुरआं सुनाया
बुतों के परस्तार को, हक़ बताया
वो पहले ही यज़रिब में ये सुन चुके थे
नबी एक हैं अंकरीब आने वाले
यहूदी उनको #तौरेत पढ़ कर डराते
तो फिर क्यूं ना हक़ पर वो ईमान लाते
प्रस्तिष से बुत के वो सब बाज़ आए
जो उकबा की बैत के अस्बाब लाए
ख़िलाफ़ ए तवक्का जो इस्लाम फैला
सनादीद ए मक्का हुए फिर इकट्ठा
बुलानी पड़ी उनको इक बज़्म ए शौरा
पय ए मश्वरत सब चले सु ए नदवा
#मुहम्मद से कुफ़फ़ार का दिल जला था
ब राय समाअत बड़ा मसअला था
वो आए थे हुल्ल: चुग्ग: थामे थामे
हरीरी अबाएं , थे दीबा के जामें
जबीं पर इक़आलें,सरों पर उमामे
ब क़दमें ब सख़ने ब दर्मे ब दामे
हर इक साहबुर्राय का था ये तेवर
कि ये मौत और ज़िन्दगी से है बेहतर
#बदीउज़्ज़मां_सेहर
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