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मिस्टर चंद्रचूड़, मैं कोर्ट के ग़लत फ़ैसलों की, जब भी ग़लत लगेगा, जमकर आलोचना करूँगा-@Profdilipmandal

Dilip Mandal
@Profdilipmandal
मिस्टर चंद्रचूड़, मैं कोर्ट के ग़लत फ़ैसलों की, जब भी ग़लत लगेगा, जमकर आलोचना करूँगा। ऐसा मैं कंटेप्ट ऑफ कोर्ट एक्ट के सेक्शन 5 से मिले अपने अधिकार के तहत करूँगा। ये क़ानून नागरिकों को अधिकार देता है कि वे कोर्ट के किसी फ़ैसले को ग़लत बताएँ।

जज आलोचना से बच नहीं सकते।

वैसे भी कोर्ट में अपील की व्यवस्था ही इसलिए है कि अगर फ़ैसला ग़लत है तो उसे ठीक किया जा सके। कई बार संसद को सुप्रीम कोर्ट के ग़लत फ़ैसलों को ठीक करना पड़ता है। एससी एसटी एक्ट में ये करना पड़ा था।

फिर जज आदमी ही है। उनमें तमाम इंसानी कमज़ोरियाँ हो सकता है। वह नशेबाज हो सकता है। पक्षपाती हो सकता है। दुश्चरित्र हो सकता है। जातिवादी और साम्प्रदायिक हो सकता है।

जजों के बारे में संविधान सभा में बाबा साहब ने संविधान सभा में जो कहा था वह जजों को पढ़ना चाहिए।

24 मई, 1949 में बाबा साहब ने कहा था – “मैं निजी तौर पर मानता हूं कि चीफ जस्टिस महत्वपूर्ण व्यक्ति हैं. लेकिन आखिर हैं तो वे आदमी ही. उनमें आम आदमियों की तरह तमाम खामियां, तमाम तरह की भावनाएं और राग-द्वेष हो सकते हैं.” इसलिए जजों को जज बनाने का अधिकार नहीं दिया जा सकता.

पूरी संविधान सभा ने बाबा साहब की बात मानी।

बहुत सोच समझकर संविधान में कोलिजियम सिस्टम नहीं रखा गया था। 1992 में केंद्र में जब कमजोर सरकार आई तो जजों ने नियुक्ति का पावर अपने हाथ में ले लिया।

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