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#मिस्र की मिसरी….मिस्र में 138 पिरामिड हैं और काहिरा के उपनगर गीज़ा में तीन लेकिन…

द्वारिका प्रसाद अग्रवाल

#मिस्रकीमिसरी :
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हमारी गाइड रिहब ने हमें चेताया कि पिरामिड का व्यास बहुत बड़ा है, यदि हमने उसकी परिक्रमा की तो एक घंटा लग जाएगा इसलिए हम उसे चारों तरफ जाकर न देखें इसलिए हम सब बस-स्टाप के सामने ही रहे। बहुत भीड़ थी। मिस्र के स्थानीय निवासियों के अतिरिक्त अन्य देशों के लोग भी उत्सुकता के साथ पिरामिड को निहार रहे थे, उसके ऊपर चढ़ने की कोशिश कर रहे थे।

हम दोनों तलहटी में थे, एक सुमुखी बाला हमें देखकर मुस्कुरायी और हमसे पूछा- ‘इंडिया ?’
‘यस, इंडिया।’ माधुरी ने स्वीकारोक्ति की।
‘आई लव इंडिया। आय एम फातिमा…पेलेस्टाइन।’
‘यासर अराफात वाज़ अवर फ़्रेंड, सो यू आर आल्सो अवर फ्रेंड।’ मैंने कहा। वह खुश हो गई। उसने हमसे कहा- ‘मे आई टेक योर फोटो ?’
‘श्योर।’ हम सबने एक-दूसरे के चित्र लिए।

भाषा की समस्या थी, अधिक बात न हो सकी लेकिन हम सब इस तरह मिलकर भावविभोर थे। करीना कपूर जैसी खूबसूरत लड़की के बगल में खड़े फोटो खिंचवाने का सुख केवल काले-कलूटों को ही समझ में आ सकता है। वैसे एक बात आपको ऐसी बता सकता हूँ कि हिन्दुस्तानी युवतियाँ जल-भुन जाएंगी, पक्का । अपने देश में तो उँगलियों में गिनने लायक करीना कपूर हैं, इजिप्त और आसपास के देशों की हर लड़की करीना कपूर है। फक्क-गोरा रंग, मदहोश करने वाली आँखें, आँखों में मोटा कजरा, गुलाब के फूल जैसे होंठ, और भी बहुत सी खूबियाँ लेकिन सबसे ऊपर उनका गुण है, अपरिचितों के संग भी मधुर-संभाषण। हमारे देश की लड़कियों से बात करो तो खूबसूरत हों न हों, ऐसा भाव खाती हैं कि मत पूछो !


अचानक एक युवक ने मेरी पीठ थपथपाई- ‘इंडिया ?’

‘यस, इंडिया।’ मैंने जवाब दिया, वह खुशी के मारे उछलने लगा- ‘इंडिया… शारुख्खान, रितिक, अमिताभ ?’
‘यू सी इंडियन फिल्म ?’

‘यस, आई लव शारुख्खान।’ वह बहुत देर तक हम लोगों से भारतीय फिल्मों के बारे में बात करता रहा और हमें अपनी माँ और छोटी बहन से मिलवाने ले गया। वे स्थानीय निवासी थे, सत्तर किलोमीटर दूर से पिकनिक मनाने आए थे।

इजिप्त में हमारी फिल्में बहुत लोकप्रिय हैं, ये फिल्में हमारे देश की पहचान है। मुझे ऐसा लगा कि शाहरुख खान की लोकप्रियता वहाँ चरम पर है, मैंने कई युवतियों से बात की तो शाहरुख खान का ज़िक्र आते ही नाम सुनकर सम्मोहित हो जाती थी। कुछ लड़कियों ने तो झूमते हुए ‘शारुख्खान’ का नाम लिया और आसमान की ओर देखकर ‘फ्लाइंग किस’ भेजने लगी, एक बार नहीं, कई बार ! सच में।

मिस्र में 138 पिरामिड हैं और काहिरा के उपनगर गीज़ा में तीन लेकिन सामान्य विश्वास के विपरीत सिर्फ गिजा का ‘ग्रेट पिरामिड’ ही प्राचीन विश्व के सात अजूबों की सूची में है। यह पिरामिड 450 फुट ऊंचा है। सन 1311 में लंदन में निर्मित लिंकन केथेड्रल के निर्माण के पूर्व तक यह दुनिया की सबसे ऊंचा निर्माण रहा। इसका आधार तेरह एकड़ में फैला है जो करीब सोलह फुटबॉल मैदानों जितना है। यह पच्चीस लाख चूना-पत्थरों के टुकड़ों से निर्मित है जिनमें से हर एक पत्थर का वजन दो से तीस टन के बीच है।

ग्रेट पिरामिड को इतनी परिशुद्धता से बनाया गया है कि वर्तमान तकनीक ऐसी कृति को दोहरा नहीं सकती। कुछ साल पहले तक (लेसर किरणों से नाप-जोख का उपकरण ईजाद होने तक) वैज्ञानिक इसकी सूक्ष्म सममिति (सिमट्रीज) का पता नहीं लगा पाये थे, प्रतिरूप बनाने की तो बात ही दूर है ! प्रमाण बताते हैं कि इसका निर्माण करीब 2560 वर्ष ईसा पूर्व, मिस्र के शासक खुफु के चौथे वंश द्वारा अपनी कब्र के तौर पर कराया गया था। इसे बनाने में लगभग 23 वर्ष लगे थे। म्रिस के इस पिरामिड को लेकर अक्सर सवाल उठाये जाते रहे हैं कि बिना मशीनों के, आधुनिक औजारों के मिस्रवासियों ने कैसे विशाल पाषाणखंडों को 455 फीट ऊंचाई तक पहुंचाया होगा ? कैसे इस बृहत परियोजना को महज तेईस वर्षों मे पूरा किया गया ? पिरामिड मर्मज्ञ इवान हैडिंगटन ने गणना करके हिसाब लगाया कि इसके लिए दर्जनों श्रमिकों के द्वारा साल के 365 दिनों में हर दिन दस घंटे के काम के दौरान हर दूसरे मिनट में एक प्रस्तर खंड को रखा गया होगा। क्या ऐसा करना संभव था ? ऐसा अनुमान है कि एक लाख श्रमिकों ने इस योजना को मूर्त रूप दिया है। विशाल श्रमशक्ति के अलावा प्राचीन मिस्रवासियों को क्या इतना गणितीय और खगोलीय ज्ञान रहा होगा ? विशेषज्ञों के मुताबिक पिरामिड के बाहर पाषाण खंडों को इतनी कुशलता से तराशा और लगाया गया है कि जोड़ों में एक पतली ब्लेड भी नहीं घुसायी जा सकती। मिस्र के पिरामिडों के निर्माण में कई खगोलीय आधार भी पाये गये हैं, जैसे कि तीनों पिरामिड आ॓रियन राशि के तीन तारों की सीध में हैं। वर्षों से वैज्ञानिक इन पिरामिडों के पीछे छिपे रहस्य को जानने के प्रयत्न में लगे हैं किंतु अभी तक ठीक से समझ नहीं पाए हैं।

ग्रेट पिरामिड एक पाषाण-कंप्यूटर जैसा है। यदि इसके किनारों की लंबाई, ऊंचाई और कोणों को नापा जाय तो पृथ्वी से संबंधित अनेक तथ्यों की सटीक गणना की जा सकती है। पिरामिड में नींव के चारों कोने के पत्थरों में बॉल और सॉकेट बनाये गये हैं ताकि ऊष्मा से होने वाले प्रसार और भूकंप से वह सुरक्षित रहे। पिरामिड में पत्थरों का प्रयोग इस प्रकार किया गया है कि इसके भीतर का तापमान हमेशा स्थिर और पृथ्वी के औसत तापमान २० डिग्री सेल्सियस के बराबर रहता है। मिस्रवासी पिरामिड का इस्तेमाल वेधशाला, कैलेंडर, सनडायल और सूर्य की परिक्रमा में पृथ्वी की गति तथा प्रकाश के वेग को जानने के लिए किया करते थे। पिरामिड को गणित की जन्मकुंडली भी कहा जाता है जिससे भविष्य की गणना की जा सकती है।

द्वारिका प्रसाद अग्रवाल
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#मिस्रकीमिसरी :
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भूख से बेहाल हम लोग बमुश्किल भोजन कक्ष खोज पाए जहां विविध व्यंजन हमारी प्रतीक्षा में थे। बेकरी में निर्मित विविध खाद्य पदार्थ, सूप, सलाद, फल, चांवल, दाल, सामिष-निरामिष साग-सब्जियाँ, जेम-जेली, शहद, योगर्ड, खजूर, फलों के रस आदि जो खाना-पीना हो, जितना लेना हो, करीने से सजा हुआ था। इतना विस्तृत और व्यवस्थित भोजनकक्ष मैंने पहली बार देखा था।

रात आठ बजे दो आरामदेह वातानुकूलित बस हम सबको अपने साथ लेकर नील नदी की ओर ले चली जहां पर नदी पर तैरते ‘लांच’ रात्रिभोज के लिए हमारा इंतज़ार कर रहे थे। बहुरंगी विद्युत झालरों से सुसज्जित लांच के द्वार पर तैनात अरबी वेषभूषा वाले एक लंबे-चौड़े इन्सान ने हमारी अगवानी की। भीतर छोटा सा रेस्तरां था जिसमें एक तरफ भोजन सजा हुआ था, मध्य में टेबल और कुर्सियाँ रखी हुई थी और समानान्तर स्थान पर मंच जैसी खाली जगह थी जहां दीवार के पास तीन कुर्सियों पर बैठे कलाकार संगीत की स्वर-लहरियाँ बिखेर रहे थे। लांच में लगे पारदर्शी काँच से गीज़ा शहर की रात का जगमगाता नज़ारा दिखाई दे रहा था। लांच बिना किसी कंपन के धीरे-धीरे नील नदी की सतह पर तैर रहा था और रात में बिखरी रोशनाई को चहुंओर प्रदर्शित कर रहा था। नील नदी के जल पर पड़ रहा शहर की विद्युत छटा का प्रतिबिंब बेहद सुहाना लग रहा था।

कुछ देर बाद कलाकारों की टोली बदली और चार नए सदस्य अवतरित हुए। इनमें एक गायक था और तीन बजायक। वे गीत हमारी समझ के बाहर थे पर सब सुन रहे थे, अचानक एक नर्तकी प्रगट हुई और उसने इजिप्त का प्रसिद्ध ‘बेली’ नृत्य प्रस्तुत करना आरंभ किया। अब मेरा ध्यान नील नदी के जगमगाते जल से हटकर नर्तकी की ओर केन्द्रित हो गया क्योंकि वह नृत्यबाला अपेक्षाकृत अधिक आकर्षक लग रही थी। मुश्किल से पाँच मिनट बीते होंगे, नर्तकी की देह मेरी दृष्टि से अनायास ओझल हो गई, केवल उसका नृत्य मेरी आँखों के समक्ष बच रहा। उसकी अद्भुत नृत्य-कला मुझे अपने देश की फिल्म अभिनेत्री-नर्तकी हेलेन की याद दिला रही थी- ”पिया तू, अब तो आ जा…’। आधे घंटे तक उस नृत्यबाला ने अपनी नृत्य साधना को हमारे समूह के समक्ष प्रस्तुत किया, उसका अंग-अंग नृत्यमग्न था, मनमोहक था और अभिनंदनीय भी। वाह।
साठ साल पुरानी यादें हैं, जब मैं बच्चा था, हमारे पास मोबाइल नहीं थे, कंप्यूटर नहीं थे, टीवी नहीं थे इसलिए कार्टून फिल्में नहीं थी, गेम एप्प नहीं थे, क्रिकेट नहीं था। माँ-बाप के पास उतना पैसा नहीं था इसलिए उनके दिल में हमारे लिए लाड़-प्यार भी नहीं था। घर के बाहर पतंग उड़ाते थे, बिल्ला खेलते थे, कंचे खेलते थे, गिल्ली-डंडा खेलते थे, कबड्डी खेलते थे, टीप-रेस खेलते थे, फुटबाल और हाकी खेलते थे।

एक और खेल था, भौंरा चलाने का। भौंरा लकड़ी से बना एक गोल लट्टू होता था जिसमें सफ़ेद रस्सी को लपेट कर उसे इतनी ज़ोर से इस तरह फेंका जाता था कि वह जमीन पर कुछ देर तक घूमता रहता। अब तो बैटरी-चलित भौंरा आ गया है जो घूमते ही रहता है लेकिन हमारा वह भौंरा कुछ देर चलकर रुक जाता था। उसी उम्र में हम लोग अपने दोनों हाथों को समानान्तर फैलाकर गोल-गोल घूमते थे लेकिन सात-आठ चक्कर लगाने के बाद चक्कर सा आने लगता था और संतुलन बिगड़ने पर गिर भी जाते थे।

उस रात लांच में बेली नृत्य सम्पन्न होने के पश्चात एक नर्तक अवतरित हुए, कई परतों का घाघरा पहने हुए, फ्लोर पर गोल-गोल चक्कर लगाने लगे और आधा घंटे तक एक क्षण रुके बगैर एक ही दिशा में चक्कर लगाते ही रहे। वह ‘दरवेश सूफी डांस’ था जिसे ‘तन्नूरा शो’ कहते हैं। उसे देखकर मुझे अपने बचपन की याद आ गई जब हम चक्कर लगाते-लगाते गिर पड़ते थे। साथ ही ओशो-शिविर में किए ‘नो डायमेंशन मेडिटेशन’ की भी याद गई। फर्क यह था कि ‘नो डायमेंशन मेडिटेशन’ में दिशा बदल-बदल कर चक्कर लगाना होता है और सूफी डांस में केवल एक दिशा में, वह भी लगातार। नर्तक के घाघरे में असंख्य एल॰ई॰डी॰ बल्व लगे हुए थे जो उसकी खूबसूरती को बढ़ा रहे थे। घूमते -घूमते वह अनोखे करतब दिखाता रहा, दर्शकों के पास जाकर तस्वीरें खिचवाता रहा और सबका मन मोह लिया। नर्तक की नृत्य साधना, उसकी असीमित ऊर्जा और उसका फन देखने काबिल था, मेरे पास उसका वर्णन करने के लिए शब्द नहीं हैं। अप्रतिम नृत्यशैली जिसका आनंद देखकर ही लिया जा सकता है, मिस्र की उस नर्तन-कला को मेरे लाखों सलाम।

रात ग्यारह बजे जब भोजन ग्रहण करने के पश्चात क्रूज़ से बाहर निकले तो नील नदी की सतह पर लहरा रही ठंडी हवाओं ने हमें अपने आगोश में लपेट लिया। हमारी बस कहीं दूर खड़ी थी, उसके आने तक हम सब फुटपाथ पर खड़े-खड़े ठिठुरते रहे। जब बस आई तो हम लपक कर उसमें जा घुसे। आधे घंटे में रिसोर्ट आ गया, ठंड और अधिक बढ़ गई थी, कंपकंपी छूट रही थी। कमरा खोला और नर्म बिस्तर में लगी रज़ाई में घुस गए। रज़ाई के ऊपर दो कंबल भी थे लेकिन बिस्तर इतना ठंडा था कि ऐसा लगे, जैसे आज कुल्फी जम जाएगी। नव-विवाहितों के बिस्तर तड़-फड़ गर्म हो जाते हैं लेकिन हम तो 41 वर्ष प्राचीन विवाह के अवशेष हैं। वर्तमान दौर में हमारी तकियों के मध्य एक फुट चौड़ा फासला हुआ करता है इसलिए बिस्तर होते-होते गर्म होता है।
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