साहित्य

मैं ऐसा क्यूं कह रही हूं….तो जवाब यह है कि मैं अपने स्त्रीत्व से थक गई हूं!!…By-मनस्वी अपर्णा

मनस्वी अपर्णा
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#न_हन्यते_हन्यमाने_शरीरे

श्रीमद भगवद्गीता कहती है हम सबमें आत्मा वह एक अविनाशी तत्व है जिसका विनाश संभव नहीं है जो शरीर के मर जाने पर भी नहीं मरती, मेरी निजी सांसारिक गीता कहती है कि एक बड़ा mass जो बिलकुल सामान्य समझ का प्रतिनिधित्व करता है उसके लिए शरीर मात्र की पहचान से ख़ुद को अलग कर पाना असंभव है, यानि हमने अपने आप को और दूसरों को जो भी माना है वो सब शरीर के इर्द गिर्द ही घूमता है, इस संर्दभ में ओशो का कथन भी बहुत कीमती है वो कहते हैं हम धर्म, जाति, संप्रदाय, से लेकर राष्ट्रीयता तक के हर एक भेद को भूल सकते हैं लेकिन स्त्री और पुरुष के भेद को हम नहीं भुला पाते, किसी भी स्थिति में कोई भी मानव आकृति हमें जब दिखाई पड़ती है तो हमारी पहली सहज जिज्ञासा यही होती है कि वह स्त्री है या पुरूष…. कभी आज़माकर देखिएगा आप इस बात को सही पाएंगे। ऐसे में मैं या मेरी जैसी अनेक स्त्रीयां जो यह मांग करती है कि हमें स्त्री पुरूष के भेद से इतर सिर्फ़ एक इंसान माना जाए, यह संभवतः असंभव से असंभव मांगों में से एक है। हमारा यह चाहना कि हमें देह परे एक मनुष्य की तरह देखा समझा जाए और उसी के अनुसार हमसे व्यवहार किया जाए नामुमकिन जान पड़ता है।

अब सवाल यह उठता है कि मैं ऐसा क्यूं कह रही हूं…. तो जवाब यह है कि मैं अपने स्त्रीत्व से थक गई हूं, मुझे इस पहचान चिढ़ हो गई है, जबकि मैं यह मानती हूं कि स्त्रीत्व परमात्मा प्रदत्त अमूल्य निधि है, क्यूंकि परमात्मा के बाद स्त्री ही है जो सृजन को परिणीत करती है, फिर भी मैं अपने स्त्री होने चिढ़ती हूं, मैं कितना ही सहज होकर जीना चाहूं इस दुनिया के पचासों ऐसे संस्कार है जो मेरा रास्ता काटते रहते हैं… मैं किसी की राह के आस पास भी न आऊं तब भी लोग मेरी राहों का रोड़ा बनने पर आमादा होते हैं… बिल्कुल हठात और बलात…. मेरे पास उंगली पर गिनने लायक लोग हैं जिनके बाबत मैं आश्वस्ति से यह कह सकती हूं कि इन लोगों ने मुझे अपने साथ सहज, बिलकुल सहज होकर रहने का अवसर दिया, जहां मेरा स्त्री होना आड़े नहीं आया मैं अपनी इच्छा के अनुरूप बस एक इंसान समझी गई।

अन्यथा हर दूसरी जगह कहीं छद्म तो कहीं खुले तौर पर पुरूष येन केन प्रकारेण ख़ुद को तश्तरी में रखकर परोसते रहते हैं, मेरा सर्वांग जलता है इस तरह के किसी भी प्रस्ताव पर लेकिन मैंने देखा है किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता, उन्हें मेरी परवा ही नहीं होती वो बस अपनी इच्छा, अपनी ज़रूरत, अपने फायदे पर केंद्रित होते हैं, अक्सर लोग ऐसे प्रस्तावों के साथ प्रस्तुत होते हैं जो दिखाई तो पड़ते हैं या दिखाए जाते हैं मेरे फायदे के लेकिन होते नहीं है, हर उस act के पीछे एक स्वार्थ छुपा होता है…. और मज़े की बात यह है कि उन्हें लगता है कि मुझे कुछ भी समझ नहीं आ रहा है, मैं अक्सर टाल दिया करती हूं क्यूंकि प्रतिक्रियात्मक होने की एक सीमा होती है और मेरा अपना निर्णय भी…. मैं कीचड़ में हाथ नहीं डालना चाहती इसका कतई अर्थ यह नहीं होता है कि मुझे वो सारी पैंतरेबाज़ी समझ नहीं पड़ती, सब समझता है और दिखाई भी देता है…. ज़ाहिरा तौर पर इससे कोई खुशी तो मुझे होती नहीं होगी…. मैं हर बार एक क़दम पीछे को खसक जाती हूं यानि मैं जीवन को थोड़ा और निषेध कर देती हूं, जबकि शांत और खुश ज़िंदगी जीना मेरा बुनियादी हक़ है… बावजूद इसके मैं अपने आप को थोड़ा और सिकोड़ लेती हूं और कोई उपाय मुझे समझ नहीं आता और मैं तो ख़ैर क्या ही सिकोड़ूंगी मेरा अंतस सिकुड़ जाता है।

मेरी अपनी समझ यह कहती है कि व्यक्ति हो या संबंध यदि आपको विस्तार नहीं दे पा रहे हैं तो सर्वथा त्याज्य है… आपका व्यक्तित्व किसी की उपस्थिति से यदि प्रत्येक आयाम में विस्तारित नहीं होता तो वो ईश्वर ही क्यूं न हो त्याज्य है……. पर पता नहीं क्यूं कोई भी इस बात को समझ नहीं पाता…. मैं मानती हूं कि ऐसी असंख्य स्त्रियां हैं जो रुप और गुण की प्रशंसा की आकांक्षी होती हैं जिनका जीवन किसी की अनुशंसा के बिना अधूरा होता है, जिनका पूरा व्यक्तित्व सिर्फ़ exhibits बनकर रह गया है, मैं उनसे मुख़ातिब नहीं हूं, न ही उनमें से हूं मेरी अपनी यात्रा है, अपना व्यक्तित्व है, अपनी छवि है जिसमें सबसे बड़ी अड़चन है मेरा स्त्री होना…… व्यक्तित्व का कोई एक मुक़ाम जहां कि मैं पहुंच सकती थी, नहीं पहुंच पा रही हूं वजह उपर विस्तार से बता चुकी हूं और मेरा अंतर्तम हर उस व्यक्ति के प्रति घृणा से आपूरित है जो इस यात्रा में बाधा बना है।
मनस्वी अपर्णा