देश

मोदी सरकार में न कोई घोटाला, न दंगा और न भ्रष्टाचार, आख़िर यह सब कैसे हुआ संभव,वजह जानकर आप भी रह जाएंगे दंग : रिपोर्ट

आजकल भारत की मोदी सरकार की हर ओर तारीफ़ें हो रही हैं, जिस मीडिया चैनल को सुनों, जिस भी समाचार पत्र को पढ़ों और जिस भी सरकारी संस्थओं के अधिकारी से बात करो सबके सब भारत की मोदी सरकार और भारतीय जनता पार्टी के शासन की तारीफ़ करते हुए थकते नहीं दिखाई देते हैं। आख़िर यह सब कैसे संभव हुआ, इसके बारे में जानना बहुत ज़रूरी है।

वर्ष 2014 से पहले भारत में मीडिया वर्तमान सरकार के कामों में पाई जाने वाली कमियों को तलाश करती रहती थी, वहीं संवैधानिक संस्थाएं भी पूरी स्वतंत्रता के साथ अपना काम किया करती थीं। अगर किसी मामले में कोई मंत्री का भी नाम आ जाता था तो संवैधानिक संस्थाएं उसका नाम लेने से कतराती नहीं थीं। यही कारण है कि मनमोहन सरकार में मंत्री पद पर रहते हुए भी कई मंत्रियों को जेल जाना पड़ा। कुल मिलाकर माहौल ऐसा था कि सरकार के कामों की तारीफ़ करने वालों की संख्या कम थी और उसपर सवाल उठाने वालों की तादाद ज़्यादा थी। शायद यही वजह थी कि मंहगाई पर कंट्रोल था, जब पूरी दुनिया मंदी के दौर से गुज़र रही थी, तब भी भारत में उसका बहुत कम असर देखने को मिला था। सरकार किसी भी चीज़ का रेट बढ़ाने के बारे में सौ बार सोचती थी। उसे जहां विपक्ष के हंगामे का डर था, तो वहीं मीडिया के हमलों का ख़ौफ़ भी था। जबकि क़ानून व्यवस्था की बात की जाए तो इसमें काफ़ी लचीलापन था। लेकिन खुले आम कोई देश के संविधान को राजधानी में जलाता नहीं था। क़ानून को अपने हाथों में लेने से पहले सौ बार सोचना पड़ता था। हर कोई अपने धर्म के अनुसार भारत को किसी विशेष धर्म का राष्ट्र बनाने की बात नहीं करता था।

अगर योजनाओं की बात करें तो जो योजनाएं पूर्व प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह के समय में लागू की गईं थी, उससे आज भी वर्तमान की मोदी सरकार लाभ उठा रही है। चाहे बात हो बेरोज़गारी की समस्या से निपटने के लिए मनमोहन सरकार की मनरेगा नामक रोज़गार गारंटी योजना की या फिर देश के ग़रीबों के सामने मौजूद भुखमरी की चुनौती से निपटने वाले खाद्य सुरक्षा क़ानून की। इसी तरह सब्सिडी की रक़म को ग़लत हाथों में जाने से बचाने के लिए मनमोहन सरकार द्वारा बनाई गई डायरेक्ट बेनिफिट स्कीम भी काफ़ी प्रभावी रही है। वहीं शिक्षा का अधिकार योजना भी पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की ही देन है। इसी तरह आज आम आदमी के पास के सूचना का अधिकार एक बड़ा हथियार है। यह भी मनमोहन सरकार की देन है। मनमोहन सरकार में जिस रफ़्तार से काम हो रहे थे उससे लगने लगा था कि भारत जल्द ही दुनिया की सबसे बड़ी आर्थिक शक्ति बन जाएगा। लेकिन उनकी सरकार ने एक काम जो नहीं किया वह यह था कि उन्होंने मीडिया को अपने नियंत्रण में नहीं किया कि जिसके नतीजे में उन्हें वर्ष 2014 में सत्ता गंवानी पड़ी। वहीं मोदी सरकार की बात करें तो उसने जबसे सत्ता संभाली है तब से बहुत सारी योजनाओं का एलान हुआ है, लेकिन ज़मीनी स्तर पर उन योजनाओं का असर देश की अर्थव्यवस्था पर दिखाई देता नज़र नहीं आ रहा है।

बात की जाए नोटबंदी की तो ऐसा लगा था कि इस योजना से देश को बहुत ज़्यादा फ़ायदा होने वाला है। जहां काले धन की समस्या का समाधान हो जाएगा, वहीं आतंकवाद की घटनाओं में भी कमी आएगी। इसके अलावा भी स्वयं नरेंद्र मोदी ने नोट बंदी के बहुत सारे फ़ायदे गिनाए थे और यह दावा किया था कि आने वाले समय में इस मेरे कठोर क़दम से देश के विकास में चार चांद लग जाएंगे, लेकन अब स्थिति यह है कि स्वयं भारतीय प्रधानमंत्री मोदी अपनी इस योजना के बारे में बात करने से बचते नज़र आते हैं। इसी तरह उनके द्वारा लाई गई जनधन योजना का हाल भी वैसा ही है। मोदी ने 15 अगस्त 2014 को जब इस योजना का एलान किया था तो आम लोगों में काफ़ी उत्साह देखने को मिला था, लेकिन अब यह योजना लोगों के लिए मूसीबत बनती जा रही है। वहीं मोदी सरकार ‘आयुष्मान भारत योजना’ को एक बड़ी उपलब्धि बताती है, लेकिन ज़मीनी स्तर पर इस योजना का भी आम लोगों को बहुत ही कम लाभ होता हुआ नज़र आ रहा है। इसी तरह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा उज्जवला योजना की शुरुआत 1 मई 2016 को की थी। इस योजना के तहत ग़रीबों को एलपीजी गैस कनेक्शन तो मिल गए लेकिन गैस के दाम इतने ज़्यादा बढ़ गए कि अब गैस सिलेंडर केवल घरों की सजावट के काम ही आ रहे हैं। वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2 अक्टूबर 2014 को स्वच्छ भारत मिशन के तहत देशभर में ‘एक स्वच्छ भारत’ राष्ट्रीय आंदोलन के रूप में शुरू किया गया था, इसके बारे में स्वयं हर भारतीय जनता है कि इस योजना का क्या असर हुआ है। क्योंकि आज भी भारत के बड़े और छोटे शहरों की सबसे बड़ी समस्या गंदगी ही बनी हुई है।

कुल मिलाकर हर नेता के विरोधी और समर्थक ज़रूर होते हैं। कुछ उनके कार्य की तारीफ़ करते हैं तो वहीं कुछ ऐसे होते हैं, जो उनके कार्य से नाख़ुश होते हैं। आपने अक्सर लोगों को देश के पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल की तुलना करते हुए सुना होगा। जहां मनमोहन सिंह के कामों की तारीफ़ करने वालों की संख्या अब पहले से कहीं ज़्यादा नज़र आने लगी है वही वर्तमान प्रधानमंत्री मोदी की आरंभिक दिनों में जितनी तारीफ़े होती थीं उसमें कमी आई है। हां एक बात ज़रूर है कि मीडिया द्वारा मोदी की तारीफ़ करने के प्रतिशत में ज़रूर वृद्धि हुई है। वैसे हमने दोनों प्रधानमंत्रियों के कामों और योजनाओं के बारे में संक्षेप में उल्लेख किया है। इसमें सभी योजनाओं और कार्यों को शामिल नहीं किया गया है। बाक़ी आप पर छोड़ दिया है कि आप स्वयं यह निर्णय लें कि किसके कार्यकाल में आपके लिए अच्छे दिन थे।

(रविश ज़ैदी R.Z)

नोटः लेखक के विचारों से तीसरी जंग हिन्दी का सहमत होना ज़रूरी नहीं है।