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युद्ध विराम के प्रस्ताव को वीटो करने वाले अमेरिका ने अब क्यों युद्धविराम कबूल किया : रिपोर्ट

संयुक्त राष्ट्रसंघ में ईरानी राजदूत ने एक बार फिर तेहरान के खिलाफ वाशिंग्टन के निराधार आरोपों को रद्द कर दिया।

राष्ट्रसंघ में ईरानी राजदूत अमीर सईद इरवानी ने मंगलवार को सुरक्षा परिषद की बैठक में कहा कि अमेरिका के खिलाफ होने वाले किसी भी हमले में ईरान का हाथ नहीं है।

राष्ट्रसंघ में ईरानी राजदूत ने सीरिया में विषम मानवीय संकट की संकेत किया और कहा कि राष्ट्रसंघ और उसके मानवता प्रेमी सहयोगियों के प्रयासों के बावजूद अमेरिका के एकपक्षीय और गैर कानूनी प्रतिबंधों के कारण सीरियाई लोगों विशेषकर महिलाओं और बच्चों को भारी नुकसान पहुंच रहा है।

उन्होंने कहा कि सुरक्षा परिषद के जवाब का ठोस न होना सीरिया में इस्राईल के अतिक्रमणों के जारी रहने का कारण है। साथ ही उन्होंने बल देकर कहा कि इस्राईल जानबूझ कर आम नागरिकों और बुनियादी सुविधाओं व संरचनाओं को निशाना बनाता है।

राष्ट्रसंघ में ईरानी राजदूत ने कहा कि 26 नवंबर को जायोनी सरकार ने दमिश्क के नागरिक एअरपोर्ट पर जो हवाई हमला किया था उसमें एअरपोर्ट को काफी नुकसान पहुंचा और एअरपोर्ट की गतिविधियों में काफी विघ्न उत्पन्न हो गया था और ईरान इस हमले की तीव्र भर्त्सना करता है।

जानकार हल्कों का मानना है कि अमेरिका और इस्राईल को हमास से होने वाले युद्ध में जिस अपमानजनक पराजय का सामना हुआ है वह आमतौर पर कल्पना से परे है क्योंकि अमेरिका और दूसरे पश्चिमी व यूरोपीय देशों ने जिस तरह से इस्राईल का खुलकर समर्थन किया है उसका कोई उदाहरण नहीं है।

अमेरिका ने न केवल ज़बान से समर्थन किया बल्कि हथियारों की कई खेप इस्राईल के लिए भेजा और उसने अपने कई हज़ार सैनिकों को अतिग्रहणकारी सैनिकों की मदद के लिए भेजा परंतु हमास और फिलिस्तीन के शूरवीर जवानों ने अमेरिका और इस्राईल के घमंड व अकड़ की हवा निकाल दी।

रोचक बात है कि गज्जा में युद्ध विराम के लिए सुरक्षा परिषद में एक प्रस्ताव पेश किया गया था जिसका अमेरिका ने न केवल विरोध किया बल्कि वीटो करके उसे पारित होने से भी रोक दिया और पूरी दुनिया ने एक बार फिर अमेरिका के मानवता प्रेम पर आधारित उसके पाखंडी व अस्ली चेहरे को देखा और अब इस्राईल ने युद्धविराम कबूल कर लिया और वह भी हमास की शर्तों पर। दूसरे शब्दों में इस्राईल ने नहीं बल्कि अमेरिका ने युद्ध विराम कबूल किया।

सवाल यह पैदा होता है कि उस समय अमेरिका ने क्यों युद्ध विराम के प्रस्ताव का विरोध और वीटो किया और अब युद्ध विराम को कबूल कर लिया? इसके जवाब में जानकार हल्कों का कहना है कि जिस समय अमेरिका ने युद्ध विराम के प्रस्ताव का विरोध किया उस समय उसे लग रहा था कि वह कुछ ही दिनों में हमास को खत्म करके बंदियों को आज़ाद करा लेगा परंतु इस्राईल ने 48 दिनों तक भीषण बमबारी की परंतु वह एक भी बंधक को आज़ाद नहीं करा पाया और इस दौरान बहुत से इस्राईली सैनिक मारे गये, सैकड़ों टैंक व बक्तबंद वाहन और दूसरे सैन्य संसाधन व हथियार तबाह हो गये।

सारांश यह कि अमेरिका और इस्राईल को जब पूरी तरह विश्वास हो गया कि वे सैनिक ताकत से बंदियों को आज़ाद नहीं करा सकते तब उन्होंने मजबूर होकर युद्धविराम कर लिया और अब इस अपमानजनक युद्ध विराम या दूसरे शब्दों में अपमानजनक पराजय से आमजनमत का ध्यान हटाने और उसे बांटने की चेष्टा की जा रही है। तेहरान के खिलाफ अमेरिका के हालिया निराधार आरोपों को इसी परिप्रेक्ष्य में देखा जा सकता है।