साहित्य

ये कहानी नही सच्ची घटना है….!!…बहु तुम कहीं जा रही हो?

लक्ष्मी कान्त पाण्डेय
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ये कहानी नही सच्ची घटना है….!!
तुम अब मायके कभी नहीं जाओगी…!!
अब तुम मायके नहीं जाओगी।
कभी भी नहीं।
घर में रहो और अपना घर संभालो।
अब इस मुद्दे पर मैं दोबारा कोई बात नहीं करना चाहता ”
मयंक ने माधवी से दो टूक बात की और अपने ऑफिस रवाना हो गया।
माधवी वही खड़ी देखती रह गई।
उसकी सास गरिमा जी के लिए भी ये बहुत अजीब था।
अपने शांत स्वभाव के बेटे को आज अपनी ही नज़रों के सामने पत्नी को डांटते देखा था।
मयंक ने कभी भी माधवी को मायके जाने से मना नहीं किया।
ये पहली बार था कि मयंक ने उसे इस तरह से जवाब दिया था।
नहीं तो इतने दिन से मायके जाने के लिए बोल रही थी।
पर वो हर बार टाले जा रहा था।
जबकि हर बार तो वो उसे खुद ही मायके छोड़ आता था।
आज माधवी जिद पर ही अड़ गई तो मयंक ये जवाब देकर गया।
मयंक के जवाब पर गरिमा जी कुछ नहीं बोली, चुपचाप अपने कमरे में चली गई। क्योंकि वो तो जानती थी कि मयंक क्यों मना कर रहा है।
इधर सोचते सोचते माधवी वही हाॅल में सोफे पर बैठ गई।
पिछली बार पापा छमाही में मायके गई थी।
उसके बाद मायके जाना ही नहीं हुआ। ये अलग बात है कि मायके से भी किसी ने फोन करके बुलाया नहीं। पर क्या फर्क पड़ता है। है तो उसका मायका ही ना।
मम्मी और भाई सब तो है। फिर मयंक जाने से क्यों इंकार कर रहा है।
जबकि जब पापा थे तो वो कभी मना नहीं करता था।
यहां तक कि उसके बाद भी उसने कभी मना नहीं किया। सोफे पर बैठी माधवी इन्हीं सब चीजों को सोच रही थी।
माधवी की शादी को पांच साल हो चुके थे। मयंक काफी सुलझे हुए इंसान थे। घर में सास गरिमा जी थी।
कभी उन्होंने माधवी पर रोक टोक नहीं की। लेकिन एक ही बात थी जहां वो माधवी को टोकती थी। वो थी मायके जाने को लेकर।
माधवी की शुरू से ही आदत थी। मायका पास था तो हर सप्ताह ही मायके पहुंच जाती थी।
फिर सुबह से शाम तक वहीं रुक कर आराम से आती। मयंक ने कभी इस बात को लेकर उसे रोका नहीं। लेकिन गरिमा जी हमेशा टोकती,
” बहु ये क्या नियम बना रखा है तुमने….?
जब देखो मायके चली जाती हो। मुझे तुम्हारा इस तरह हर सप्ताह मायके जाना पसंद नहीं”
लेकिन माधवी एक कान से सुनती और दूसरे कान से निकाल देती। गरिमा जी मयंक को कहती तो मयंक भी हंसकर टाल देता,
” क्या मां आप भी।
सुबह जाकर शाम को आ तो जाती है। फिर क्या दिक्कत है। क्यों मना करती हो? जाने दो”
इसके आगे गरिमा जी कुछ नहीं कह पाती।
यहां तक कि जब बेटी नव्या हुई तब भी यही हाल था।
आज नव्या भी चार साल की हो चुकी थी। लेकिन अभी आठ महीने पहले ही माधवी के पिता की हार्ट अटैक से मृत्यु हो गई। पंद्रह दिन माधवी वही रही।
उसके बाद हर महीने जो श्राद्ध निकलता था, उस पर भी वो गई थी। मयंक भी साथ गया था। लेकिन छमाही के बाद अचानक ऐसा क्या हो गया कि मयंक उसे मायके जाने नहीं देता।
आजकल मम्मी भी फोन पर ठीक से बात नहीं कर पाती। क्या पता दोनों भाभी मम्मी को ठीक से रखती भी हैं या नहीं। ऊपर से मयंक का ये व्यवहार।
सोचते सोचते माधवी जब किसी नतीजे पर नहीं पहुंची तो मन ही मन खुद ही निर्णय लेकर खड़ी हो गई।
” आज तो चाहे कुछ भी हो जाए। मैं मायके जाकर ही रहूंगी। आखिर मुझे अपनी मम्मी और दोनों भाइयों और भाभियों से मिलने का हक है। मयंक इस तरह मुझे मना नहीं कर सकते।
सोचते सोचते माधवी कमरे में चली गई और फिर तैयार होकर बाहर आई। तब तक गरिमा जी भी बाहर आ चुकी थी। उसे तैयार देखकर गरिमा जी ने पूछा,
” बहु तुम कहीं जा रही हो?”
“जी मां जी, मैं अपने मायके जा रही हूं। मम्मी से मिले बहुत दिन हो चुके हैं तो उनसे मिलकर जल्दी ही आ जाऊंगी। नव्या के आने से पहले ही आने की कोशिश करूंगी। नहीं हो पाया तो आप नव्या को खाना खिला दीजिएगा”
कहकर माधवी बाहर की तरफ मुड़ी ही थी कि गरिमा जी ने रोक दिया,
” बहु, तुम अब मायके नहीं जाओगी। सुबह मयंक ने मना किया था तुम्हें। फिर क्यों जा रही हो?”
गरिमा जी की बात सुनकर माधवी खड़ी रह गई। फिर हिम्मत कर बोली,
” मां जी मेरी मम्मी पर दुखों का पहाड़ टूटा है।
उन्होंने अपना जीवनसाथी खोया है। हम लोग उसकी भरपाई नहीं कर सकते।
लेकिन कम से कम मैं अपनी मम्मी से मिलकर तो आ सकती हूं। उन्हें थोड़ी तसल्ली तो दे सकती हूं। बेटी हूं उनकी, क्या इतना सा भी मेरा हक नहीं है। इतने दिन हो चुके मुझे उनसे मिले हुए।
हर बार आप लोग कुछ ना कुछ बहाना कर मना कर देते हो। ‌पर आज तो मैं जरूर जाऊंगी”
माधवी जिद पर आते हुए बोली।
” बहू इतनी जिद अच्छी नहीं होती है। मयंक ने मना किया है ना। चुपचाप घर पर रहो”
” नहीं, मैं जाऊंगी। आज तो मैं जरूर जाऊंगी।
बस”
कहकर माधवी जबरदस्ती घर के बाहर निकल गई। इधर गरिमा जी को कुछ भी समझ नहीं आया तो उन्होंने मयंक को फोन लगा दिया। और ये बता दिया कि माधवी जबरदस्ती मायके रवाना हो गई है।
” ठीक है मां, मैं देखता हूं”
कहकर मयंक ने फोन रख दिया।
इधर कुछ देर बाद माधवी अपने मायके पहुंच गई। लेकिन घर पर ताला लगा हुआ था। उसने मम्मी का फोन ट्राई भी किया लेकिन मम्मी ने फोन उठाया नहीं।
तभी वही पास में रहने वाले उसके चाचा जी ने उसे देख लिया और उसे आवाज लगा कर बोले,
“अरे माधवी बेटा, घर पर कोई नहीं है। इधर हमारे यहां आ जाओ”
चाचा जी की बात सुनकर माधवी उनके घर चली गई। जब वहां गयी तो चाची जी ने चाय नाश्ता परोसते हुए कहा,
अरे माधवी बेटा, आज तो बहुत दिनों बाद आई। अब तेरी सास की तबीयत कैसी है? “
चाची जी की बात सुनकर माधवी हैरान होकर बोली,
” मैं समझी नहीं चाची जी “
” अरे तेरी सास सीड़ीओ से गिर गई थी ना। इसीलिए तो तू इतने दिन से नहीं आ रही थी। उसी बारे मे पूछ रही हूं। अब तो तेरी सास ठीक है ना?”
चाची जी ने उसे समझाते हुए कहा।
सुनकर माधवी हक्की बक्की रह गई। भला उसकी सास को कब चोट लगी?
” आपको किसने कहा चाची जी कि मेरी सास को चोट लग गई। मैंने तो कुछ बोला ही नहीं”
माधवी हैरान होते हुए बोली। तभी चाचा जी बीच में बोल पड़े,
“अरे छमाही के दो दिन बाद जब प्रॉपर्टी का बंटवारा हो रहा था और पेपर्स पर तुम्हारे साइन चाहिए थे। उस समय तुम्हारे भाइयों ने ही बताया था।
हमने तो कहा भी था कि हम मिल आते हैं। लेकिन उन्होंने कहा कि माधवी पर वैसे ही काम का वजन ज्यादा है। ऐसे में वहां जाने से उन्हें परेशानी हो सकती है”
‘ प्रॉपर्टी का बंटवारा’
ये कब हुआ?
सुनकर ही माधवी का दिमाग घूम गया। तभी चाची जी बोली,
” पर एक बात मुझे समझ में नहीं आई माधवी।
तूने पूरी प्रॉपर्टी पर से अपना हिस्सा छोड़ दिया। यहां तक कि उस प्रॉपर्टी को भी छोड़ दिया जो तेरे पापा ने तुझे यह कह कर दी थी कि ये नव्या के लिए है”
सुनकर ही माधवी कुछ समझ ही नहीं आ रहा था कि वो क्या करें और क्या बोले। तभी चाचा जी का बेटा वरुण कमरे में आ गया और माधवी को देखकर चुपचाप खड़ा रह गया।
यह देखकर चाची जी बोली,
” अरे, वरुण माधवी आई है।
हमेशा तो इसे देखकर खूब हंसी मजाक करता है। आज चुपचाप क्यों खड़ा हो गया”
तभी माधवी बोली ,
” चाचा जी मैं चलती हूं।
नव्या के आने का समय हो गया है। मां जी उसे संभाल नहीं पाएगी”
कहकर वो बाहर आने लगी तो वरुण बोला,
” रूको माधवी। मैं भी तुम्हें बाहर‌ ऑटो स्टैंड तक छोड़ देता हूं”
कह कर वरुण उसके साथ ही बाहर आ गया।
और दोनों वहां से पैदल ही ऑटो स्टैंड के लिए निकल गए। ऑटो स्टैंड पर पहुंचने के बाद उससे बोला,
” माधवी तुम यहां क्या कर रही हो?
मुझे तो लगा था अब तुम मायके ही नहीं आओगी। आखिर तुम्हारे परिवार वालों ने तुम्हारे साथ कितना गंदा व्यवहार किया है। मयंक जी तो बहुत गुस्सा हो रहे थे।
यहां तक कि तुम्हारे घर पर आकर लड़ कर भी गए थे। आखिर तुम्हारे जीते जी तुम्हारे परिवार वालों ने तुम्हारा डेथ सर्टिफिकेट तक….
छी….
मैं तो ये बात अपने मम्मी पापा को बता ही नहीं पाया। पर यकीन नहीं होता कि ताई जी ने भी उनका साथ दिया। अपनी ही बेटी को…..
कहते कहते वरुण चुप हो गया।
उसकी बात सुनकर माधवी के पैरों तले जमीन खिसक गई। तभी वरुण बोला,
” आज शायद जमीन के रजिस्ट्रेशन के लिए गए होंगे। इसलिए घर पर कोई नहीं है”
अब माधवी को समझ में आ रहा था कि मयंक उसे मायके आने के लिए क्यों मना कर रहा था। और इसीलिए आजकल उसकी मम्मी भी फोन पर उससे ज्यादा बात नहीं करती। बस फोन उठाते ही उन्हें फोन रखने की जल्दी होती है।
माधवी को कुछ समझ नहीं आया तो उसने अपनी मम्मी को दोबारा फोन लगा दिया। लेकिन इस बार उसकी मम्मी ने फोन उठा लिया,
” अरे माधवी बेटा, मैं अभी मंदिर आई हुई हूं। तुमसे बाद में बात करती हूं”
कह कर वो फोन रखने ही वाली थी कि माधवी ने कहा,
” मम्मी मंदिर में हो ना। तो अपनी मरी हुई बेटी की आत्मा की शांति के लिए भी भोग जरूर लगा देना”
सुनते ही कुछ पल के लिए उसकी मम्मी बिल्कुल शांत हो गई। फिर जब दोनों तरफ ही मौन हो गया तो उसकी मम्मी बोली,
” देख बेटा, मैं मेरे दोनों बेटों के नाम में प्रॉपर्टी कर रही हूं।
आखिर तुझे प्रॉपर्टी देने का क्या फायदा? प्रॉपर्टी तो तेरे साथ तेरे ससुराल चली जाएगी। आगे चलकर तेरे भाईयों को तेरे बच्चों की शादी में भात तो देना ही पड़ेगा ना। ऊपर से मेरी सारी जिम्मेदारी भी तो बेटे ही उठाएंगे। पर तु फिक्र मत कर। तुझे भी कुछ ना कुछ तो मैं जरूर दूंगी”
” मुझे आपका कुछ भी नहीं चाहिए। आप रखिए अपनी प्रॉपर्टी को। जिस मां के लिए उसकी बेटी ही मर गई, उसकी प्रॉपर्टी का मैं क्या करूंगी”
कहकर माधवी ने गुस्से में फोन रख दिया। और वही रोड पर रोने लग गई। वरुण उसे चुप कराने की नाकाम कोशिश करता रहा। तभी मयंक वहां आ गया। मयंक को देखकर माधवी उसके गले लग कर खूब रोयी। तब मयंक ने कहा,
” बस इसीलिए मैं तुम्हें आने देना नहीं चाहता था। नहीं चाहता था कि तुम्हे ये बात पता चले। पर तुम फ़िक्र मत करो। मैंने डिसाइड कर लिया है कि मैं इन लोगों के खिलाफ कोर्ट में केस करके रहूंगा”
“नहीं, कोई जरूरत नहीं है उन लोगों पर केस करने की। कुछ नहीं चाहिए मुझे उन लोगों का। मुझे उन लोगों की शक्ल भी नहीं देखनी। सोच लूंगी कि जहां मेरे पापा खत्म हो गये, वहां मेरा मायका भी खत्म हो गया। मेरे लिए मेरा पति और मेरा परिवार ही काफी है “
आखिरकार माधवी मयंक के साथ वापस अपने घर आ गई।
वह दिन था और आज का दिन है, माधवी कभी मायके नहीं गई।
उसकी मम्मी ने आकर उसे मनाने की कोशिश भी की। लेकिन माधवी ने हमेशा के लिए हाथ जोड़ दिये।
✍️ लक्ष्मी कुमावत

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