साहित्य

राम शिरोमणि उपाध्याय की एक ग़ज़ल और एक गीत!

Ram Shiroman Upadhyay
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ग़ज़ल
याद अपनी दिला कर चली गई पगली,
दिल में अरमां जगा कर चली गई पगली।
सर झुकाना हर समय अच्छा नहीं होता,
मुझको यह बात बता कर चली गई पगली
यहां अपनी मुसीबत आप ही सहनी पड़ती,
हुनर जीने का सीखा कर चली गई पगली।
मोहताज ज़िंदगी में किसी का न मैं रहूं,
हौसला मेरा बढ़ा कर चली गई पगली।
ज़माना साथ नहीं देता है बदनसीबों का,
एक विस्वास दिला कर चली गई पगली।
क्यों कर पल भर के मिलन में ही मेरे,
बेकरारी दिल की बढ़ा कर चली गई पगली।
ख़ुद को भूला हुआ था कब से मैं पथिक,
मुझको मुझसे मिला कर चली गई पगली।।
राम शिरोमणि उपाध्याय
पथिक जौनपुरी।

Ram Shiroman Upadhyay
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गीत।
सदा पास तेरे रहकर भी दूर तुम्हे कितना पाता हूँ
सुख सपनों में खो कर भी दुःख के गीत सदा गाता हूँ।
कितनी बार डूबा अंतर में,
मानस मुक्ता मिल न पाई,
मुझसे नेह लगाकर भी वो,
छलना बनकर छलने आई।
आशा की इस बुझती लौ में, पथ भी नहीं देख पाता हूँ,
सुख सपनों में खो कर भी दुःख के गीत सदा गाता हूँ।
स्वर राग मनोहर सुनकर भी
मन की कटुता बढ़ती जाती,
पल दो पल जब भी मुस्काएँ
भावों में क्यों जड़ता छाती।
जीवन की शायद यही पहेली, कुछ भी समझ नहीं पाता हूँ
सुख सपनों में खो कर भी दुःख के गीत सदा गाता हूँ।
कुछ प्रश्न नहीं है हार जीत की,
फिर साँसे क्यूँ रूँधीरहती,
निर्मम अपलक साँसेरोके,
प्रीति विरह में ही पलती।
भटक भटक कर अँधियारे में, कोई राह नहीं पाता हूँ,
सुख सपनों में खो कर भी दुःख के गीत सदा गाता हूँ।
राम शिरोमणि उपाध्याय,
पथिक जौनपुरी।