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वैज्ञानिकों ने हमारी आकाशगंगा के सबसे दूर के छोर पर 208 नए सितारों की खोज की, कैसे बने ये सितारे?

खगोलविदों ने अंतरिक्ष की धुंध में ऐसे सितारे खोज निकाले हैं, जिन्हें आकाश गंगा के सबसे दूर स्थित सितारे कहा जा रहा है. मिल्की-वे में अब तक इतनी दूर का कोई सितारा नहीं मिला था.

वैज्ञानिकों ने हमारी आकाशगंगा मिल्की-वे के सबसे दूर के छोर पर 208 नए सितारों की खोज की है. ये सितारे उस खगोलीय धुंध में मिले हैं, जो मिल्की-वे के किनारे पर दिखाई देती है.

शोधकर्ताओं का कहना है कि ये 208 सितारे धुंध के जिस हिस्से में मिले हैं, वहां डार्क मैटर नामक रहस्यमय पदार्थ की भरमार है. डार्क मैटर अंतरिक्ष का वह अंधेरा हिस्सा होता है, जिसे ना देखा जा सकता है और ना उसके भीतर जाया जा सकता है. उसकी मौजूदगी का पता सिर्फ उसकी गुरुत्वाकर्षण शक्ति से चलता है.

208 सितारों का यह समूह उसी धुंध में मौजूद है. इनमें से सबसे ज्यादा दूर का सितारा पृथ्वी से करीब 10.8 लाख प्रकाश वर्ष दूर है. एक प्रकाश वर्ष लगभग 95 खरब किलोमीटर के बराबर होता है.

इन सितारों को कनाडा-फ्रांस-हवाई टेलीस्कोप की मदद से खोजा गया है. यह अमेरिका के हवाई में मौना किया माउंटेन पर स्थित है. ये सितारे उस श्रेणी का हिस्सा हैं, जिसे आरआर लायरे कहा जाता है. इस श्रेणी के सितारे तुलनात्मक रूप से हल्के होते हैं. उनमें हाइड्रोजन व हीलियम से ज्यादा भारी तत्व बहुत कम मात्रा में होते हैं. सबसे दूर जो सितारा मिला है, वह हमारे सूर्य के भार का करीब 70 प्रतिशत प्रतीत होता है.

कैसे बने ये सितारे?
वैज्ञानिकों का एक मत यह है कि मिल्की-वे के किनारों पर जो खगोलीय धुंध छायी हुई है और जहां ये सितारे मिले हैं, दरअसल वे कभी छोटी-छोटी आकाशगंगाएं हुआ करती होंगी जो बाद में मिल्की-वे में मिल गईं.

सांता क्रूज की कैलिफॉर्निया यूनिवर्सिटी में डॉक्टरेट कर रहे युटिंग फेंग ने इस शोधकार्य का नेतृत्व किया. वह बताते हैं, “इन सितारों के जन्म के बारे में हमारी व्याख्या यह है कि इनका निर्माण छोटी आकाशगंगाओं और सितारों के छोटे-छोटे समूहों में हुआ होगा. बाद में ये सारे-के-सारे मिल्की-वे में मिल गए.”

फेंग ने अपना शोधपत्र अमेरिकन एस्ट्रोनॉमिकल सोसाइटी की सिएटल में हुई मीटिंग में पेश किया. उन्होंने कहा, “इन सितारों की आकाशगंगाओं को गुरुत्वाकर्षण के जरिए छिन्न-भिन्न कर निगल लिया गया और हजम कर लिया गया. लेकिन ये सितारे मलबे के रूप में बचे रह गए.”

कैलिफॉर्निया यूनिवर्सिटी में खगोलविज्ञान विभाग के अध्यक्ष और शोध के सह-लेखक राजा गुहा ठाकुरता ने कहा, “बड़ी आकाशगंगाएं अपने जैसी छोटी आकाशगंगाओं को निगलकर ही बड़ी होती हैं.” इस तरह की घटनाओं के जरिए ही मिल्की-वे का आकार लगातार बढ़ता रहा है.

मिल्की-वे की धुंध में एक अंदरूनी परत होती है और एक बाहरी. यह धुंध असल में मिल्की-वे के मुख्य चपटे हिस्से से भी बड़ी है. आकाशगंगा के केंद्र में एक विशाल ब्लैकहोल, है जो पृथ्वी से करीब 2,600 प्रकाश वर्ष दूर है. मिल्की-वे में कुल सितारों की संख्या 100 से 400 अरब के बीच हो सकती है. इन्हीं में से एक हमारा सूर्य है. मिल्की-वे के कुल सितारों में पांच प्रतिशत उस खगोलीय धुंध में हैं.

धुंध का अधिकतर हिस्सा डार्क मैटर, यानी वह रहस्यमय पदार्थ है, जिसके बारे में मनुष्य को मामूली जानकारियां हैं. माना जाता है कि इसी डार्क मैटर के कारण मिल्की-वे का आकार डिस्क जैसा है क्योंकि इसके गुरुत्वाकर्षण के कारण ही सारे सितारे और अन्य खगोलीय पिंड साथ आए हैं और एक आकाशगंगा के रूप में जमा हो गए हैं.

मिल्की-वे के बाहरी हिस्से के बारे में भी वैज्ञानिक ज्यादा नहीं जानते हैं. जो नए सितारे मिले हैं, वे मिल्की-वे की पड़ोसी आकाशगंगा एंड्रोमीडा के अंदर घुसे हुए थे. फेंग बताते हैं, “हम देख सकते हैं कि एंड्रोमीडा और मिल्की-वे के बाहरी हिस्से काफी फैले हुए हैं और एक दूसरे के बहुत करीब हैं, लगभग सटे हुए.”

वैज्ञानिकों का यह भी अनुमान है कि इन सितारों के ग्रह हो सकते हैं. गुहा ठाकुरता बताते हैं, “हमें पक्के तौर पर तो नहीं पता है, लेकिन इनमें से हरेक तारे के अपने ग्रह हो सकते हैं जो इनके चक्कर लगाते होंगे. ठीक वैसे ही, जैसे हमारा सौरमंडल है.”

वीके/एसएम (रॉयटर्स)