साहित्य

सत्य कथा…By – डॉ.विजया सिंह

Dr.vijayasingh
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सत्य कथा…
सुबह सवेरे पहले उठकर बुहार लेती हैं वो अपना घर आँगन और गुनगुना लेती है प्रेम के गीत मन ही मन में और भूला देती हैं कल की बीती बातें जो चुभ रही थी कही अन्तर्मन में चूल्हे पर चाय बनाते बनाते व्यवस्थित कर लेती हैं पूरा घर और व्यवस्थित कर लेती हैं खुद को एक नए दिन के लिए, शुरु हो जाती है बच्चों की फ़रमाइश आज ये बनाओ वो बनाओ सबकी फ़रमाइश पूरी करने में बीत जाता है पूरा दिन, धूप दीप और पूजा भी कहाँ कर पाती है वो मन से, बस जल्दी जल्दी में जला देती हैं दिया ये सोचकर की ईश्वर सब जानता है,बालो में कन्धी कहाँ कर पाती है बस यूँ ही कुचड़ मुचड़ करके बाँध लेती हैं अब, सुम्मी के घर में ड्रेस भी है और ड्रेसिग टेबल भी किन्तु शादी से पूर्व जहाँ तरह तरह के मुँह बनाकर और बाल बनाकर घंटो खड़ी रहती थी कभी, अब मन होता है, ना वक्त, की खड़ी रहे बेवजह दर्पण के सामने, अब कोई आता जाता नहीं है घर में उसके तो कुछ भी पहनो क्या फर्क पड़ता है ये सोचकर उठा लेती हैं कोई भी एक ड्रेस और बढ़ जाती हैं किचिन की तरफ दही दूध मलाई सब्जी सबको देखना समेटना भी है तो टीवी पर लगा देती है लता मंगेशकर के लोकप्रिय गीत और खुद में कही खो जाती हैं वो, सबको खाना दवाई देकर बीत जाता है उसका पूरा दिन नही पूछा किसी ने घर में उससे उसने क्या खाया है ?क्या पिया है? क्या पहना है ?माथे पर बिदिया लगी है की नहीं ? हाथों में कंगन है की नही ? पायल बहुत पसंद थी छम छम जो करती थी आज बहुत सी पायल है घर में लेकिन मन नही है छम छम करने का उनको उतारे हुए वर्षो हो गए, नही कहा किसी ने उसको की पायल पहना करो, यहाँ तक कि चेहरे को भी सभी गौर से उस समय देखते है जब सब्जी में नमक और चाय में शक्कर कम ज़्यादा हो जाती हैं वर्षो से यही वो शादीशुदा जिंदगी थी उसकी जो गुजर रही थी…और सुम्मी गुजार रही थी फ़िर एक दिन पति का दूसरा रुप सामने आया उसके मोबाइल से ना जाने कितनी लड़कियो महिलाओ के खत निकल पड़े जिसने कभी उसकी और देखा ही नहीं जी भर के वो सोचती थी पति ऐसे ही होते होगे शायद…वही पति कर रहा था प्यार की बातें घर बसाने की बातें किसी और के सँग…प्रेम किसी से छीना नहीं जा सकता है ये वो तोहफा है जो बाजार में भी नहीं बिकता की खरीद लेती वो अपने लिए…स्त्री हो या पुरुष छला जाता इसी मोड़ पर आकर हार जाता है अक्सर अपने ही घर में अपनो से, इसी बीच दूसरा सबूत सामने आया पति ने उड़ा दिया नाम चुपके से समस्त सम्पति और सरकारी दस्तावेज से.. नही लिखा था उसने सुम्मी का नाम अपने परिवार के सदस्यों में भी, एक बार को लगा जैसे फ़ैक दिया हो किसी ने उसे पहाड़ की चोटी से… आजकल युध्द पहले जैसे नहीं होते की सामने आये और भीड गये आर्थिक रुप से हराया जाता है किसी देश को सुम्मी को भी हराया गया आर्थिक प्रतिबंध लगाकर उसकी नौकरी छुड़वाकर तन्हा करके, तन मन धन तीनों से छ्ली गई थी वो एक नाम था पति का आज वो भी चुपके से छीन लिया अब कौन सा सात फेरो का, सात जन्मो का रिश्ता बचाती वो …आप सोच रहे होगे स्त्री है कोई कमी होगी इसमे, हाँ मै स्त्री हूँ और मेरी सबसे बड़ी कमी है की मुझमे कोई कमी नहीं है, स्त्री हो या पुरूष सच्चे और चरित्रवान का कलयुग में कोई मोल नहीं है ।।

सुम्मि को उससे क्या चाहिए था कुछ नहीं रूपया, पैसा, दौलत, शोहरत सब हासिल थी उसे ,नही तो हौसला है कमाकर खाने का उसमे ,वो सोच रहा था कि मैंने इससे अपने बच्चों को पलवा लिया और सुम्मी सोच रही थी इस मूर्ख ने अपना सब कुछ गँवा दिया हम सभी ने अपना सामान समेटा और उसको उसके घर में हमेशा के लिए अकेला छोड़ दिया तन से मन से धन से ……………..आजकल संबंधो में कोई कोर्ट कचहरी नही जाता बस छोड़ देता है तन से मन से धन से….आज सुम्मी बहुत खुश हैं अपने बच्चो के साथ वो एक बार फिर से खड़ी हो जाती हैं दर्पण के सामने खूब श्रंगार करती है चूडियो की खंनक ओर पायल की छम- छम फिर से गूंज उठती हैं उसके घर में…आज वो प्रेंम के गीत मन ही मन मे नहीं गाती ….शोर मचा कर गाती हैं….म्यूजिक सिस्टम के साथ ..पूजा की थाली भी सजने लगी है घर मे सुबह शाम आरती होती हैं आरती कुंज बिहारी की श्री गिरधर कृष्ण मुरारी की… जयदेव जयदेव ओर हर हर महादेव ईश्वर मन में आकर बस गये हैं आज वो किसी से कुछ पाना नहीं चाहती देना चाहती है और जब हम देना सीख ज़ाते है प्रेम सम्मान य़ा पैसा वो कई गुना होकर वापस लोंटता हैं आपके पास ……..❤️

सादर राधे राधे डॉ.विजया सिंह #drvijayasingh