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सरकार को फिर से एक नयी ताड़ना नीति बनानी होगी, कुछ बातें कर ली जायें!

Kavita Krishnapallavi
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कुछ बातें कर ली जायें!
राजनीति, साहित्य और समाज के विभिन्न मुद्दों पर मेरी जो राय होती है, जो स्टैंड होता है, उसे दोटूक भाषा में रखती हूँ और व्यंग्य की शैली मेरी आदत सी है — चाहे थोड़ा हास्यमूलक हो, या थोड़ी ज़्यादा ही मिर्ची लगने वाली I
फ़ासिस्टों से निर्भीक शत्रुता है और तमाम किस्म के लिब्बुओं और सोशल डेमोक्रेट्स से घृणा! साहित्य-कला के क्षेत्र के कैरियरवादी, अवसरवादी मदारियों, प्रगतिशील मुखौटे वाले प्रच्छन्न ब्राह्मणवादियों और सभी किस्म के छद्मवामियों को मनुष्यरूपेण तिलचट्टा और कनखजूरा समझती हूँ I
अपनी बात दोटूक कहती हूँ तो विरोधी के दोटूक विचारों का स्वागत भी करती हूँ, बशर्ते कि वे बातें थोड़ी तर्कपूर्ण हों, और सबसे बड़ी बात यह कि भिन्न विचार रखने वाला बहस करने को तैयार हो I व्यंग्य करती हूँ तो अपने ऊपर किये गये व्यंग्य से तिलमिलाती भी नहीं और ‘सेंस ऑफ ह्यूमर’ खोये बगैर जवाब भी देती हूँ I सिर्फ़ असभ्य, स्त्री-द्रोही, लंपट और महामूर्ख कुतर्कियों को ही ब्लॉक करती हूँ I
निवेदन यह है कि मतभेद पर बहस कीजिए, व्यंग्य करने आता हो तो व्यंग्य कीजिए, लेकिन इनबॉक्स या कमेंट बॉक्स में आँय-बाँय मत कीजिए और नसीहत या हितोपदेश तो भूले से भी मत दीजिए I इसके बजाय कल्टी मार लीजिए I मुझे न झेल पाने वाले यथाशीघ्र मुझे अमित्र करके निकल लें I यही श्रेयस्कर होगा I जिनके लिए मेरे विचार असहनीय हों वे मानसिक कष्ट झेलने की जगह मित्र-सूची से बहिर्गमन कर जायें, यही उचित होगा I
एक निवेदन और ! पिछले दिनों जब यह बात पुष्ट हो गयी कि किसी न किसी तरीके से मेरी पोस्ट्स की रीच बहुत कम कर दी गयी है तो प्रायोगिक तौर पर मैंने एक उपाय यह निकाला कि कुछ फेसबुक मित्रों को टैग कर देती थी I इसमें सफलता यह मिली कि पोस्ट्स टैगित लोगों के अतिरिक्त भी एक बड़ी संख्या को दीखने लगती थी I लेकिन सभी लोग टैग किया जाना (या कुछ ख़ास पोस्ट्स पर टैग किया जाना) पसन्द नहीं करते I निवेदन यह है कि वे बेखटके तत्काल इनबॉक्स मुझे बता दें Iफिर मैं उनको टैग नहीं करूँगी I

Kavita Krishnapallavi
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‘गाँधी गोडसे एक युद्ध’ फिल्म के बारे में जलेस की क्या राय है? क्या कोई आधिकारिक वक्तव्य आया है?
अब यह मत कहियेगा कि किसी फिल्म पर वक्तव्य देना किसी सांस्कृतिक संगठन का काम नहीं, या उसकी प्राथमिकता नहीं! यह फिल्म इतिहास से भी अधिक वर्तमान राजनीतिक-सामाजिक परिदृश्य पर एक टिप्पणी है, बल्कि उससे भी अधिक, यह एक विचारधारात्मक वक्तव्य है! इसपर बहुतेरे प्रगतिशील-जनवादी बुद्धिजीवी और लेखक लिख चुके हैं और बहस जारी है! असगर वजाहत जलेस के अध्यक्ष हैं! अगर जलेस इस मसले पर चुप रहता है तो क्या इस चुप्पी का इसके अलावा और भी कोई अर्थ निकलता है कि वह असगर वजाहत की अवस्थिति के साथ खड़ा है?

Kavita Krishnapallavi
Madan Keshari गाँधी निश्चित ही भारतीय बुर्जुआ वर्ग के राष्ट्रीय नायक थे, वे उस वर्ग के विचारधारात्मक सिद्धान्तकार, राष्ट्रीय आंदोलन काल के राजनीतिक प्रतिनिधि, उसके ‘मास्टर स्ट्रैटेजिस्ट’ और ‘मास्टर टैक्टीशियन’ थे! लेकिन वह बुर्जुआ सिद्धांतकार थे, उस वर्ग के भाड़े के टट्टू नहीं थे! अपने उसूलों और सिद्धांतों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता जेनुइन थी! वह क्लासिकल मानवतावाद के भारतीय प्रतिनिधि थे लेकिन उनके पास दिदेरो, वोल्टेयर, रूसो आदि प्रबोधनकारों की वैज्ञानिक तर्कणा नहीं थी! रस्किन, थोरो, तोल्स्तोय के इस भारतीय शिष्य का मानवतावाद धार्मिक रूढ़ियों में लिथड़ा हुआ था! वह वर्णाश्रम और स्त्री की अधीनस्थता का आदर्शीकरण करते थे! उनका यूटोपिया एक प्रतिगामी अतीतोन्मुख यूटोपिया था, हालांकि समग्रता में, वह एक आधुनिक चिंतक थे! ग्राम स्वराज और स्वावलम्बी छोटी किसानी सामुदायिक अर्थव्यवस्था विषयक उनका आर्थिक चिंतन सिसमोंदी, प्रूधों और रूसी नरोदवादियों से भी अधिक पिछड़ा हुआ था! लेकिन यह भी उल्लेखनीय है कि स्वतंत्रता प्राप्ति तक व्यापक जनता की लामबंदी करने वाले गाँधी और उनके माडल को हाशिये पर धकेला जा चुका था! वास्तव में यह काम नेहरू कमेटी की रिपोर्ट आने और ‘बॉम्बे प्लान’ बनने के समय ही किसी हद तक हो चुका था! गाँधी के जो भी अंतरविरोध और उनकी जो भी आलोचना हो, लेकिन उनको गोडसे के बरक्स खड़ा करके कोई स्वस्थ आलोचनात्मक विमर्श संभव ही नहीं! (अगले कमेंट में जारी)

Kavita Krishnapallavi
(पिछले कमेंट से जारी) और फिर गोडसे तो फासिस्ट सिद्धांतकार या राजनीतिक चिंतक भी नहीं था! वह एक कमअक्ल, उन्मादी, धर्मांध हत्यारा था जिसकी ‘मिथ्या चेतना’ का निर्माण सावरकर और अन्य हिन्दुत्ववादियों की शिक्षाओं ने किया था! गाँधी के ही हृदय-परिवर्तन और ‘पाप से घृणा करो, पापी से नहीं’ टाइप नैतिक सिद्धांतों का तीर चलाकर गाँधी का शिकार करने के पीछे वजाहत साहब की मंशा क्या है? ‘हर किसी को अपने ढंग के राष्ट्रवादी विचार रखने का अधिकार है लेकिन किसी की हत्या करने का नहीं’– ऐसी प्रस्थापना देने के पीछे मंशा क्या है? काल्पनिक संवाद के ज़रिए गाँधी और गोडसे के एक राह के राही बन जाते दिखाने के पीछे आखिर नीयत क्या है? दरअसल इतिहास आधारित विषयवस्तु वाली कोई कलाकृति भी अपने वर्तमान को संबोधित करती है! वह अपने देशकाल का ही एक रूपक पेश करती है! वजाहत साहब की यह कृति भी दरअसल गोडसे को नायक मानने वाले वर्तमान हिंदुत्ववादियों की सोच और उनके जघन्य कुकर्मो के औचित्य-प्रतिपादन की, उन्हें जनमानस में स्थापित करने की, एक निहायत ख़तरनाक और शातिराना कलात्मक कोशिश है और हम इसी रूप में इसके कटु आलोचक हैं!

Kavita Krishnapallavi
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सरकार को फिर से एक नयी ताड़ना नीति बनानी होगी! प्राथमिक, माध्यमिक और उच्च ताड़ना केन्द्रों में ढोलों और पशुओं के प्रवेश के प्रावधान करने होंगे! साथ ही समस्त ताड़कों और ताड़काओं को भी नये सिरे से प्रशिक्षण देना होगा कि वे उनको किस प्रकार ताड़ना दें! तदनुसार, आईटीआई और पॉलिटेक्निक जैसे प्रताड़ना केन्द्रों में प्रताड़ना के नये ताड़्य-क्रम भी बनाने की ज़रूरत है! इस प्रयोजन को सिद्ध करने के लिए ताड़नाशास्त्रियों की जो कमेटी बनाई जाये, उसमें गीता प्रेस, गोरखपुर से जुड़े विद्वानों, चलचित्र जगत के कंगना रनौत या अनुपम खेर जैसे कुछ जनशिक्षण विशेषज्ञों और काशी के कुछ पंडितों के साथ ही आधुनिकता के समावेशन के लिए कुछ आधुनिक और वामपंथी ब्राह्मणवादी बौद्धिकों को (तुलसीदास और रामकथा विशेषज्ञों को प्राथमिकता देते हुए) अवश्य ही स्थान दिया जाना चाहिए!

डिस्क्लेमर : लेखिका के निजी विचार हैं, तीसरी जंग हिंदी का कोई सरोकार नहीं है