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साहब अब बर्दाश्त नहीं होता…राम भरोसे का इस्तीफ़ा!

स्वर्ग-धाम सोसायटी के ऑफिस में जब प्रेजिडेंट सात्विक जी ने राम भरोसे से कहा, पैसे बढ़ा देते हैं, एक वर्दी और ले लो, दिवाली पर घर हो आना, देखो राम भरोसे, तो राम भरोसे बोला, और जो बोला तो वो बेबाक बोला, बोला जो नंगा सच था, बोला जो गहरे धंसा था,

नहीं, अब देखिये आप लोग साहब, बहुत हो गया, हमने बहुत देखा और बहुत सुना, लेकिन हममें जो ईश्वर वास करता है न, उसकी हत्या अब और नहीं कर पाएँगे, हमें अपनी आँख के पानी का वास्ता है, हमें राम के भरोसे होने का वास्ता है

हमारा इस्तीफा रखा है मेज़ पर, हिसाब कीजिये, और अब हमको फ़ारिग कीजिये , भूखे मर जायेंगे लेकिन अब चौकीदारी तो नहीं ही करेंगे भाई, जिसको देखिये हमें ही हर तरफ ठेलता है, जैसे कोई जिन्न हों भाई, गाय भगाना, कुत्ता सब का लड़ाई छुड़ाना, बाहरी शराबी को डंडा और भीतरी को कंधा देना, पानी ना आए तो हमको गाली, और जुडे आए तो हमको गाली, डिलीवरी वाला गुटखा थूके तो हमारा दोष, और काम वाली छुट्टी करे तो हम पर सारा जोश, करवा चौथ के चाँद को हमीं देख कर बताएँ, छठ पूजा का सामान हम ही ढोएं, और हम ही माता के भंडारे की गन्दगी समेटें, मच्छर,मक्खी और चूहा जैसे हम ही न्यौता दे कर बुलाते हैं, और उस पर हमारे नाम के आगे आप जो लोग अलंकार लगाते हैं, क्या कहिये की हमारी छाती चौड़ी हो जाती है, ए स्टुपिड राम, ओए कामचोर, अबे ओ गंवार, किसी का सिगरेट तो किसी का पान और किसी का तो पूरा दूकान, सबका जी हज़ूरी, गुड मॉर्निंग,गुड नाईट साहब, यस साहब, नो साहब, थैंक यू साहब, सॉरी साहब, इससे आगे कोई संवाद ही नहीं,

यहाँ तक भी सब ठीक है, हम समझते हैं, आप लोग बड़े लोग हैं, पढ़े-लिखे बड़े साहब लोग हैं, आप लोगों का इनकम भारी है, ये सब गाडी,फ्लैट और राजा वाला ज़िन्दगी के लिये, जाने क्या क्या न करते होंगे,आप लोग ये सब काम कर सकते तो हमारा गुजर-बसर का जुगाड़ क्यों बनते, ये सब हम समझते हैं, स्वीकार कर चुके हैं, और ये सब का शिकायत भी नहीं है हमें, क्या है ना, यहाँ कोई जानने वाला, गाँव-घर, रिश्तेदारी का आदमी नहीं है, तो दो झाँपड़ खा कर भी इज्जत जाने का चांस नहीं है, ऐसा नहीं की आप लोग हमें पूछते नहीं हैं, ऐसा कोई रोज़ शायद ही जाए जब हमें बचा हुआ बाज़ार का खाना ना मिले, माने पिज़्ज़ा से लेकर चिकेन,मटन तक सब, पुराना टी-शर्ट,पेंट, क़मीज़ सब मिलता है, और हम ये सब पा कर खुश भी रहते हैं, इसके लिये थैंक यू भी है,

लेकिन जो इस अष्टमी और नवमी को हुआ, वो सहन नहीं, बर्दाश्त नहीं करेंगे हम, हमसे नहीं होगा, अरे भाई तो हम तो यही सीखे की धर्म है, पर्व है, माँ का उत्सव है, आप लोग क्या समझ लिये जी, हर चीज बाज़ार है, बिकाऊ माल है, पैसा फेंकिए खन्न-खन्न और सब नाचेगा, आशीर्वाद खरीदियेगा वो भी ऐसी घटिया नौटंकी से, भगवान् को पागल बनाइयेगा, भगवान भी आप लोगों के लिये स्टुपिड,गंवार ही है क्या, समझते हैं नौ दिन का महत्व, जानते हैं आस्था की शक्ति को, कभी आत्मसात किये हैं ईश्वर को, एक तरफ नौ दिन माँ की आराधना, घंटी, उपवास और न जाने क्या-क्या और दूसरी तरफ ऐसी हेय दृष्टि, गजब ढोंगी लोग हैं भाई आप लोग तो, अष्टमी और नवमी दोनों दिन,पलकें बिछाएँ आप सब खड़े थे मेन गेट पर, ए राम भरोसे देखो वो गरीब बच्चा, ए राम भरोसे देखो ये गरीब बच्चा, सब को हाँको, सब को छेको, देखो कोई ना जाने पाए दूसरी सोसायटी में, घेर के ले आओ सबको, देखो उस नंगे पैर वाले को भगाओ कार्पेट गन्दा होगा, ए देखो उसकी नाक बहती है उसको भगाओ, क्या सब काले बच्चे पकड़ लाए, जाओ देखो गरीब मगर साफ़ सुथरा बच्चा कोई गोरा बच्चा, जिसे देख हमारा बच्चा रोए ना ऐसा बच्चा, पूछो इन सबको पेशाब तो नहीं लगा है, हमारा टॉयलेट ना खराब कर दे, देखो घमौरी वाले तो बिलकुल ना पकड़ना, पैर में कोई फुंसी ना हो, बदन पे कोई फोड़ा ना हो, आखिर इनके पैर धो कर आशीर्वाद जो लेना है, ओह्ह जाने कैसी-कैसी बस्ती में रहते होंगे, जाने क्या -क्या बीमारी ले घुसेंगे, देखो ज़रा कोशिश करो, साफ़-सुथरे और स्वस्थ बच्चे ही पकड़ो, और हम बिना सोचे-समझे आर्डर बजने में लग गए, दिमाग और दिल का कनेक्शन ही नहीं हो पाया, की गलत कर रहें हैं यका सही, रात भर उन बच्चों के चेहरे सामने आ कर सवाल पूछते रहे, क्यों चाचा कल भी घुसने देंगे की नहीं, कल भी पूजा होगी हमारी, कल भी पेट फटे तक हलवा-पूरी खाना होगा, चाचा हम तो बच्चे हैं, माँ-बाप मजबूर हैं, हमें रोकते नहीं अमीर के ढोंग का विषय-वस्तु बनने से, और हमें भी आकर्षण है उस प्रकाश पुँज का, जिसके दूधीया प्रकाश में ये लोग रोज नहाते हैं, लेकिन आप तो इन्हें और करीब से जानते हैं, तो आप कैसे अपना इकबाल कायम रखते हैं, कैसे ख़ुद से आँख मिलाते हैं, हमें आप की आँख में पानी क्यों नहीं दिखता, क्यों राम भरोसे रहने वाला राम के नाम पर होने वाले पाखंड में सहायक हो जाता है, साहब अब बर्दाश्त नहीं होता, हिसाब कीजिये, राम भरोसे अब राम भरोसे ही रहना चाहता है

अघोरी राहुल

डिस्क्लेमर : लेखक ने निजी विचार हैं, तीसरी जंग हिंदी का कोई सरोकार नहीं है