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हमारी सत्ता का आधार ही साम्प्रदायिकता है, समाज में ज़हर घोलने वालों से रहें होशियार : रिपोर्ट

आख़िर इतनी नफ़रत लाते कहां से हैं?

हमारे भारतीय समाज में धार्मिक सद्भावना की जड़ें इतनी गहरी हैं कि दुनिया भारत के इस सद्भावना पूर्ण इतिहास की मिसालें पेश करती है। भारत को “अनेकता में एकता” रखने वाले देश के रूप में जाना जाता है।

भारत के इतिहास पर नज़र डालने से पता चलता है कि इस देश में हमेशा हर धर्म के लोग आपसी मेल-जोल के साथ रहते आए हैं। इतिहास पर नज़र डालने से पता चलता है कि मुग़ल बादशाह अकबर के सेनापति मान सिंह और महाराणा प्रताप के सेनापति हाकिम ख़ान सूर रहे हैं, इसी देश में छत्रपति शिवजी महाराज के कई सेनापति, नेवल कमाण्डर से लेकर उनके गुप्त दस्तावेज़ पढ़ने व उसका जवाब देने वाले मुस्लिम रहे हैं, वहीं अंग्रेज़ों के क़ब्ज़े से देश की आज़ाद कराने की लड़ाई में क़ुर्बान होने वाले लाखों हिन्दू-मुस्लिम-सिख-ईसाई शहीदों के नाम से पोर्ट ब्लेयर जेल की दीवारें तथा नई दिल्ली के इण्डिया गेट की शिलायें पटी पड़ी हुई हैं। लेकिन इन सबके बीच आज इसी महान देश में नफ़रत और ज़हर से भरा हुआ संकीर्ण मानसिकता रखने वालों का एक छोटा सा वर्ग ऐसा भी है जो न केवल उपरोक्त तथ्यों को नज़र अंदाज़ करने की कोशिश करता रहता है बल्कि इसके विपरीत साम्प्रदायिक विद्वेष फैलाने तथा नफ़रत के प्रचार प्रसार के काम में भी व्यस्त रहता है। आश्चर्य की बात तो यह है कि इन स्वयंभू राष्ट्रवादियों के पुरखों का न तो देश के स्वतंत्रता संग्राम में कोई योगदान है न ही देश की आज़ादी के लिये लाठियां-गोलियां खाने वालों में इनका कोई ज़िक्र है।

परन्तु भारत जैसे महान देश में मुट्ठी भर ज़हरीली मानसिकता और दुर्भाग्यवश अंग्रेज़ों की जी हुज़ूरी करने वाले लोग नफ़रत और साम्प्रदायिक दुर्भावना के सहारे, ख़ासकर देश में हिन्दू-मुस्लिम के मध्य खाई गहरी कर सत्ता में ज़रूर आ गए हैं। सत्ता में आते ही इनको यह एहसास हो गया है कि चूंकि हमारी सत्ता का आधार ही साम्प्रदायिकता है लिहाज़ा इसे निरंतर ‘धार’ देते रहना सत्ता में बने रहने के लिये ज़रूरी है। इसी मक़सद के तहत कहीं ज़िलों, शहरों, क़स्बों व स्टेशन्स के नाम बदले जा रहे हैं, मदरसों के ख़िलाफ़ कार्यवाहियां हो रही हैं, हलाल का मुद्दा उठाया जा रहा है, जिहाद, लव जिहाद, अज़ान और हिजाब जैसे विषय उछाले जाते हैं, इतिहास बदले जा रहे हैं। नए इतिहास गढ़े जा रहे हैं। हद तो यह है कि धार्मिक पहचान देखकर मॉब लिंचिंग की जाती है, ट्रेन में धर्म विशेष के यात्रियों को गोली मार दी जाती है, संतों जैसे दिखाई देने वाले व्यक्ति द्वारा मुस्लिम महिलाओं का बलात्कार करने की धमकी लाऊड स्पीकर पर दी जाती है।

सोचने वाली बात यह है कि आज भारत में ऐसी ज़हरीली और कट्टर मानसिकता के लोग और पार्टियां अपना पैर पसारती जा रही हैं। उनके इस विस्तार में एक बहुत बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है कि जो अपने लाभ के लिए उनका साथ दे रहे हैं। लेकिन यह बात सबको समझ लेनी चाहिए कि जब नफ़रत अपने चरम पर पहुंच जाएगी, हर ओर केवल कट्टरवाद ही होगी तो फिर देश एक ऐसी आग में जल रहा होगा कि जिसको शांत करना किसी के बस में नहीं होगा, ऐसी स्थिति में इस आग में वे भी जल रहे होंगे कि जिन्होंने नफ़रत और संप्रदायिकता के लिए एकत्रित की जा रही लकड़ियों में ख़ुद भी योगदान दिया होगा। क्योंकि जब आग लगेगी तो फिर वह हम इंसानों की तरह धर्म और जात-पात नहीं देखेगी। इससे पहले कि हम अपने हाथों अपने देश, अपने भविष्य और अपनी औलादों के जीवन में अशांति की आग जलाएं हमे जागना होगा और नफ़रत की आग जलाने के लिए एकत्रित की जा रही लकड़ियों को जमा होने से रोकना होगा। जब देश में शांति होगी, विकास होगा और ख़ुशहाली होगी तभी हम सब एक अच्छा जीवन व्यतीत कर सकेंगे।