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हमारे पूर्वजों में परिस्थितियों के मुताबिक़ खुद को ढालने के लिए उत्तरजीविता की रणनीति के तौर पर एडीएचडी विकसित हुई थी : रिपोर्ट

एडीएचडी को सामान्य तौर पर एक विकार कहा जाता है. लेकिन नए विज्ञान का कहना है कि इसकी मदद से हमारे पूर्वज अपने लिए भोजन जुटाकर बचे रह पाए होंगे.

अति-सक्रियता, आवेग और हमेशा ध्यान भटकना, ये सभी ‘अटेंशन-डेफिसिट हाइपरऐक्टिविटी डिसऑर्डर’ (एडीएचडी) के लक्षण हैं. इसे एक कमजोरी या मनोविकार माना जाता है, जिसके इलाज की जरूरत होती है.

लेकिन एडीएचडी के कुछ फायदे भी हैं, जिनकी वैज्ञानिक स्तर पर जांच की जाती रही है. एडीएचडी वाले लोगों को रचनात्मक और गतिशील माना जाता है. वे सामाजिक और भावनात्मक रूप से योग्य होते हैं और उनमें आला दर्जे की संज्ञानात्मक क्षमताएं होती हैं.

इतना ही नहीं, एक नए अध्ययन में पेन्सिलवेनिया यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने एडीएचडी के उद्गम का पता लगाने की कोशिश की. इस अध्ययन के सह-लेखक डेविड बराक ने सोशल मीडिया पर लिखा, “एडीएचडी और एडीएचडी-सदृश विचलन या आवेग जैसी संज्ञानात्मक विशिष्टताएं व्यापक हैं और अक्सर नकारात्मक रोशनी में देखी जाती हैं. लेकिन अगर वे सच में नकारात्मक हैं, तो उनका बने रहना एक गुत्थी है.”

तो क्या एडीएचडी क्रमिक विकास का एक महत्वपूर्ण भाग है? नए अध्ययन के मुताबिक आप कह सकते हैं, हां. रिसर्च टीम का कहना है कि हमारे पूर्वजों में परिस्थितियों के मुताबिक खुद को ढालने के लिए उत्तरजीविता की रणनीति के तौर पर एडीएचडी विकसित हुई थी. उनका अध्ययन प्रोसीडिंग्स ऑफ द रॉयल सोसायटी बी (बायोलॉजिकल साइंसेस) में प्रकाशित हुआ था.

बेरियों की मदद से अध्ययन
मामले की तह तक पहुंचने के लिए शोधकर्ताओं ने 457 वयस्कों से मिले डेटा का विश्लेषण किया. उनमें से 206 ने बताया कि उनमें एडीएचडी के लक्षण थे. परीक्षण में शामिल लोगों को एक वीडियो गेम की वर्चुअल झाड़ियों में से एक सीमित समय के भीतर ज्यादा-से-ज्यादा बेरियां जमा करने को कहा गया था.

उन्हें बार-बार फैसला करना था कि वो उन्हीं तय जगहों पर बेरियां जमा करते रहें, जहां वे कम हो रही थीं या वे जगह बदल कर नई झाड़ी का रुख करें? बाद वाली स्थिति में कीमती सेकंड खर्च हो रहे थे.

एडीएचडी के लक्षण वाले लोगों में ये प्रवृत्ति देखी गई कि वे ज्यादा तेजी से जगह बदलते थे और एक झाड़ी में कम समय बिताते थे. लिहाजा वे बिना एडीएचडी वाले लोगों की तुलना में ज्यादा बेरियां जमा कर पा रहे थे. जिन्हें एडीएचडी नहीं था, वे जमा बेरियों की मात्रा बढ़ाने की उम्मीद में एक ही झाड़ी में ज्यादा समय बिताते देखे गए.

शोधकर्ता इस नतीजे पर हैरान थे. वे मान बैठे थे कि जल्दी-जल्दी झाड़ियां बदलने से कम बेरियां मिलेंगी. लेकिन बराक कहते हैं, “उच्च एडीएचडी लक्षणों में उच्चतर प्राप्ति दर और बेहतर प्रदर्शन देखा गया.”

उत्तरजीविता की रणनीति
इस युक्ति के अपने लाभ हैं. यह एक ही जगह में संसाधनों के दोहन को रोकती है, जबकि उसी दौरान नए इलाकों को भी खंगाल आती है. यह रणनीति अतीत में शिकारी-घुमंतुओं की उत्तरजीविता के लिए काफी अहम रही होगी.

दूसरे अध्ययन इस विकासपरक रणनीति का समर्थन करते हैं. उन्होंने दिखाया है कि घुमंतू जीवनशैली ऐसे आनुवंशिक परिवर्तनों (म्यूटेशनों) से जुड़ी रही है, जो एडीएचडी में भूमिका निभाते हैं.

ये तमाम चीजें संभवतः यह बता सकती हैं कि एडीएचडी आज इतना प्रचलित क्यों है. अंतर यह है कि भोजन की तलाश में अपनी योग्यता साबित करने वाली विशिष्टताएं अब समकालीन समाज में इतनी लाभदायक नहीं रही हैं, खासकर जहां संसाधन प्रचुर हैं.

जिन लोगों को एडीएचडी नहीं है, उनकी तुलना में एडीएचडी के लक्षण वाले लोगों में डोपामीन ज्यादा तेजी से विखंडित होता है. इस महत्वपूर्ण न्यूरोट्रांसमीटर की सतत जरूरत बनाए रखने और उसके लिए ज्यादा प्रयत्न करने की वजह से एडीएचडी वाले लोगों को, किसी एक काम को पूरी तरह खत्म किए बिना अलग-अलग कार्यों के बीच लगातार आवाजाही करते रहनी पड़ती है.

लेकिन शोधकर्ताओं ने इस मामले में और छानबीन किए जाने की जरूरत पर जोर दिया है. उनके मुताबिक, इस अध्ययन का महत्व प्रतिभागियों के अपने एडीएचडी के आत्म-मूल्यांकन तक सीमित है.

अगले कदम के रूप में शोधकर्ता, एडीएचडी के सेल्फ डायग्नोसिस वाले लोगों से उलट ऐसे लोगों को लेकर अध्ययन करना चाहते हैं, जिनमें एडीएचडी होने का पता चला हो. इसके अलावा, उन्हें वास्तविक स्थितियों में भोजन की तलाश का काम दिया जाएगा, जिसमें वर्चुअल गेम के मुकाबले ज्यादा जद्दोजहद की जरूरत पड़ती है.

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हन्ना फुक्स