साहित्य

*🌳🦚आज की कहानी🦚🌳**💐💐सरहद के बिना दुनिया💐💐*By-Satyavir Singh Bhuria

Satyavir Singh Bhuria
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*🌳🦚आज की कहानी🦚🌳*
*💐💐सरहद के बिना दुनिया💐💐*
राजस्थान के झुंझुनूं जिले का छोटा सा गांव था नयासर । शहर के कोलाहल से बहुत दूर , यहां शान्ति ही शान्ति थी । नंदाराम कस्वां अपने माता पिता और दो बडे भाईयो के साथ रहता था । बचपन मे उसने अपनी दादी जी से अपने दादा जी के फौज के बहुत से किस्से सुने हुए थे । बचपन मे मन बहुत कोमल होता है जो भी बात बैठ जाये , वह आजीवन नही निकलती ।
उसने भी बचपन मे ही प्रण ले लिया था कि वह भी अपने दादा जी की तरह फौज मे जाकर सेवा करेगा । उसका वह जोश उम्र के साथ साथ बढता गया ।
जबकि अन्य दोनो बडे भाई अपने पिता के साथ खेती करते थे ।
नंदाराम कस्वां का सपना पूरा हो गया , वह कठिन परीक्षा मे पास होकर फौज मे भर्ती हो गया और देश की सेवा करने लगा । फौज मे छुट्टी तो यदा कदा ही मिलती है ।
बडे दोनो भाई अपनी घर ग्रहस्थी मे लग गये । दोनो भाईयो के बच्चे भी हो गये । एक बार नंदाराम कस्वां मात्र पन्द्रह दिन की छुटटिया लेकर घर आ पाया , क्योंकि उसकी माता की तबियत बहुत खराब थी ।
उसकी मां ने पहले से उसके लिए एक रिश्ता देख रखा था । उन्हे अपनी परवरिश पर पूरा भरोसा था कि नंदाराम कस्वां मना नही करेगा । उसके आने के अगले ही तीन दिन मे उसका विवाह एक सुशील लडकी इमरती देवी के साथ कर दिया । दस दिन ही दोनो ने साथ बिताये थे कि ड्युटी पर जाने का समय हो गया ।
वह खुशी खुशी अपने परिवार से विदा ले चला गया । दो महीने बाद वही उसे पता चला कि वह पिता बनने वाला है । परंतु सरहद पर गम्भीर स्थिति के कारण वह नही आ पाया ।
उसने सोचा कि बच्चे के जन्म के समय चला जायेगा ,परन्तु उस समय भी दुश्मनो के हमले की आशंका के कारण छुटटी नही मिल पायी ।
जब उसका बालक रघुवीर सिंह छः महीने का हुआ तो वह उसके लिए बहुत से खिलौने और कपडे लिए, एक महीने की छुट्टी लेकर घर आया । अभी तीन दिन ही हुए थे , वह तो अपने बालक को अच्छे से प्यार करके अपने अरमान भी पूरे नही कर पाया था कि इमर्जेंसी के कारण नंदाराम कस्वां को पुनः जाना पडा ।
इसके बाद वह दो साल बाद एक हफ्ताह की छुटटी लेकर घर आया । बच्चे बहुत मासूम होते है जब घर मे वह अपने दोनो ताऊ जी के बेटो को लाड लडाते देखता तो उसका मन भी करता कि उसके पिता जी हर समय उसके साथ रहकर उसे प्यार करे । जब वह अपनी मां के अलावा अन्य स्त्रियो को सजे सवंरे और चहकते हुए , मगंलगीत गाते दगाता तो उसका मन करता कि काश उसकी मां भी ऐसे ही चहकती रहे । उसे भी अपनी मां और पिता का प्यार एक साथ मिले । वह छः वर्ष का हो चुका था , पिता का स्नेह और गोद उसे न के बराबर ही मिली थी । एक दिन जब उसने सीमा पर हमले के कारण अपने दादा- दादी और मां के मुख पर चिंता देखी तो वह रात को घबराकर छत पर चला गया । उसने अपनी दादी से सुन रखा था कि टूटते तारो को देखकर कुछ भी मांगों वह पूरा हो जाता है ।
वह लगातार आकाश की तरफ देखता रहा फिर अचानक खुद से ही बोलने लगता है कि काश एक अनोखी दुनिया हो जाये । न कोई सरहद हो , न सीमा , सारी दुनिया मे प्यार हो जाये । जब ऐसा हो जायेगा तो सब आराम से रहेंगे। न लडाई होगी , न झगडा । उसके पिता भी घर पर होगे । वह भी अपने पिता की उगंली पकड खेतो मे जाया करेगा । जब भी घर के बाहर से उसके पिता आयेगे , उसे बाहों मे भर लेगें उसे फिर कंधे पर बैठा , पूरा गांव घुमायेगे । उसकी मां भी सज सवंर हर समय मंगलगीत गायेगी । दादा – दादी भी फिर चैन से सो पायेगे ।
फिर अगले दिन खबर मिली कि बेटा फ़ौज में शहीद हो गया।जब गांव में पार्थिव देह पहुँची तो बेटे ने देखा पूरा शहर उसके पिता नंदाराम कस्वां की पार्थिव देह के चारों तरह इक्कट्ठे होकर जयकारे लगा रहे है।अंतिम संस्कार के समय जब पिता को अग्नि देने का समय आया तो बेटे ने पिता को सेल्यूट करके जोर से जय हिंद कहकर शपथ ली कि वो भी बड़ा होकर देश की सेवा करेगा और पापा की तरह फौजी बनेगा।पूरा गांव ,शहर बच्चें की बहादुरी की तारीफ करते हुए आंसुओ की नदियां बहा रहे थे।
*💐💐शिक्षा💐💐*
काश एक ऐसी अनोखी दुनिया सच मे बन जाये , चारों ओर हो अमन और शान्ति। हर बेटे रघुवीर को मिले सके पिता नंदाराम कस्वां और माता इमरती देवी का प्यार एक साथ।
ऐसे परिवारो को कोटि नमन जो अपने घर के चिरागो को बारूद के ढेर पर भेजकर , देशसेवा मे अपना योगदान देते है ।
*सदैव प्रसन्न रहिये।*
*जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।*
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