साहित्य

🌻🌸🌺🏵️इंसान कुएं का मेंढक🌼🌻🌸🌺-सीताराम “पथिक” की रचना ज़रूर पढ़ें!

Sitaram Pathik
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🏵️इंसान कुएं का मेंढक 🌼
🌺🌸🌻🌸🌻🌸🌺
हर बंदा कुएं का मेंढक है!,
और सबको यहां गुमान बहुत।
सबको लगता इस दुनिया में,
है कोई उससे बड़ा नहीं,
उसकी गुरुता के सम्मुख अब,
हो सकता कोई खड़ा नहीं,
दिखलाते हैं सब दूजों को,
इस कारण झूठी शान बहुत।
हर बंदा कुएं का मेंढक है!,
और सबको यहां गुमान बहुत।
सबको लगता इस दुनिया में,
है उनसा किसी का रूप नहीं,
उनको गढने के बाद ब्रह्म ने,
कोई गढा फिर दिव्य स्वरूप नहीं,
अपने तन मन धन जीवन पर,


सब करते हैं अभिमान बहुत।
हर बंदा कुएं का मेंढक है,
और सबको यहां गुमान बहुत।
सबको लगता वह दानी हैं,
और सारा जगत भिखारी है,
सब हुनर पास में हैं उनके,
और सब कला उन्हीं पर वारी है,
इस कारण कैंची के जैसे,
चलती है सदा ज़ुबान बहुत।
हर बंदा कुएं का मेंढक है,
और सबको यहां गुमान बहुत।
जिससे भी मिलते जुलते हैं,
वो उसमें नुक्स निकाल रहे,
छोटे क्या बड़े बुजुर्गों की,
पगड़ी पग मार उछाल रहे,
बहन बेटियों तक का जग मे,
नहीं रखते कोई ध्यान बहुत।
हर बंदा कुएं का मेंढक है,
और सबको यहां गुमान बहुत।
अपने बीवी और बच्चे भी,
उनको लगते हैं हीर जड़े,
इस कारण से रखते मन में,
वे हरदम चिकने कई घड़े,
कुछ फिक्र नहीं संबंधों की,
प्रायः खाते नुकसान बहुत।
हर बंदा कुएं का मेंढक है
और सबको यहां गुमान बहुत।
पैसों से ज्यादा दुनिया में,
वे कहते कोई सगा नहीं,
परिचित में कोई बचा नहीं,
जिसको कि उनने ठगा नहीं,
आत्ममुग्धता में उनको छोटी,
लगे धरा और आसमान बहुत।
हर बंदा कुएं का मेंढक है,
और सबको यहां गुमान बहुत।
उत्थान पतन के सांचे में,
लेकिन यह दुनिया चलती है,
जो उगती है इस धरती पर,
वह अवश् एक दिन ढलती है,
हर बिहान के माथे पर,
लिखा होता है अवसान बहुत।
हर बंदा कुएं का मेंढक है,
और सबको यहां गुमान बहुत।
जो बाढ़ अचानक चढ़ती है,
वह औंधे मुंह फिर गिरती है,
एक निश्चित वृत्त में ही धरती,
अपनी सदियों से फिरती है,
इस गोल घूमने के कारण,
बदले सबके स्थान बहुत।
हर बंदा कुएं का मेंढक है,
और सब को यहां गुमान बहुत।
सुख-दुख के दो दृढ़ पहियों में,
जीवन का हर रथ चलता है,
शीतल छाया में कहीं मुदित,
तो कहीं धूप में जलता है,
मेंढक को जरा अवस्था में,
तब लगता बड़ा जहान बहुत।
हर बंदा कुएं का मेंढक है,
और सबको यहां गुमान बहुत।

-सीताराम “पथिक”
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रीवा ‘मध्यप्रदेश’