मनोरंजन

🎖️दोस्ती की मिसाल- ”बिस्मिल्ला और रामलाल”

Manohar Mahajan
=============
🎖️दोस्ती की मिसाल-बिस्मिल्ला और रामलाल
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
[संगीतकार-रामलाल 101 सालगिरह पर विशेष]
~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~
अपने दम पर संघर्ष से संगीत निर्देशक बने रामलाल चौधरी को फ़िल्म उद्योग उनके जीते जी भूल गया. लेकिन व्ही. शांताराम की फिल्म ‘सेहरा’ के दो ही गीत ‘पंख होते तो उड़ आती रे…’ और ‘तकदीर का फ़साना..’ उनके नाम को संगीत प्रेमियों के दिल में ज़िंदा रखने के काफ़ी है.

जब यादों के दरीचे में नज़र पड़ेगी तो C.रामचंद की फिल्म ‘नवरंग’ के गीत ‘तू छुपी है कहाँ, मैं तड़पता यहाँ ‘ में उनके द्वारा शहनाई-वादन का बहुत सुन्दर प्रयोग करते संगीतकार राम लाल चौधरी को हम पाते हैं. उत्तर भारत के नख़रीले और बिगड़ैल इस नौजवान ने अपना लोहा फिल्म मधुमती में सलील चौधरी के लिए “चढ़ गयो पापी बिछुआ…” गीत में मधुर शहनाई बजा कर फिल्म संगीत में मनवा लिया.यही नहीं राज आ कपूर के पहली फ़िल्म ‘आग’ के गीत “देख चांद की ओर मुसफ़िर में शहनाई और बांसुरी दोनों वाद्यों को बजाकर अमर कर देने वाला शख़्स भी राम लाल चौधरी ही था.


फिल्म ‘गूंज उठी शहनाई’ के लिए बसंत देसाई ने बेक ग़्राउण्ड में शहनाई तो बजवाई राम लाल से लेकिन जैसा कि कभी-कभी फ़िल्मी दुनियाँ में होता है, उसका क्रेडिट मिला उस्ताद बिस्मिल्ला ख़ाँ साहब को.गरम मिज़ाज के आदमी रामलाल भड़क गए. एक कान में हीरा और दुसरे कान में पन्ना पहनने वाले हिरालाल पन्नालाल नामधारी रामलाल चौधरी का कान कुछ ज्यादा ही फ़िल्मी दुनियाँ ने भर दिया तो साथी बिस्मिल्ला ख़ाँ ने कहा कि “भाई, ई बम्बई नगरी, ई फिलिम-विलिम हमरे वश का नहीं. बहुत टोका-टाकी है यहाँ. अब इसे तूँ ही सम्भाल मैं तो चला बनारस गँगा नहाने. “उस्ताद बिस्मिल्ला ख़ाँ साहब ने मुम्बई नगरी ख़ैरबाद कह दिया. लेकिन स्वाभिमानी, हठी व बात के धनी संगीतकार व शहनाई वादक रामलाल चौधरी और बिस्मिल्ला खान साहब के बीच का रिश्ता वैसा ही अपने खून से बढ़कर बना रहा.

बिस्मिल्ला ख़ाँ वृद्धा अवस्था में रामलाल चौधरी को कुछ मदद करने के गरज से मुम्बई उनके खेतवाड की चाल की एक खोली में पहुँचे. उनकी स्थिति देखकर उस दिन शहनाई वादन से जो पारिश्रमिक या पुरस्कार दुनियाँ के लिए उस्ताद बन चुके बिस्मिल्ला ख़ाँ को मिला था वैसे ही रूमाल में लपेटकर चलते समय हाथ पर रखकर बोले “रख ले तेरा पहले का मेरे उपर कुछ बाकी था,उस समय था नहीं, अब है तो सोचा चलते चलते लौटा दूँ.. क़र्ज़ माथे पर लेकर मरना अच्छी बात तो नहीं है ना..अल्लाह को क्या मुँह दिखाऊँगा.”

सुरों को तौलने वाले रामलाल ने एक हाथ से रूपए की पोटली को तौला और दुसरे हाथ में अपने मित्र बिस्मिल्लाह की काँपती ऊँगलियों को तौला.धुन बन गई, बात समझ में आ गई. उन्होंने अपने उस छोटे से घर के ताखे पर रखे एक छोटे से टिन के पेटी को खोला और उसमें से एक लिफ़ाफ़ा निकाल कर उस पोटली पर रखते हुए भर्राये स्वर में बोले “बिस्मिल्ला तुम तो नाराज़ होकर चले गए थे लेकिन पीछे से तेरा कुछ पैसा बसंत देसाई दे गए थे, जो मुझसे ख़र्च हो गए थे.कल ही महाराष्ट्र सरकार से 700/- रुपए पेंशन मिला है.अच्छा याद दिला दिया.. इसे लेते जा..हमें भी तो उपर जाकर भगवान को मुँह दिखाना है.”

बिस्मिल्लाह असमंजस में पड़ गए…फिर शुरू हुई दोनों में तकरार…खा़ँ साहब के साथ गए दोनों शागिर्द परेशान हाल.. रामलाल आचानक टिन की छोटी पेटी जमीन पर पटककर चीखे “तूँ होगा दुनियाँ के लिए उस्ताद पर यह मत भूल कि संगीतकार रामलाल चौधरी के निर्देशन में तुमने शहनाई बजाई है. मेरी गरीबी का मज़ाक़ उड़ाने आए हो… कैसी तुम्हारी सोच हो गई है रे बिस्मिल्ला?” खाँ साहब हतप्रभ.. वे एक आगे बढ़े और उनके टिन के बक्से को उठाकर उसमें उनके रुपये रखे और उसी ताखे पर वैसे ही ले जाकर रख दिया तथा रूपए की पोटली अपने शागिर्द को देते हुए डबडबाई आँखों से बोले: “रामलाल तुम बदले नहीं और हम तुम्हें समझे नहीं… मॉफ़ कर दो…संगीत निर्देशक हो, अपने मातहत कलाकार को किसी गलती के लिए माफ तो कर ही सकते हो.”

दोनों के ही आँखों से आँसू छलक पड़े। दोनों गले मिले। मन के किसी कोने में कहीं कोई मैल था भी तो इन झरते हुए आँसुओं से धुल गए.

——-