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अब दुनिया नहीं बचेगी, अगले दिन सूर्य नहीं उगेगा! ये भी उतने ही मौक़ापरस्त, लुटेरे और स्वार्थी हैं!!

Mamta Joshi – Delhi
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लोग झांसी की रानी को मर्दानी क्यों कहते हैं ? वह तो पूरी तरह जनानी थी । औरत की तरह लड़ी । आदमी बच्चा बांध कर लड़ता है क्या कभी ? वो लड़ी भी औलाद के खातिर । झांसी तो अंग्रेज़ों ने झांसे से कभी की ले ली थी । सिर्फ दुर्ग पर रानी का राज था । उस दुर्ग को भी अंग्रेज़ों ने जब रानी के दत्तक पुत्र के नाम करने से मना कर दिया तब लक्ष्मीबाई ने तलवार उठाई । यानी अपनी औलाद के लिए अंग्रेज़ों से भिड़ी । उस दुर्ग के लिए और अपने बच्चे के भविष्य के लिए रानी जान पर खेली थी । इसके पहले तो अंग्रेज़ों से विनती ही कर रही थी ।

ऐसे ही छोटे छोटे सारे नवाब और राजे राजवाड़े अपनी सत्ता, अपने किलों के लिए लड़ रहे थे । अपनी जनता को तो खदेड़ कर अपने सिंघासन बचाने के लिए कटवाते थे । इनमें से अधिकतर अपने विलास अपने रनिवासों में मस्त ऊट पटांग न्याय देने वाले खबीस थे । आज़ादी के बाद भी ये ऐसे नहीं तो वैसे राजनीति में आज भी बने हुए हैं ।

जो तब राजा करते थे वही अब के लोकतांत्रिक तरीके से चुने प्रतिनिधि भी करते हैं । ये भी उतने ही मौकापरस्त, लुट्टू लुटेरे और स्वार्थी हैं ।

 

Mamta Joshi
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मुद्दों पर से ध्यान हटाने के लिए एक चर्चित गड़ा मुर्दा इन्होंने फिर से उखाड़ लिया है । #श्रीदेवी_की_मौत_नहीं_हत्या_हुई_थी, नाम का । याद होगा श्रीदेवी की मौत को इन्होंने दिन रात गाया था । लॉटरी निकल गई थी इनकी । सारे मीडिया गिद्ध सुबह सुबह नहा धो कर माइक के आगे श्रीदेवी की मौत पर चीखते रहते थे । लगता था अब दुनिया नहीं बचेगी । अगले दिन सूर्य नहीं उगेगा । कुछ लोग तो यहां तक कह रहे थे अगर उनकी मौत पर देश इस कदर बिलखने को तैयार हो तो जैसे कहो वैसे मर जायें । उसी मातम का सपना लिये, उसी टीआरपी के मंसूबे लिए श्रीदेवी की मृत्यु को हत्या साबित क़रने के लिए चैनलों की चौपाल बिछने लगेगी अब । आपको तो मूर्ख बनाने की भी ज़रूरत नहीं है लग जाओगे रोने धोने । भीतर का जासूस जाग जायेगा । रिपोर्टर्स कहेंगे, थैंक गॉड चैनल चलाने के लिए कुछ तो मिला ? वरना मालिक तो न ये खबर चलाने देते न वो । असल खबरों के शहतीरों को भूत के पीछे छिपाते छिपाते बेचारे हांफ जायेंगे ।

Mamta Joshi
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**********#रेलवे का #निजीकरण***********

निकट भविष्य में रेलवे के निजीकरण के बाद काउंटर पर आपमे से किसी एक के साथ रेलवे क्लर्क की एक बातचीत देखिये । कभी आने वाले दिनों के बारे में भी सोचिये ।

*रेलवे टिकट खिड़की पर:*

*#यात्री: दिल्ली से लखनऊ का एक रिजर्व टिकट चाहिए।

*#क्लर्क: ₹ 750/-

*#ग्राहक: पर पहले तो 400/- था !

*#क्लर्क: सोमवार को 400/- है, मंगल बुध गुरु को 600/- शनिवार को 700/- तुम रविवार को जा रहे हो तो 750/-

* #ग्राहक : ओह ! अच्छा लोवर दीजियेगा, पिताजी ऊपर चढ़ नहीं पाते ।
* #क्लर्क* फिर 50 रुपये और लगेंगे।

* #ग्राहक : अरे ! लोवर के अलग ! साइड लोवर दे दीजिए फिर ।

* #क्लर्क: उसके 25 रुपये और लगेंगे।

* #ग्राहक: हद है ! न टॉयलेट में पानी होता है, न कोच में सफ़ाई, किराया बढ़ता जा रहा है।

* #क्लर्क: टॉयलेट यूज का 50 रुपये और लगेगा, शूगर तो नहीं है ना? 24 घंटे में 4 बार यानी रात भर में 2 बार से ज़्यादा जाएंगे तो हर बार 10 रुपये एक्स्ट्रा लगेंगे।

* #ग्राहक: हैं ! और बता दो भाई, किस-किस बात के पैसे लगने हैं अलग से।

* #क्लर्क: देखो भाई, अगर फोन चार्ज करोगे तो 10 रुपये प्रति घंटा, अगर खर्राटे आएंगे तो 25 रुपये प्रति घंटा,और अगर किसी सुन्दर महिला के पास सीट चाहिए तो 100 रुपये का अलग चार्ज है।

अगर कोई महिला आसपास कोई खड़ूस आदमी नहीं चाहती है, तो उसे भी 100 रूपये अलग से देना पड़ेगा । एक ब्रीफकेस प्रति व्यक्ति से अधिक लगेज पर, 20 रुपये प्रति लगेज और लगेगा। मोबाइल पर गाना सुनने की परमिशन के लिए 25 रुपये एक मुश्त अलग से। घर से लाया खाना खाने पर 20 रुपये का सरचार्ज़। खाना रेलवे से लेना होगा । उसके बाद अगर प्रदूषण फैलते हैं तो 25 रुपये प्रदूषण शुल्क।

*#ग्राहक* (सर पकड़ के): ग़ज़बै है भाई, लेकिन ई सब वसूलेगा कौन ?

*#क्लर्क* अरे भाई निजी कंपनियों से समझौता हुआ है, उनके आदमी वसूलेंगे । सुने हैं वसुलै वालों की काठी 6 फुट से ऊपरै होगी ।

*#ग्राहक: (धम्म से बैठते हुए) वो हमारी रेल कहाँ गई ? कहाँ गए वो दिन ? लगता है किसी अनजाने अजनबी देश में आ गया हूँ ।

* #क्लर्क: काहे भाई ! जब #रेलवे_का_निजीकरण हो रहा तब तो बड़े आराम से घर में बैठे थे और सोच रहे थे कि हमारा तो कुछ होने वाला है नहीं । जो होता है सबके साथ होता है सरजी । तब आप हम रेलवे कर्मचारियों के साथ नहीं थे जब हम आंदोलन कर रहे थे । तब तुम सरकारी चैनलों पर हिंदू, मुस्लिम, दलित और राजनीति की झूठी बहसों में उलझे थे । तब सोशल मीडिया पर भी असली मुद्दों पर न तुम बात करते थे न कंचन की पोस्ट लाइक या शेयर करते थे । उसकी असली मुद्दों वाली पोस्ट पर मसाला नहीं नज़र आता था न तुम्हें ? अब भुगतो ।

नोट : वाट्सऐप की एक पोस्ट को एडिट किया है

 

 

Mamta Joshi
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प्रकॄति का एक सामान्य व्यवहार और भी है, जिससे आप घृणा करेंगे उससे आपकी औलाद प्रेम करेगी । गड्ढे भरना प्रकृति का अत्यंत मामूली और सतत व्यवहार है ।

जातिगत घृणा को भी प्रकृति इसी तरह पाट रही है, अभी से नहीं सदियों से । मगर मनुष्य ने प्रकृति की भाषा को हमेशा सुनने से इंकार किया है । अपने ही बच्चों की लाशें बिछा दीं मगर बच्चों ने उन जातियों में ही सेंध मारी जिनके रास्तों में पिताओं ने कांटे बो रखे थे । उन्हीं जातियों के लड़के लड़कियों में प्रेम की तलाश की, जीने मरने की कसमें खायीं जिनके तसव्वुर से भी जाति के अहंकार को ठेस लगती थी । प्रकृति ने गुस्से में अपने सीने की दरारों में एक साथ हर जाति और हर वर्ग के मनुष्यों को समेट कर बताया कि दम तुम्हारा घुटेगा भी तो एक तरह से मगर अहंकार की रस्सी जितनी ही जली उसके बल उतने ही नुमाया हुए ।

क्या इंसान को प्रकृति ने इसलिए दिमाग दिया था कि वह उसके कोई इशारे नहीं समझेगा और झूठ और पाखंड को अपने जीवन का ज़रूरी हिस्सा बना लेगा ?
तुम तो ठीक से जानवर भी न हो पाए रे मनुष्य ।।।

डिस्क्लेमर : लेख ममता जोशी के फेसबुक वॉल से प्राप्त हैं, सोशल मीडिया में वॉयरल हैं, लेखिका के निजी विचार हैं, तीसरी जंग हिंदी का कोई सरोकार नहीं है

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